The Mysterious Bell – Chapter 1441
उसने काग़ज़ को ज़रा और ऊपर उठाया, ताकि सब देख सकें, और मैदान में जितने दीये जल रहे थे, उनकी रोशनी उस पुराने टुकड़े पर पड़ी।
"यह मेरी हड्डी का हिसाब है।"
मैदान में कोई नहीं बोला।
"यहाँ लिखा है — कितनी ईंटें उठीं, कितनी बोरियाँ ढोई गईं, कितने दिन छुट्टी नहीं मिली, कितनी रात भूखे पेट सोया गया। यहाँ लिखा है कि एक आदमी की कमर कब टूटी और उसके बदले उसे क्या मिला।"
उसने एक कदम आगे बढ़ाया।
उसकी आवाज़ अब धीमी नहीं थी।
"और आज मैं यहीं, इसी मैदान में, इन सबके सामने यह बताऊँगा — कि रणवीर भारद्वाज ने अपना पहला ठेका किसकी लाश पर जीता था।"
पूरा मैदान हिल गया।
मैंने देखा — दीयों की लौ एक साथ ज़रा झुकी, जैसे किसी ने मैदान में एक बड़ी साँस ली हो।
रफ़ीक़ ने मेरी कमीज़ पकड़ ली।
"उस्ताद," उसने फुसफुसाया, "लाश?"
मैंने उसका हाथ हटाया और उसके कान के पास कहा, "इंतज़ार कर।"
पर मेरे अंदर भी कुछ हिल रहा था।
क्योंकि मैंने हरिप्रसाद के आधी उँगली वाला हाथ देखा था। और अब उसकी बात सुनकर मेरे दिमाग़ में एक तस्वीर बनने लगी थी — वो तस्वीर जो ज़ुबैर के स्टूडियो में थी। जवान रणवीर, जवान हरिप्रसाद, आधी बनी दीवार, और पीछे वो लकड़ी के जूते वाला।
उस तस्वीर के पीछे पेंसिल से लिखा था — इसके तीन हिस्से थे।
तीन हिस्से।
तीन हाथ।
मैंने घंटी को जेब में कसकर पकड़ा।
"तीन?" मैंने मन में पूछा।
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
बस एक छोटी सी गरमाहट और फिर ठंडी हो गई — जैसे किसी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा हो और बिना कुछ बोले हटा लिया हो।
मंच की तरफ़ से आवाज़ आई।
रणवीर की आवाज़।
वो खड़े हो गए थे।
अब वो कुर्सी पर नहीं थे। वो सीधे खड़े थे, माइक के स्टैंड के पास, हाथ जोड़े हुए — वही बात, वही हाथ जोड़ने का तरीका — और उनके चेहरे पर वो मुस्कान फिर वापस आ गई थी, जैसे किसी ने काग़ज़ को फिर से कील पर टाँग दिया हो।
"हरिप्रसाद भाई," उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ आई कैसे, पता नहीं। माइक का तार तो कटा था। पर उनकी आवाज़ मैदान तक पहुँच गई — जैसे उनके सीने से निकलकर सीधे लोगों के कानों में गिरी हो।
"आप मेरे पुराने साथी हैं। मेरे पहले मज़दूर। मैंने कभी आपका नाम भुलाया नहीं। आप बोलिए। बेझिझक बोलिए। पर भाई, जो बोलेंगे, उसका सबूत भी देंगे, है ना? क्योंकि बात अपनी हो या पराई, सच का एक ही नियम है — सच को दो लोग मानें तो सच, वरना आवाज़।"
हरिप्रसाद रुका।
उसने पीछे मुड़कर रणवीर को देखा।
और फिर उसने वो किया जो मैंने सोचा भी नहीं था।
वो मुस्कुराया।
नहीं — हँसा नहीं। सिर्फ़ मुस्कुराया। बहुत धीरे।
और उस मुस्कान में इतनी बात थी कि रणवीर की मुस्कान, जो अभी-अभी वापस आई थी, फीकी पड़ गई।
"साथी," हरिप्रसाद ने कहा। "हाँ। साथी। साथी कोई शब्द नहीं होता, साहब। साथी एक हड्डी होती है। जो साथ हो, वो कभी नहीं टूटती। और जो टूटे, वो साथी नहीं था।"
फिर उसने अपनी आवाज़ सबके लिए बढ़ाई।
"मैं सबूत दूँगा।"
उसने अपना काग़ज़ उठाया।
"यह मेरी हड्डी का हिसाब है, पर इसमें एक नाम और लिखा है। वो नाम मेरी हड्डी के साथ लिखा गया — मेरे ही हाथ से। और वो नाम…"
उसने एक साँस ली।
"वो नाम इस मैदान में बैठे एक आदमी के पास है। उसके सीने से चिपका हुआ। जब से उस आदमी ने उस रात वो काग़ज़ उठाया था, वो उसे अपने सीने से लगाए घूमता है। और आज वो भी इसी मैदान में है।"
मैदान में सन्नाटा।
फिर मैंने वो सुना।
लकड़ी के जूते।
ठक।
ठक।
लकड़ी के जूतों वाला बूढ़ा।
जो अब तक ज़मीन पर बैठा था, अब खड़ा हो गया था।
पूरा खड़ा।
और उसने अपनी चादर के नीचे से अपना हाथ निकाला।
उसकी हथेली में कुछ था।
मैंने आँखें सिकोड़कर देखा।
कपड़े में लिपटा हुआ, छोटा सा, चौकोर।
उस्ताद ने मेरा कंधा दबाया।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "आज रात के बाद यह मैदान वैसा नहीं रहेगा जैसा था।"
और मेरी जेब में घंटी — वो घंटी जो कुछ देर पहले चुप हुई थी — गरम होकर एक बार बजी।
एक बार।
और बोली, "अब वो भी बोलेगा।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद जी," मैंने कहा, "यह हरिप्रसाद जी जिस लाश की बात कर रहे हैं…"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उनकी नज़रें उस लकड़ी के जूतों वाले बूढ़े पर थीं।
"हाँ, बेटा," उन्होंने कहा। "मैं सुन रहा हूँ।"
"कोई मरा था?"
