The Mysterious Bell – Chapter 1436
"मैंने उनसे माफ़ी नहीं माँगी," मीरा ने कहा। "मैंने उन्हें फोन किया, पर उन्होंने फोन मेरे एडिटर को दिया और कहा कि उस लड़की से कह दो कि मैं ठीक हूँ। और वो 'ठीक हूँ' मेरे लिए सबसे भारी शब्द बन गया। उस दिन के बाद मैंने हर छोटी खबर के पीछे पागलों की तरह भागना शुरू कर दिया, ताकि कोई कहे कि मैं कायर नहीं हूँ। पर मैं अंदर से जानती थी — मैं कायर हूँ। मैंने एक औरत का घर छाप दिया और फिर उससे आँख नहीं मिला पाई।"
उसने हाथ जोड़े और उसने अपना सिर नीचे किया।
"आज मैं आप सबके सामने अपना दाग़ खोल रही हूँ। मुझे नहीं पता कि इससे किसी का कुछ भला होगा या नहीं। पर मैं इसे और नहीं ढो सकती। और अगर आज यहाँ सच बोलने का दिन है, तो मेरा सच भी यहीं बोलेगा।"
तभी भीड़ में हलचल हुई।
धीरे-धीरे, बहुत धीरे, लोगों ने रास्ता दिया।
एक औरत आगे आ रही थी। छोटी, सीधी, सफ़ेद बाल, कंधे पर हल्का सा शॉल, और हाथ में एक मोटा, बहुत मोटा लिफ़ाफ़ा। उसकी आँखें सूखी थीं। बिल्कुल सूखी। और यही सबसे डरावना था, क्योंकि जो औरत पाँच साल तक रो चुकी हो, उसकी आँखें ऐसी ही हो जाती हैं।
मैंने सुना, किसी ने धीरे से कहा, "रमा मैडम।"
वो आगे आई। उसकी चप्पलें धूल में धीमी आवाज़ कर रही थीं। वो मेज़ के पास रुकी, मीरा से चार कदम दूर।
और मीरा —
मीरा ने उसे देखा और उसका सारा जमा हुआ हिम्मत एक झटके में बह गई। उसने अपने हाथ जोड़ लिए। उसकी आवाज़ टूट गई, टूटी हुई आवाज़ में भी वो शब्द निकाले जो उसने पाँच साल से किसी को नहीं कहे थे।
"मैडम…" उसकी आवाज़ फँस गई। उसने फिर शुरू किया। "मैडम, मैं जानती हूँ, माफ़ी माँगने से मेरा दाग़ नहीं मिटेगा। माफ़ी कोई साबुन नहीं है। माफ़ी से आपका छूटा हुआ घर वापस नहीं आएगा, आपके पति नहीं लौटेंगे, आपकी बेटी का वो साल नहीं लौटेगा। मैं जानती हूँ।"
उसने अपना सिर और नीचे किया।
"पर आज, इस मैदान में, इन दीयों के सामने, मैं आपसे एक वादा करना चाहती हूँ। मैं आज से हर खबर तीन बार जाँचे बिना नहीं छापूँगी। तीन बार। एक बार अपनी आँख से, एक बार काग़ज़ से, और एक बार…" — उसकी आवाज़ फिर टूटी — "और एक बार उस आदमी से पूछकर, जिसके बारे में खबर है। मैं आज से बिना उस आदमी की बात सुने किसी का नाम नहीं लिखूँगी। अगर मैंने फिर कभी ये किया, तो आप सब मेरे मुँह पर थूक देना। मैं कुछ नहीं कहूँगी।"
मैदान में फिर सन्नाटा।
और फिर रमा मैडम ने एक कदम आगे बढ़ाया।
उन्होंने अपना लिफ़ाफ़ा बगल में दबाया और उन्होंने अपना हाथ बढ़ाकर मीरा का हाथ पकड़ लिया। ठीक उसी तरह, जैसे कोई माँ अपनी बेटी का हाथ पकड़ती है — न ज़्यादा ज़ोर से, न ढीला।
"बेटा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ बूढ़ी थी, पर उसमें कोई कड़वाहट नहीं थी। "मैंने तुम्हें दो साल पहले माफ़ कर दिया था।"
मीरा का सिर ऊपर उठा।
"दो साल पहले," रमा मैडम ने कहा, "मेरी बेटी ने मुझे तुम्हारा चैनल दिखाया। तुम उस दिन एक ऐसी औरत के बारे में बोल रही थीं, जिसके साथ भी ऐसा ही हुआ था। तुम उसका नाम नहीं ले रही थीं, पर तुम्हारी आवाज़ में जो दर्द था, वो मेरा अपना दर्द था। मैंने उस दिन तुम्हें माफ़ कर दिया।"
उन्होंने मीरा का हाथ और कसकर पकड़ा।
"तुम खुद को माफ़ नहीं कर पा रही थीं, बेटा। मैं तो बहुत पहले कर चुकी थी।"
मैंने अपनी जेब में घंटी को हिलते महसूस किया।
और मीरा —
मीरा अपनी जगह से खिसकी और वो रमा मैडम के पैरों के पास बैठ गई। उसने अपना सिर उनके घुटनों पर रख दिया, जैसे कोई बच्चा थककर माँ की गोद में सिर रख देता है। और वो रोई। बिना आवाज़ के, बिना शोर के, बस कंधे हिलते रहे और मैदान में दो सौ अठारह दीयों की लौ काँपती रही।
रमा मैडम ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा और उन्होंने कुछ नहीं कहा।
