The Mysterious Bell132 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 132

6 min read November 5, 2026

"तू," उन्होंने उस आदमी की तरफ़ उँगली उठाई, "तू अपना मुँह संभालके रख। मेरा बेटा यहाँ अपने बाप के अंगूठे का सौदा करने नहीं आया है।"

आदमी ने पान चबाते हुए उन्हें देखा। फिर बोला, बड़ी मीठी आवाज़ में, "अरे बाई जी, सौदा तो तुम्हारा बेटा खुद कर रहा है। हम तो बस काग़ज़ माँग रहे हैं। काग़ज़ जो खुद आया था। खुद के पैरों से।"

"चुप कर!" रज्जो बाई की आवाज़ ऊँची हो गई। "बारह दिन पहले किसने मेरे बेटे को साइट पर बुलाया था? किसने उसे पक्की नौकरी का सपना दिखाया? किसने उसके हाथ में वो पीला काग़ज़ थमाया?"

"उसका जवाब सुनना है?" आदमी ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे मैं कोई जज हूँ। "जवाब ये है कि उसका हाथ आगे बढ़ा था, और काग़ज़ उसने लिया था। हमने नहीं थमाया, हमने सिर्फ़ दिखाया।"

मुझे लगा मेरी जेब में छोटी घंटी हिली। नहीं हिली। बस मुझे लगा।

"ठीक है," आदमी ने हाथ हिलाया, "इतनी बहस से कुछ नहीं होगा। मैं बता दूँ, बाई जी, साहब ने मशीन का वक़्त पक्का कर दिया है। दो दिन बाद सुबह, सात बजे, यहाँ के पीछे वाले प्लॉट पर मशीन खड़ी होगी। उससे पहले तुम्हारा बूढ़ा यहाँ से उठ जाए, तो अच्छा है। नहीं तो मशीन खुद उठा देगी।" उसने अस्पताल की पीली दीवार की तरफ़ सिर हिलाया। "दो दिन में ये दीवार ज़मीन पर आएगी। और अगर साहब की मेहरबानी हो गई, तो बच्चा ज़िंदा बच जाएगा।"

"तू…" रज्जो बाई की आवाज़ फँस गई।

"मैं कुछ नहीं," आदमी ने कहा। "मैं तो यहाँ हिसाब लेने आया हूँ।" उसने शाहिद की तरफ़ उँगली उठाई। "ये सुन ले, बेटा। काग़ज़ लेकर आएगा, तो तेरी नौकरी पक्की, और तेरे बाप का इलाज भी साहब के खाते से। ठीक से सुन — साहब के खाते से। नहीं तो दोनों बाहर। बाप यहाँ से, और तू साइट से।"

शाहिद का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने एक बार अपनी माँ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर ज़मीन की तरफ़।

और रज्जो बाई ने वो किया जो गली की औरतें करती हैं जब शब्द खत्म हो जाते हैं।

उन्होंने अपनी चप्पल पैर से निकाली।

हाथ में उठाई।

और उस आदमी की तरफ़ बढ़ गईं।

"रुक जा, रज्जो!" मैंने कहा, पर मेरी आवाज़ कमज़ोर थी, क्योंकि मन में मैं भी उसे एक चप्पल मारना चाहता था।

"मेरे बेटे को बाप के अंगूठे का सौदागर मत बना!" वो चिल्लाईं, चप्पल हवा में। "मेरे बेटे के हाथ काँपते हैं — तुझे पता है क्यों काँपते हैं? क्योंकि वो तेरे जैसा नहीं है। वो अपने बाप से डरता है, और तेरे जैसे लोग उसी डर पर कुर्सी बनाकर बैठ जाते हैं।"

आदमी ने एक हाथ से उनकी कलाई पकड़ी। बड़ी आसानी से। जैसे कोई पंखा पकड़ ले। वो मुस्कुराया, और उस मुस्कान में पान की लाली थी।

"बाई जी," उसने कहा, "हाथ रखो। ये आदमी बेचने आया है, मैं नहीं। और इस गली में अगर कुछ बिकना है, तो बिकेगा। मैं तो सिर्फ़ काग़ज़ लेने वाला मुहर्रिर हूँ।"

मैंने आगे बढ़कर रज्जो बाई का हाथ पकड़ा और उन्हें हल्के से पीछे किया। फिर अपने हाथ से उस आदमी की कलाई छुड़ाई। बड़ी नरमी से, पर साफ़ इशारे में।

"इतना ज़ोर मत लगाइए," मैंने कहा। "ये अस्पताल का गेट है, आपकी साइट नहीं।"

आदमी ने मेरी तरफ़ देखा। पहली बार गौर से।

"तू कौन है?"

"मैं तो मिस्त्री हूँ," मैंने कहा। "साइकिल ठीक करता हूँ। तेरे जैसे लोगों की खुद की चीज़ें बड़ी जल्दी टूट जाती हैं, पता है? चेन टूट जाती है, जूता फट जाता है, काग़ज़ के किनारे जल जाते हैं।"

उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें सिकुड़ीं। फिर वो हँसा।

"अच्छा," उसने कहा, "तू ही है।"

"ही है क्या?"

