The Mysterious Bell – Chapter 145
"अंकुश," उसने कहा। "तुम कुछ छिपा रहे हो।"
मैंने देखा — मेरे अंदर एक लाइन थी जहाँ से आगे झूठ शुरू होता है। मैंने उस लाइन पर पैर रखा, और तुरंत मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई। एक छोटी सी ठंडक, दाँत जैसी।
मैंने साँस छोड़ दी।
"छिपा रहा हूँ," मैंने कहा। "पर झूठ नहीं बोलूँगा, क्योंकि आज मेरे पास झूठ बोलने की गुंजाइश नहीं है। जो मैं तुम्हें बता सकता हूँ, वो ये — ये पट्टी कल शाम अस्पताल के पीछे के प्लॉट से निकली है। उसी प्लॉट से जहाँ दो दिन बाद सुबह सात बजे मशीन आएगी। और ये पट्टी पच्चीस साल पहले की किसी चीज़ से जुड़ी है। बात मैं पूरी नहीं कह सकता। कुछ मेरी है, कुछ और लोगों की, और कुछ ऐसी है कि अगर मैंने अभी बताई तो किसी की जान या किसी का घर दाँव पर लग जाएगा।"
मीरा कुछ देर चुप बैठी रही।
"अच्छा," उसने कहा। "कम से कम तुमने झूठ नहीं बोला। बाकी लोग मुझसे यही करते हैं — वो मुझे आधा सच देकर सो जाते हैं, और मैं आधा सच पूरा मानकर सुबह अख़बार में छाप देती हूँ।"
उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो आज पहली बार साफ़ सुनाई दी।
"मुझे इसकी फ़ोटो चाहिए," मीरा ने कहा। "दोनों तरफ़ की। साफ़, ऐसी कि अक्षर पढ़े जाएँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुम्हारे पास ये पट्टी है," उसने कहा, "पर इसका पता नहीं कि ये पट्टी क्या है। और मुझे यह भी नहीं पता। पर मैं जानती हूँ कि अगर ये सच में पच्चीस साल पुरानी चीज़ है, तो इसके अक्षर एक दिन अदालत में काम आएँगे। और अदालत में चीज़ें हाथ से खो जाती हैं। फोटो नहीं खोती।"
मैंने पट्टी उसके सामने रख दी, और उसने फ़्लैश जलाकर चार फोटो लीं — ऊपर से, नीचे से, तिरछी, और पास से। फिर उसने मेरी गले की चाबी की तरफ़ देखा, जो आज पहली बार मेरी कमीज़ के बाहर आई हुई थी, क्योंकि मैंने उसे पट्टी के छेद में फँसाया हुआ था।
"वो क्या है?"
"चाबी," मैंने कहा।
"किसकी?"
"पापा ने दी थी। पंद्रह सोलह साल की उम्र में। किस चीज़ की है, नहीं बताया।"
मीरा ने चाबी को देखा, और फिर पट्टी के छेद को, और मैंने उसकी आँखों में वो चीज़ देखी जो पत्रकारों की आँखों में होती है जब दो अलग-अलग काग़ज़ एक ही कहानी बनने लगते हैं।
उसने कैमरा बंद किया और बैग में रखा।
"आज रात मैं खुद पीछे वाला काग़ज़ देखूँगी," उसने कहा।
"कौन सा काग़ज़?"
"वही जो अस्पताल के रिकॉर्ड में है। नीलामी का काग़ज़, नक्शा, और वो सूची जिसमें तेरी दुकान सातवें नंबर पर है। जब वो काग़ज़ कोई नहीं देखता, तब असली बातें दिखती हैं। मैंने ये किसी को नहीं बताया, खुद ही करूँगी।"
"तुम अकेली जाओगी?"
"मैं दो साल से अकेली ही जाती हूँ," उसने कहा। और फिर रुककर जोड़ा, "पर आज पहली बार किसी ने मुझसे पूछा। इसलिए बता देती हूँ — नहीं, अगले हफ़्ते से अकेली नहीं जाऊँगी।"
वो उठी, दुपट्टा ठीक किया, और जाते-जाते दरवाज़े पर रुकी।
"अंकुश, एक बात। तुम्हारी आवाज़ में अब वो हल्कापन नहीं है जो सुबह था।"
"अच्छी बात है या बुरी?"