मैदान में जो लोग खड़े थे, उनमें से किसी ने ताली नहीं बजाई। किसी ने शाबाशी नहीं दी। सिर्फ़ एक औरत ने अपनी साड़ी का पल्लू अपनी आँखों पर रख लिया, और एक बूढ़े ने अपना सिर नीचे कर लिया।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो गरम थी। गरम, पर जलती नहीं थी — ऐसी गरम, जैसे सर्दी की रात में किसी ने हमारे हाथ में एक गिलास गुनगुना पकड़ा दिया हो।
मैंने अपनी कॉपी निकाली, जो मैंने आज सुबह जेब में रखी थी। उसके आख़िरी पन्ने पर, जहाँ मैंने आज सुबह लिखा था कि सबसे पहले उसी आदमी के पास जाऊँगा जो सबसे ज़्यादा डरता है, वहाँ अब एक नई लकीर उभर रही थी। पतली, सीधी, नीली स्याही जैसी — पर मेरे पास कलम नहीं थी।
मैंने उसे देखा। वहाँ लिखा था — "पाँच साल का काग़ज़ भी बोला।"
मेरे पीछे उस्ताद खड़े थे। उन्होंने मेरी कॉपी पर नज़र डाली और उन्होंने धीरे से कहा, "अंकुश, ये जोड़ है। और ये जोड़ बड़ा है। बहुत बड़ा।"
मैंने मुड़कर रणवीर की तरफ़ देखा।
और उसका चेहरा —
मैं ये नहीं कहूँगा कि वो डर गया था। रणवीर भारद्वाज डरता नहीं है, कम से कम अपने मैदान में तो नहीं। पर उसके चेहरे पर जो आया, वो डर से भी ज़्यादा खतरनाक चीज़ थी। वो ऐसा था जैसे किसी आदमी की अपनी मेज़ से उसका सबसे भरोसेमंद काग़ज़ कोई खींच ले। वो पीछे हटा नहीं, पर उसने अपना एक हाथ सक्सेना की मेज़ पर रख दिया, जैसे सहारा चाहिए हो। सक्सेना ने उसकी तरफ़ देखा और बहुत धीमे से सिर हिलाया — मत करो, अभी कुछ मत करो।
मैदान के दूसरे कोने में वो लकड़ी के जूतों वाला बूढ़ा बैठा था। उसने अपना सिर नहीं हिलाया। उसने सिर्फ़ अपनी आँखें मीरा से हटाकर रणवीर पर टिका दीं। और उसके होंठ हिले — मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया, पर मैं क़सम खाकर कहता हूँ कि उसने कुछ कहा था।
माँ कुर्सी पर बैठी थीं। काजल का हाथ उनके हाथ पर था। माँ की आँखें भरी हुई थीं, पर उनके होंठ मुस्कुरा रहे थे — वो मुस्कान जो औरतें तब मुस्कुराती हैं जब कोई और रो रहा हो और उन्हें लगे कि अब किसी का बोझ हल्का हुआ।
मीरा उठी। उसने अपनी आँखें पोंछीं, पर उसने अपना चेहरा नहीं छिपाया। वो सबके सामने खड़ी रही, आँसुओं के साथ, बिना शर्म के। और यही उसका सबसे बड़ा सच था।
वो मुड़ी, मेरी तरफ़ देखा और उसने धीरे से कहा, "अब तेरी बारी, अंकुश।"
फिर उसने पलटकर, रमा मैडम का हाथ पकड़ा और उन्हें मेज़ के पास खींचा। रमा मैडम ने अपना मोटा लिफ़ाफ़ा उठाया। उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा — वो लिफ़ाफ़ा पुराना था, किनारों से फूला हुआ, ऊपर धूल जमी थी, और किसी ने उसे बार-बार खोला और बंद किया था।
"रुको," रमा मैडम ने कहा।
उनकी आवाज़ में वो कंपन नहीं था, जो अभी था। अब उसमें कुछ ठंडा था। कुछ तय किया हुआ।
"बेटा, माफ़ी की बात हो गई। अब एक बात और सुन लो।" उन्होंने मीरा का हाथ पकड़े रखा। "मैं तुमसे सिर्फ़ इसलिए माफ़ी नहीं कर रही कि तुमने आज यहाँ सबके सामने कह दिया। मैं तुम्हें दो साल पहले माफ़ कर चुकी थी, ये मैंने अभी कहा। पर उस दिन, पाँच साल पहले, जिस दिन तुम्हारी खबर छपी — मैंने तुमसे पहले उस आदमी को माफ़ किया था।"
मीदान में सन्नाटा और गहरा हो गया।
"कौन आदमी?" किसी ने पूछा — आवाज़ कहीं पीछे से आई, पर सवाल सबके मन का था।
रमा मैडम ने लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें से काग़ज़ निकले — पीले, मुड़े, कुछ फटे, और उनके ऊपर एक छोटा सा काग़ज़ जिस पर कोई लिखाई नहीं थी, सिर्फ़ एक निशान था। मैं दूर से ठीक नहीं देख पाया, पर मेरी जेब में घंटी एक बार काँपी, जैसे उसने वो निशान पहचान लिया हो।
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