"शंकर यादव का बेटा।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। ज़ुबान पर कई बातें आईं। मैंने कुछ नहीं कहा। बस शाहिद की तरफ़ बढ़कर उसकी कलाई पकड़ ली। उसकी नब्ज़ बहुत तेज़ चल रही थी, जैसे घुटने पर पट्टी बाँधी हो किसी की।

मैंने उसके कान के पास धीरे से कहा, "भागने से काग़ज़ नहीं बचता, शाहिद। और हाथ काँप रहा है तो सच बोल दे। सच बोलने से हाथ कम काँपता है। मैंने आज़माया है।"

शाहिद ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो इंसान को बच्चा बना देता है। और मैं उसे पहचानता था। क्योंकि वो मेरे भीतर भी बैठा हुआ है, हर वक़्त, बस मैं उसे हँसी से ढक देता हूँ।

"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने वो काग़ज़…"

"अभी नहीं," मैंने कहा। "अभी तेरी माँ खड़ी है।"

तभी पीछे से तेज़ क़दमों की आवाज़ आई।

काजल।

सफ़ेद कोट में। दौड़कर आ रही थी, सीढ़ियों से उतरकर, गलियारे से बाहर। कोट उसके शरीर से बड़ा था, आस्तीनें मोड़ी हुई थीं, गले में स्टेथोस्कोप लटक रहा था — वो पुराना वाला, जिसकी रबर की नली पर टेप लिपटा हुआ है। दौड़ते हुए वो ऐसी लग रही थी जैसे कोई बच्ची डॉक्टर का कपड़ा पहनकर खेल रही हो। पर उसका चेहरा बच्ची का नहीं था।

"भैया!" उसने गेट पर ही आवाज़ दी। "डॉक्टर साहब ने बुलाया है। यूसुफ़ मियाँ की साँस फिर भारी हो गई है। ऊपर आ जाओ। जल्दी।"

मैंने यूसुफ़ मियाँ की तरफ़ देखा। वो मेरे हाथ पर टिके हुए थे, और उनकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे कोई पुराना पंप धक्का लगाकर चल रहा हो। उनके होंठ खुले थे।

"चाचा," मैंने कहा, "सुन रहे हो?"

उन्होंने सिर हिलाया। बोले नहीं।

"ठीक है," मैंने कहा। "हम अंदर चलते हैं।"

पर तभी वो मोटा आदमी बोला।

"अरे रुक।" उसकी आवाज़ बदल गई थी। हँसी नहीं थी। सिर्फ़ काम की आवाज़। "तू शंकर यादव का बेटा है ना?"

मैं रुका, पर पलटा नहीं।

"साहब ने पहले ही बता दिया था," उसने कहा। "कहा था कि आज यहाँ शंकर यादव का बेटा भी आएगा। उसका काग़ज़ भी तैयार रखना।" उसने जेब से एक छोटी सी पर्ची निकाली, देखी, फिर जेब में वापस डाल दी। "तो सुन ले। तेरे पापा का काग़ज़ भी तैयार है। दो महीने पहले का। उनका अंगूठा उसमें सूख चुका है। नया काग़ज़ भी है। तेरे नाम का भी है।"

मेरा गला सूख गया।

मैंने अपने होंठ कसे। मुस्कुराने की कोशिश की। मुस्कान आई नहीं। तो मैंने सीधा जवाब दिया।

"काग़ज़ बहुत है तुम्हारे पास," मैंने कहा। "पर अंगूठा कहीं नहीं है।"

वो हँसा।

"अंगूठा बहुत है," उसने कहा। "अंगूठे की कमी नहीं। बस हाथ ढूँढ़ने पड़ते हैं।"

वो मुड़ा। उसने अपना कोट ठीक किया, पान की पीक फिर थूकी — इस बार नीम की जड़ पर — और चल दिया।

पर पाँच कदम जाकर वो फिर रुका।

वो पलटा। मुझे देखा।

"अच्छा, एक बात," उसने कहा, "साहब ने ये भी कहा था — कि तू घंटी वाला है।"

मेरे भीतर की सारी हवा जम गई।

"घंटी वाले को बोल देना," उसने मुस्कुराते हुए कहा, "कि घंटी अच्छी चीज़ है। घंटी बजती है तो आवाज़ आती है। और आवाज़ वाले आदमी को ढूँढ़ना आसान होता है।" उसने अपना हाथ उठाया, जैसे कोई आशीर्वाद दे रहा हो। "बाकी, तेरे पापा का काग़ज़ कब लेना है, बता देना। साहब आजकल फ्री में काम नहीं करते।"

वो चल दिया।

उसके जाने की आवाज़ — भारी जूते, धूल, फिर सड़क — सब पीछे छूट गई।

मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

रज्जो बाई मेरी बगल में थीं, चप्पल अब भी हाथ में थी। शाहिद ने उनका हाथ देखा, और उन्होंने शर्म से चप्पल ज़मीन पर रख दी, पैर में डाली — पर पैर सही जगह पर नहीं गया। वो दोबारा पहन रही थीं।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho