The Mysterious Bell146 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 146

7 min read November 5, 2026

रात के खाने में माँ ने दाल बनाई। नमक कम था, और मैंने कुछ नहीं कहा। पापा ने दो रोटी खाईं, जो उनके हिसाब से बहुत थी। काजल ने तीन बार पानी माँगा। मैंने अपनी प्लेट पूरी खाली की, और माँ ने देखा और कुछ नहीं कहा, पर उनके हाथ का काँपना कम हो गया था।

फिर काजल अस्पताल लौट गई — रात की ड्यूटी पर, डॉक्टर इसरानी के साथ, सफ़ेद कोट में। पापा चारपाई पर लेट गए, पर मैं जानता हूँ वो सोए नहीं; उनकी साँस की आवाज़ सोए हुए आदमी की नहीं थी। माँ रसोई समेटकर बैठीं, और मुझे लगा वो मुझसे कुछ कहना चाहती हैं, पर मैं चुप था, इसलिए उन्होंने भी चुप रहना चुना।

मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में आया। बल्ब गुनगुना रहा था। मैंने ट्रंक खोला, औज़ार देखे, फिर बंद कर दिया। रिंच वहीं रखी थी जहाँ टिंकू ने छोड़ी थी। मैंने चाबी गले से निकाली और पट्टी के छेद में फिर फँसाई — इस बार पूरी। तीन चौथाई से ज़्यादा। चार पाँच बार घुमाया, और छोड़ दिया।

फिर मैं उस छोटी छत पर चढ़ गया — आधी ईंट, आधी टीन वाली छत। वहाँ से पूरी गली दिखती है। पीपल, पत्थर की चबूतरी, उस्ताद की बंद दुकान, शबनम आपा की गुमटी की बुझती लालटेन, और दूर अस्पताल की पीली दीवार, जिस पर रणवीर का पोस्टर चिपका था। अस्पताल की खिड़कियों में रोशनी थी। कोई भीतर जाग रहा था।

मैंने घंटी जेब से निकाली और हथेली में रखी।

"एक बात पूछूँ?"

घंटी चुप रही।

"वो काग़ज़, जिस पर अंगूठा दादा का नहीं है — उस पर किसका है?"

घंटी बोली, बहुत धीमे, जैसे बहुत दूर से आ रही हो।

"जिस आदमी ने तेरे पापा को बचाया था, उसका।"

"कौन?"

"वो जो तेरे घर के सबसे पुराने दरवाज़े के पीछे रहता है," घंटी ने कहा। "और आज से पहले तू उसे कभी नहीं देखा, क्योंकि तूने कभी उस दरवाज़े को खोला ही नहीं।"

"मेरे घर में कोई बंद दरवाज़ा नहीं है।"

"तो कल खोजना," घंटी ने कहा। "आज रात मत। आज रात तेरा काम अलग है।"

"क्या काम?"

"तेरे पास आने वाले को सुनना।"

मैं समझा नहीं। मैंने पूछने के लिए मुँह खोला, पर तभी मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई — इतनी ठंडी कि जैसे बर्फ़ की सुई।

और नीचे, गली से, किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।

वो दौड़ पहचानी हुई थी। चप्पल का तेज़ फिसलना, और बीच-बीच में साँस फूलने की आवाज़। मैंने नीचे झाँका, और छत की किनारी पर मेरा हाथ कस गया।

काजल थी। सफ़ेद कोट में, बाल खुले हुए, हाथ में स्टेथोस्कोप जिसकी नली उलझी हुई थी, और चेहरे पर वो रंग जो मैंने पहले सिर्फ़ एक बार देखा था — उस रात, जब हम दोनों अस्पताल की सीढ़ियों पर खड़े थे।

वो दुकान के दरवाज़े तक दौड़ी, और उसने ज़ोर से दरवाज़ा पीटा।

"भैया! भैया, नीचे आ!"

मैं सीढ़ी से उतरा, और मेरे पैर फिसलते-फिसलते बचे।

"क्या हुआ?"

काजल ने एक हाथ दरवाज़े के चौखट पर टिकाया, और अपनी साँस सँभालने की कोशिश की, और नहीं सँभाल पाई।

"अस्पताल की बिजली काट दी गई है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, और वो काँप रही थी, और मुझे लगा वो गिर पड़ेगी। "पूरी इमारत में अंधेरा है। जनरेटर भी नहीं चला। डॉक्टर साहब ने मोमबत्ती जलाकर मरीज़ देखे, और माँ की दवा फ्रिज में रखी है — भैया, दवा फ्रिज में है!"

मैंने उसका कंधा पकड़ा।

"बिजली क्यों गई?"

