The Mysterious Bell – Chapter 130
कुछ देर सब चुप रहे। दूसरे कमरे से माँ की खाँसी आई — वो खाँसी जो किसी की जान पर बोझ होती है, जो किसी की नींद खराब करती है, पर जिसे सुनने के लिए किसी को जगाना पड़ता है।
मुझे लगा कि मुझे अब बोलना चाहिए। मैंने अपना मुँह खोला, और बोला वो जो मैंने सैकड़ों बार सोचा था, जो सच लगता था, जो मुझे मदद करता था हर बार जब कोई काग़ज़, कोई मोहर, कोई शर्त मेरे सामने आती थी।
"ऐसे काग़ज़ तो मैं रोज़ देखता हूँ," मैंने कहा। "मेरे पास से रोज़ गुज़रते हैं। किसी दुकान के लिए, किसी ठेले के लिए, किसी ज़मीन के लिए। तो तुम लोग…"
मेरी जेब में घंटी ठंडी हुई। अचानक ऐसी ठंडी, जैसे ठंडे पानी की बोतल किसी ने मेरी जेब में रख दी हो। और फिर उसमें से एक चुभन निकली — पतली, तेज़, बर्फ़ की सुई जैसी। मेरी रीढ़ से चलती हुई मेरे कान तक आई और मेरी ज़ुबान को ऐसे पकड़ लिया जैसे कोई रस्सी पकड़ ले।
मैं रुक गया।
क्योंकि वो सच नहीं था। ऐसे काग़ज़ मैं रोज़ नहीं देखता था। मैं रोज़ अपनी दुकान पर पंचर देखता था, चेन देखता था, टूटी हुई घंटियाँ देखता था। ऐसे काग़ज़ मैंने पहली बार तब देखा जब बबलू ने मेरी गर्दन पकड़ी थी और कहा था कि बड़े साहब की नज़र मेरी दुकान पर है। और दूसरी बार तब देखा जब अपने ही पापा के अंगूठे का निशान देखा। मैं ऐसे काग़ज़ों से डरता था, और मैंने ये डर छुपाने के लिए अपनी ही ज़ुबान से झूठ निकाल दिया — कि मैं इनका आदी हूँ।
जब तुम अपने रोज़ के काम में झूठ नहीं बोल सकते, तो तुम्हें अपनी ही आदतें बदलनी पड़ती हैं।
मैंने आँखें बंद कीं। गहरी साँस ली। और फिर आँखें खोलकर शाहिद और यूसुफ़ मियाँ दोनों की तरफ़ देखा।
"मैं ग़लत बोलते बोलते रुक गया," मैंने कहा। "माफ़ी। मुझे ये नहीं कहना चाहिए था कि ऐसे काग़ज़ रोज़ देखता हूँ। सच ये है कि मैं इनसे डरता हूँ। मैं अपने पापा के अंगूठे से डरता हूँ। मैं ये भी नहीं जानता कि अब क्या करना है। पर एक बात मुझे पक्का पता है — हम तीनों इस गलियारे में इसलिए खड़े हैं कि हम में से कोई किसी से सच नहीं बोल रहा।"
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा। सीधा। बिल्कुल सीधा।
"अब आप दोनों," मैंने कहा। "एक-एक सच्ची बात बोलो। बहाना नहीं। बात को घुमाना नहीं। सिर्फ़ एक सच्ची बात। जो आपने कभी किसी को नहीं बोली।"
कमरे में चुप्पी ऐसी उतरी जैसे कोई भारी कपड़ा फ़र्श पर गिरा हो। काजल दरवाज़े के पास खड़ी थी, उसके हाथ में परची थी, पर वो अब भी थी — जैसे स्टेथोस्कोप की नली की तरह, जो सुनती है पर बोलती नहीं।
शाहिद ने पहले बोला।
उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे गर्मी में कोई नल सूख जाता है और फिर अचानक पानी आ जाए, पर पहला पानी कीचड़ वाला होता है।
"मैं डरता हूँ," उसने कहा। "बहुत डरता हूँ। मुझे रात को नींद नहीं आती। साइट पर सीमेंट ढोते वक़्त मेरे हाथ काँपते हैं और मुझे लगता है कि बोरी फिसलकर मेरे सीने पर गिरेगी। पर वो डर नहीं है। असली डर ये है —" उसने कुर्सी में बैठे अपने पापा की तरफ़ देखा। "असली डर ये है कि पापा मर जाएँगे। और उस दिन मेरे पास किराया भी नहीं होगा।"
यूसुफ़ मियाँ ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"मैं जानता हूँ," शाहिद ने कहा, "ये सुनकर आपको कैसा लगेगा। पर ये सच है। मैंने काग़ज़ इसलिए छिपाया कि मैं सोचता रहा कि अगर इलाज मुफ़्त हो गया और नौकरी पक्की हो गई, तो मैं कम से कम इंसान की तरह जी सकूँगा। मुझे ये नहीं सोचना पड़ेगा कि महीने के आख़िर में क्या बेचूँ। मैं…" उसकी आवाज़ फिर अटकी। "मैं डरता हूँ कि मैं अपने पापा को बचा नहीं पाऊँगा। और शायद मैं ये भी डरता हूँ कि वो मुझ पर बोझ बन रहे हैं, और मैं ऐसा सोचना नहीं चाहता, पर सोचता हूँ। और यही सबसे ज़्यादा डरावना है।"
कमरे में कोई नहीं हिला।
यूसुफ़ मियाँ ने अपनी आँखें खोलीं। उनका चेहरा ऐसा था जैसे उन्होंने अभी कुछ खोया हो और वो भी जानते हों कि खोया हुआ वो वापस नहीं आएगा — पर वो खोया हुआ कोई चीज़ नहीं थी, वो एक शब्द था।
"मैं जानता था," वो धीरे से बोले, "कि बेटा रात को रोता है। मैंने सुना है। मैंने दो बार आँख खोलकर देखा है — वो सिर ज़मीन की तरफ़ करके रोता है।" वो रुके। "मैंने उसे कभी गले नहीं लगाया। दस साल में। आपको पता है क्यों?"
