The Mysterious Bell – Chapter 1349
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"वो गार्ड उसे नहीं जानता था," कादिर ने आगे कहा। "उसने नाम पूछा। उस आदमी ने कहा — शंकर यादव। फिर गार्ड ने कुछ सूची निकाली, उसमें देखा, और उसे अंदर जाने दिया।"
"सूची?"
"हाँ। भवन के गेट पर एक सूची रखी होती है। जिन-जिन को आना होता है, उनके नाम उसमें पहले से लिखे होते हैं।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
सोचो ज़रा। मेरे पापा का नाम उस सूची में पहले से लिखा था। उन्हें बुलाया गया था। वो अपनी मर्ज़ी से नहीं गए थे। उन्हें बुलाया गया था — और वो गए थे, अकेले, बिना किसी को बताए, अपनी पुरानी साइकिल पर।
"वो अंदर गए?" मैंने पूछा।
"गए। दोपहर के करीब गए थे। फिर लौटकर आए तो गार्ड ने देखा कि उनका चेहरा बदला हुआ था। वो कुछ नहीं बोले। साइकिल पर बैठे और चले गए।"
"कब?"
"करीब दो बजे के आसपास।"
मैंने अपनी कलाई देखी। चार बज चुके थे। मतलब पूरे दो घंटे।
"अंकुश—"
"क्या?"
"वो गार्ड कह रहा था कि उस आदमी के हाथ में कुछ था। इतना छोटा कि दूर से दिखता नहीं था। पर जब वो अंदर जा रहा था, तो उसकी मुट्ठी बंद थी। और जब वो बाहर आया, तो मुट्ठी खुली थी।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
मेरी कुर्सी पीछे हटकर धूल में खिसक गई, और उसके पैर की आवाज़ ने पूरी सूनी गली में गूँज पैदा कर दी।
"अंकुश—" कादिर ने मेरी बाँह पकड़ ली।
"मुझे जाना है।"
"अभी नहीं।"
"कादिर—"
"सुन तो ले!" उसने पहली बार आवाज़ उठाई। फिर फौरन धीमी कर दी, आसपास देखा, और मुझे बोरियों पर वापस बैठने को मजबूर किया। "तू अभी वहाँ गया तो साहब के आदमी तुझे फिर पकड़ लेंगे। तू अभी-अभी बाहर आया है। दरोगा ने तुझे काग़ज़ी रोक में रखा था — असली कारण कुछ और था, ये तू जानता है, मैं जानता हूँ। पर अभी उनके पास तेरे नाम का कोई काग़ज़ नहीं है। अगर तू खुद चलकर उनके आँगन में चला गया, तो वो एक काग़ज़ बनवाकर तुझे फिर अंदर कर देंगे।"
"तो मैं बैठा रहूँ?"
"तू सुन तो ले पहले।"
मैं चुप हो गया। मेरी साँस तेज़ थी। मेरी मुट्ठी में उँगलियाँ कसी हुई थीं।
कादिर ने अपनी आवाज़ और धीमी कर दी।
"तेरे पापा अंदर गए। बाहर आए। अपनी साइकिल पर बैठे। और चले गए। वो वहीं नहीं रुके। वो किसी से झगड़ा नहीं किया। वो न रोए, न चिल्लाए। इतना ही नहीं, अंकुश — वो लौटकर गए हैं। अपनी मर्ज़ी से गए, और अपनी मर्ज़ी से लौटे हैं। अगर साहब ने उन्हें रोकना होता, तो रोक लेते। अब तू सोच — क्यों?"
मैंने सोचा। और मेरा पेट अंदर से जम गया।
"क्योंकि साहब को भी उनसे कुछ चाहिए," मैंने धीमे से कहा।
"हाँ।"
"और पापा ने उसे वो चीज़ दी या नहीं दी, यह हमें नहीं पता।"
"नहीं पता।"
मैं फिर उठा। इस बार कादिर ने मुझे नहीं रोका।
"मैं दुकान जा रहा हूँ," मैंने कहा। "अगर पापा कहीं हैं, तो वहीं होंगे।"
कादिर ने सिर हिलाया।
"मैं साथ चलता हूँ—"
"नहीं।" मैंने उसका कंधा थपथपाया। "तू यहीं रह। किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि तूने मुझे कुछ बताया। और कादिर—"
"हाँ?"