उस्ताद ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा, "पचास साल मुझे भी यही पूछना था। आज पूछ रहा हूँ। और आज पहली बार लग रहा है कि उत्तर मेरे सामने खड़ा है।"
मैंने हरिप्रसाद की आवाज़ फिर सुनी।
वो अब उस काग़ज़ को सीने से लगाकर नहीं पकड़े था। वो उसे हवा में पकड़े था, दोनों हाथों से खोलकर, जैसे कोई पतंग उड़ा रहा हो।
"मेरी एक बहन थी," उसने कहा।
मैदान में कोई हिला नहीं।
"उसकी शादी तय हुई थी। उसके लिए मैंने अपना पूरा हिस्सा माँगा — साहब से, काम के बदले, हिसाब के बदले। मैंने सोचा, मैं दिन-रात ईंट ढोऊँगा, अपनी कमर तोड़ूँगा, अपनी उँगली इसी काम में गँवा दूँगा… पर बहन का घूँघट सीधा हो जाएगा।"
उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ आया।
"और उस रात साहब ने मुझे बुलाया। बोले — हरिया, तेरा हिसाब पूरा हुआ। कल सुबह तू अपना हिस्सा ले जाना। मैंने कहा, साहब, हिस्सा नहीं, थोड़ा एडवांस दे दीजिए। बहन के लिए। वो हँसे। बोले — एडवांस नहीं, ब्याज लगेगा। मैंने कहा, लगा दीजिए। उन्होंने कहा — एक शर्त है। आज रात तू पीछे वाले प्लॉट पर जाकर सो जा। रात में कुछ आदमी आएँगे, उन्हें कुछ नहीं दिखना चाहिए।"
मैंने अपनी मुट्ठी कस ली।
मेरी उँगलियों में दर्द होने लगा।
"मैं गया," हरिप्रसाद ने कहा। "मैं सो गया। और सुबह मेरी आँख खुली तो… मेरी बहन का घूँघट उसी प्लॉट पर पड़ा था। सीधा नहीं था, साहब। वो बिखरा हुआ था। प्लॉट पर जो दीवार बन रही थी, वो उस रात के किसी आदमी की दीवार थी। और वो दीवार जहाँ से शुरू हुई थी, वहाँ कुछ नहीं था। ज़मीन साफ़ थी। जैसे किसी ने जल्दी में कुछ हटा दिया हो।"
उसने उँगली उठाई।
"मैंने उस रात अपनी बहन की लाश नहीं देखी।"
मैदान में सन्नाटा।
"नहीं देखी," उसने दोहराया। "क्योंकि मुझे उस रात बेहोश करके कहीं और पहुँचा दिया गया था। जब होश आया, तो मेरे हाथ में एक काग़ज़ था। यही। और मेरी जेब में दो रुपये थे — दो रुपये, साहब, मेरी बहन के बदले।"
वो रुका।
"मैं उस दिन से मरा हुआ हूँ। और आज तक इस शहर में मैंने किसी को यह नहीं बताया, क्योंकि मेरे पास बोलने की जगह नहीं थी। आज जगह बन गई है। तुम सबने बनाई है।"
मैंने मंच की तरफ़ देखा।
रणवीर की मुस्कान अब भी वहीं थी।
पर अब मुझे समझ आ गया था — वो मुस्कान नहीं थी। वो एक ज़रूरत थी। एक आदमी जो अपने चेहरे पर एक चीज़ लगाकर घूम रहा है, क्योंकि अगर वो उतर गई, तो सामने वाले को उसका असली चेहरा दिख जाएगा।
और उसी वक़्त उन्होंने कुछ कहा।
धीरे से।
सिर्फ़ उनके बगल में बैठे सक्सेना तक पहुँचने लायक़ धीरे।
मैंने होंठ हिलते देखे।
"अब।"
सक्सेना ने सिर हिलाया।
और मंच के पीछे, अंधेरे में, कुछ आगे बढ़ा।
मैंने सुना — लोहे की किसी चीज़ की धीमी, खींची हुई आवाज़। जैसे किसी पुराने फाटक का कुंडा ज़ंग में घूम रहा हो।
दीयों की लौ फिर झुकी।
एक बुझ गया।
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