"बोर्ड वाले कह रहे हैं कि केबल में गड़बड़ी है," काजल ने कहा, और फिर उसने मेरी आँखों में देखा और उसकी आवाज़ और धीमी हो गई। "पर भैया, मैंने देखा। बिजली के खंभे पर कोई चढ़कर तार काटकर नहीं उतरा — जाने कब काटा गया, कोई शोर नहीं, कुछ नहीं। पहले से काटकर रखा था।"

मेरे हाथ से घंटी निकली और चारपाई पर गिरी, और उसने एक बहुत छोटी आवाज़ की — टन।

"और एक बात," काजल ने कहा, और उसने अपने होंठ काटे। "अस्पताल की पिछली दीवार पर आज शाम एक नई पट्टी लग गई है। मैंने उसे अंधेरे में छुआ। लोहे का बोर्ड है, बड़ा, और उस पर कुछ लिखा है।"

"क्या लिखा है?"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर उसने रोना नहीं चुना।

"लिखा है — यह ज़मीन भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की है। और नीचे, छोटे अक्षरों में, अस्पताल के काम का आख़िरी दिन भी लिखा है, भैया। वो दिन मशीन वाले दिन के ठीक बाद है।"

मैं कुछ देर खड़ा रहा। गली बिल्कुल शांत थी, और उस शांति में सिर्फ़ दूर से आती हुई किसी ट्रक की आवाज़ थी।

मैंने चारपाई से घंटी उठाई। वो ठंडी नहीं थी। हल्की गरम थी।

"अब?" काजल ने कहा।

मैंने चाबी गले से निकाली, पट्टी जेब से, और घंटी हथेली में रखी।

"अब हम दोनों जा रहे हैं वहाँ," मैंने कहा। "और जाते-जाते रास्ते में उन बुज़ुर्गों को उठा लेंगे जो चबूतरी पर बैठते हैं। अब कोई अकेला नहीं जाएगा, काजल। अब से नहीं।"

ऊपर की छत पर बल्ब गुनगुना रहा था, और मेरी मुट्ठी में घंटी ने बहुत धीमे से आवाज़ दी — एक ही बात।

"अब ताले की बारी नहीं," उसने कहा। "अब लोगों की बारी है।"

॥

रात के करीब दो बजे थे जब मैंने उस्ताद अली बक्श की दुकान का दरवाज़ा खटखटाया। दो बजे किसी के दरवाज़े पर हाथ रखना अपने आप में एक जुर्म लगता है, पर उस रात मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।

दरवाज़ा खुला, और उस्ताद बाहर आए — पूरे कपड़े पहने हुए, चश्मा लगा हुआ, कान पर पेंसिल, और हाथ में रुमाल।

"मुझे पता था," उन्होंने कहा, और मुझे कोई सवाल पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी। "पिछले एक घंटे से मैं चप्पल पहनकर बैठा हूँ। आवाज़ आई थी — दूर, बहुत दूर।"

"कैसी आवाज़, उस्ताद?"

"घंटी की," उन्होंने कहा, और उन्होंने दरवाज़े पर ताला लगाना शुरू किया, पर हाथ काँप रहा था। "पर वो मेरी घंटी नहीं थी। मेरी घंटी सिर्फ़ सुनती है। वो बोल रही थी। इलियास की घंटी बोल रही थी।"

काजल ने मेरी कलाई पकड़ ली।

"भैया, चलो पहले अस्पताल।"

"एक मिनट," मैंने कहा, और फिर उस्ताद की तरफ़ देखा। "उस्ताद, चबूतरी पर बंसी बाबा और रहमत बाबा सो रहे होंगे।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी — डर नहीं, थकान। पचास साल की थकान।

"मैं उन्हें उठाता हूँ," उन्होंने कहा। "तू अपनी माँ की दवा की सोच। मैं उन्हें लेकर आता हूँ।"

और वो गए। सत्तर साल का आदमी, रात के दो बजे, अंधेरी गली में, बुज़ुर्गों को उठाने।

यह सोचकर आज भी मेरा गला भर आता है।

अस्पताल पहुँचे तो पूरी इमारत काली थी। दो मंज़िला, पीली दीवारें, और उन दीवारों पर अंधेरा ऐसे बैठा था जैसे किसी ने स्याही उँडेल दी हो। गेट का लोहे का दरवाज़ा खुला था, और अंदर से मोमबत्ती की पीली रोशनी निकल रही थी।

डॉक्टर इसरानी पहली मंज़िल के गलियारे में खड़े थे, हाथ में मोमबत्ती, और उस मोमबत्ती के नीचे उनका चेहरा इतना पुराना लग रहा था जितना कि मैंने कभी नहीं देखा। उनके साथ कोई तीस साल का लड़का था, जो एक छोटी बैटरी-लालटेन लिए खड़ा था।

"आ गए," उन्होंने कहा, बिना शिकायत, बिना कोई सवाल। "शंकर यादव की दवा ठीक है। मैंने उसे लालटेन वाले कमरे में रखवा दिया है, और घड़ी पर नज़र रखे हुए हूँ। दो घंटे में बर्फ़ ख़त्म हो जाएगी।"

"बर्फ़ कहाँ से?"

"शबनम बहन ने भेजी," डॉक्टर ने कहा। "उसकी गुमटी में ठेले वाले के लिए बर्फ़ रहती है। उसने कहा — अस्पताल के लिए ले जाओ। और मैंने एक शर्त मानी।"

"क्या शर्त?"

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