"पता नहीं," उसने कहा। "पर मुझे लगता है अब तुम से सीधे सवाल पूछे जा सकते हैं।" और वो चली गई।
मैं आँगन में खड़ा रह गया। पीछे रसोई से तड़के की आवाज़ आ रही थी, और माँ कुछ गुनगुना रही थीं — वही पुरानी फ़िल्मी धुन, जो वो हमेशा तब गुनगुनाती हैं जब मन ठीक न हो और दिखाना न हो।
तभी गली के मोड़ से उस्ताद अली बक्श आते दिखे।
वो आम दिनों में शाम सात बजे के बाद दुकान से बाहर नहीं निकलते। आज वो आ रहे थे — धीरे, एक हाथ लाठी पर, दूसरे हाथ में वो मोटा चश्मा जो उन्होंने आँख पर पहना हुआ था और जिस पर पेंसिल फँसी थी।
"उस्ताद।"
उन्होंने हाथ उठाकर मुझे रोका, और पहले मेरे आँगन में झाँका, फिर मेरी तरफ़ आकर बहुत धीरे से कहा, "अंदर चल।"
दुकान के पीछे वाले कमरे में हम गए। टिंकू वहीं था — चारपाई के किनारे बैठा, हाथ में रिंच पकड़े, जिसे छूने की इजाज़त उसे अब मिल गई थी। उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़।
"ये सुन ले," उन्होंने कहा। "आज शाम को नए बाज़ार में दो आदमी चाय पी रहे थे। मेरा भांजा वहाँ काम करता है, गुमटी पर। एक आदमी ने कहा — बड़े साहब ने आज सुबह से ही किसी को भेज रखा है। दूसरे ने पूछा, किस लिए। पहले ने कहा — पता करने, कि घंटी जागी है या नहीं।"
मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया।
"और?" मैंने कहा।
"और," उस्ताद ने कहा, "उनका जवाब था — हाँ, जाग गई।"
उस्ताद ने लाठी दीवार के सहारे खड़ी की। उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो सिर्फ़ उन आदमियों में होती है जो एक ही कहानी को दो बार जी चुके हैं।
"अंकुश, मैंने तुझे पहले भी कहा था — घंटी बाज़ार में मत दिखाना। तूने आज पूरे मोहल्ले के सामने पीतल की पट्टी उठाई। गली में चार आदमी बैठे थे, दो खड़े थे, और एक बच्चा छत पर था। आज शाम तक बात नए बाज़ार पहुँच चुकी है।"
"तो क्या होगा?"
"जो पच्चीस साल पहले हुआ," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक बहुत धीमी हो गई। "वो पहले काग़ज़ लाएँगे। फिर अंगूठा माँगेंगे। फिर घंटी माँगेंगे। और जब तीनों न मिलें, तब वो चीज़ तोड़ेंगे जिसे तोड़ने में ताक़त नहीं लगती — भरोसा।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। बच्चा सुन रहा था, और उसका हाथ रिंच पर कस गया था।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने पच्चीस साल पहले उनको रोका था। आप जानते हैं वो क्या करेंगे?"
"हाँ।"
"तो बताइए क्या करें।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें बहुत पुरानी थीं, और उसमें वो चीज़ थी जो इंसान के पास तब आती है जब वो अपनी सबसे बड़ी गलती की नक़ल होते देखता है।
"एक चीज़," उन्होंने कहा। "रात को कोई अकेला मत छोड़ना। जो भी हो, सब एक छत के नीचे, या सब एक गली में। वो आदमी भीड़ से नहीं डरता। वो अकेलेपन से डरता है।"
फिर उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा, जहाँ घंटी थी।
"और इसे मत खोना," उन्होंने कहा। "ये मिरासी है। मिरासी का हिसाब भारी होता है, और इसका हिसाब आज रात से शुरू हो रहा है।"
वो जाने लगे, फिर दरवाज़े पर रुके।
"अंकुश, इलियास आया था?"
"हाँ," मैंने कहा। "कल।"
"वो क्या लाया?"
"एक कपड़े में लिपटा बंडल," मैंने कहा। "और उसमें शंकर यादव के पिता वाला एक पीला काग़ज़ था। नीली स्याही, लाल अंगूठा, दुकान की गिरवी का हिसाब।"
उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं।
"तो वो भी निकाल लाया," उन्होंने कहा, इतने धीमे कि मुझे लगा वो खुद से बोल रहे हैं। "पचास साल में पहली बार।"
"उस्ताद, वो काग़ज़ क्या है?"
"वो काग़ज़," उस्ताद ने कहा, "तेरे घर के दो दरवाज़ों के बीच रखा हुआ है। जब तेरा घर खुलेगा, तब वो खुलेगा। और मैं तुझे आज सिर्फ़ इतना बताऊँगा कि उस काग़ज़ पर जो अंगूठा है, वो तेरे दादा का नहीं है।"
मैं जम गया।
"किसका है?"
"कल सुबह," उस्ताद ने कहा, और चले गए।
घंटी ने कुछ नहीं कहा। वो चुप थी, और उस चुप्पी में इतना वज़न था कि मैं कुछ देर ट्रंक के पास बैठा रह गया। टिंकू ने मेरे पास आकर बैठना चाहा, फिर रुक गया, फिर बैठ गया, और उसने कोई सवाल नहीं पूछा। मेरे लिए वो आज की सबसे बड़ी बात थी। तेरह साल का लड़का, जो बिना सवाल पूछे बैठ गया था।
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