"शुक्रिया।"
वो मुस्कुराया — वैसी मुस्कान जो हँसी नहीं होती, सिर्फ़ एक इंसान का दूसरे इंसान के लिए थोड़ा नरम पड़ जाना।
मैं थाने के सामने से निकला और गली की तरफ़ चल पड़ा।
चलते वक़्त मेरे पैर भारी थे। अजीब बात है ना, जब कोई अपने बाप को ढूँढने निकलता है तो पैर हल्के होने चाहिए, पर मेरे पैर भारी थे। मेरे दिल को पता था — मैं जिसे ढूँढ रहा हूँ, वो मुझे नहीं चाहता। वो मेरे लिए कुछ लिखकर गया है और उसमें दो शब्द हैं — मत आना।
लेकिन मैं जा रहा था।
क्योंकि मुझे भी उतना ही हक़ था उस आदमी से बात करने का, जितना उसे चुप रहने का।
अब सुनो — उस दोपहर भारद्वाज भवन में जो हुआ, वो मुझे शाम को पता चला। और उस वक़्त मैं थाने के बाहर वाली बेंच पर बैठा था, और काजल फोन पर रो रही थी।
पापा भवन पहुँचे। गेट पर गार्ड ने उन्हें रोका, नाम पूछा, सूची देखी। फिर उन्हें अंदर भेज दिया।
सफ़ेद पत्थर की सीढ़ियाँ थीं। चौड़ी। हर क़दम पर आवाज़ गूँजती थी। दूसरी मंज़िल। दरवाज़ा खुला। रणवीर अपनी मेज़ के पीछे बैठा था, हाथ में कुछ काग़ज़ था जिस पर वो झुका हुआ था।
उसने सिर उठाया। और मुस्कुराया।
उस दोपहर रणवीर अच्छे मूड में था — गार्ड ने बताया था। उसने पापा को देखकर कहा — आइए, शंकर जी, आइए।
कुर्सी खींची गई। पापा नहीं बैठे।
"चाय लगवाऊँ?" रणवीर ने पूछा था। "आप मेरे पुराने मेहमान हैं, शंकर जी। आपकी चाय में चीनी कम और अदरक ज़्यादा। है ना?"
पापा खड़े रहे।
काजल ने बताया कि पापा के हाथ में एक चाबी थी। पुरानी। बड़ी। काली लोहे की। उन्होंने उसे मेज़ पर नहीं रखा। हाथ में ही पकड़े रहे।
"मैं आपसे कुछ नहीं माँगने आया हूँ," पापा ने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "मैं कुछ बताने आया हूँ।"
रणवीर ने काग़ज़ बंद किया और मेज़ पर रख दिया। वो पीछे झुके, कुर्सी पर।
"बताइए।"
"वो पन्ना।" पापा ने कहा। "जो आपने मुझसे लिया था। सात अंगूठों वाला। अस्पताल की ज़मीन वाला।"
रणवीर की मुस्कान कम नहीं हुई।
"वो पन्ना मेरे पास नहीं है," उसने कहा।
"मुझे पता है।" पापा ने कहा। "पर मैं आपको बताने आया हूँ कि आज साँझ को, उस मैदान में, सबके सामने — जो अंगूठा मैंने डरकर लगाया था, वो मैं खुद बताऊँगा। किसके डर से लगाया था, कैसे लगवाया गया था — सब।"
काजल ने बताया कि उस वक़्त रणवीर चुप रहा। पूरे तीन-चार पल। और उन तीन-चार पलों में कमरे की हवा भारी हो गई थी।
फिर वो हँसा।
"शंकर जी," उसने कहा, "आप अच्छे आदमी हैं। इमानदार। ऐसे आदमी अब कम बचे हैं।" वो आगे झुका। "पर इमानदार आदमी को एक बात पता होनी चाहिए — इमानदारी की भी एक क़ीमत होती है।"
"जानता हूँ," पापा ने कहा। "बाईस साल से चुका रहा हूँ।"
"नहीं चुकाए," रणवीर ने कहा। "बाईस साल से मैं आपको चला रहा हूँ। सोचिए — अस्पताल का इलाज, आपकी बीवी की दवा, महीने का हिसाब। काग़ज़ पर आपका अंगूठा है, शंकर जी। और काग़ज़ पुराना होकर ख़त्म नहीं होता। वो और मज़बूत होता जाता है। समय के साथ उसकी स्याही गहरी होती जाती है।"
"तो आप मुझे उससे डराएँगे?"
"मैं आपको किसी चीज़ से नहीं डरा रहा।" रणवीर ने अपनी आवाज़ में नरमी डाली। "मैं आपको गिनकर बताता हूँ — इस गली में आपका घर है। आपकी बीवी बीमार है, उसका इलाज चल रहा है। आपकी बेटी नर्सिंग करती है, अगले साल उसकी परीक्षा है। आपके बेटे की दुकान का काग़ज़ आपके नाम पर नहीं है — जगदीश जी के नाम पर है।"
पापा चुप रहे।
"और बात सिर्फ़ आपकी नहीं है, शंकर जी।" रणवीर उठा और खिड़की की तरफ़ चला। "अगर आज शाम आप खड़े होकर सब बोल देंगे — मैं आपको साफ़ बता रहा हूँ — मैं खुद कुछ नहीं करूँगा। काग़ज़ मेरे हाथ में नहीं है। पर कुछ चीजें अपने आप हो जाती हैं। अस्पताल की छत पुरानी है। दुकान का काग़ज़ पुराना है। बेटी की परीक्षा के क"…बेटी की परीक्षा के काग़ज़ भी रास्ते से भटक सकते हैं।"
पापा ने उसकी बात काटी नहीं। वो खड़े रहे, हाथ में वो पुरानी चाबी पकड़े, जो उन्होंने रणवीर की मेज़ पर अभी तक नहीं रखी थी।
"आप ठीक कहते हैं," पापा ने कहा। "काग़ज़ पुराना होकर ख़त्म नहीं होता। स्याही गहरी होती जाती है।"
"तो?"
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