किसी ने जवाब नहीं दिया। यूसुफ़ मियाँ ने खुद अपना सवाल उठाया।
"क्योंकि डर था कि वो रोएगा तो मैं रो दूँगा। और अगर मैं रो दूँगा तो घर कौन सँभालेगा?"
मैंने अपनी जेब में हाथ रखा। छोटी घंटी अब भी ठंडी थी, पर वो मेरी ज़ुबान को पकड़े हुए नहीं थी। वो सिर्फ़ सुन रही थी।
"मुझे एक डर है," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। उनकी आवाज़ पहली बार ऐसी निकली जैसे किसी पुराने मकान की छत से पहली बार बारिश का पानी टपक रहा हो। "मुझे डर है कि मेरा बेटा मुझे छोड़कर चला जाएगा। एक दिन वो कहेगा — बस, अब नहीं। और वो साइट पर रहने लगेगा, या दूसरे शहर चला जाएगा, और मुझे खबर भी नहीं होगी। मैं इस कुर्सी में बैठा रह जाऊँगा और वो अपनी ज़िंदगी जीने लगेगा।" उनकी आँखें भर आईं। "और यही डर मुझे रात को जगाए रखता है, शाहिद। तेरे रोने की आवाज़ नहीं। मेरा ही डर।"
दोनों पिता-पुत्र ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
मुझे लगा कि अब घंटी कुछ कहेगी। कुछ बड़ा, कुछ भारी। मैंने उम्मीद की कि वो कहेगी — अठठारह? बीस? उन्नीस? मैंने सुना उसका नाम लेने की तैयारी की।
पर घंटी चुप रही।
और अगले पल शाहिद की जेब से फोन बजा।
वो आवाज़, सीटी जैसी, तीन बार, चार बार — बिल्कुल वैसी जैसे साइट पर किसी ट्रक का हॉर्न। शाहिद ने फोन निकाला, स्क्रीन देखी, और उसका चेहरा एक पल में बदल गया। रोना चला गया। डर आ गया।
उसने फोन अपने कान से लगाया। उसने "हाँ" कहा, फिर कुछ नहीं बोला। फिर बोला, "अभी?"
मैंने काग़ज़ की तरफ़ देखा। मैंने देखा कि शाहिद की नज़रें उसी काग़ज़ पर हैं। और मैंने देखा कि उसके हाथ में पसीना आ गया।
"लेकिन मैं…" शाहिद ने कहा। "मैंने अभी तक…"
उधर से कोई बोल रहा था। शाहिद ने अपना सिर झुका लिया। उसने घूमकर अपने पापा की तरफ़ देखा, फिर अपनी माँ की तरफ़ जो अब भी दूसरे कमरे में खाँस रही थी, फिर मेरी तरफ़।
और फिर उसने वो किया जो मुझे आज तक समझ नहीं आया — या शायद मैं खुद को समझाना नहीं चाहता था।
उसने मेज़ से काग़ज़ उठाया। उसे मोड़ा। उसे अपनी जेब में नहीं रखा — उसने उसे अपनी छाती से लगाया, और दरवाज़े की तरफ़ भागा।
"शाहिद!" यूसुफ़ मियाँ ने पुकारा। पर वो नहीं रुका।
डॉक्टर इसरानी ने हाथ बढ़ाया। "बेटा, रुको…"
शाहिद गलियारे में भागा। बायें मुड़ा। सीढ़ियों की तरफ़। उसके जूतों की चाप सुनाई दी, फिर और तेज़, फिर धीमी, फिर सीढ़ियों पर, फिर गायब।
यूसुफ़ मियाँ कुर्सी से उठने की कोशिश कर रहे थे, पर उनकी टाँग ने साथ नहीं दिया। वो कुर्सी में वापस गिर पड़े, और उनका मुँह बोला, "शाहिद…"
काजल मेरे पास आई। उसका चेहरा सख़्त था।
"अंकुश," उसने कहा, "अब क्या?"
मैंने अपनी जेब में हाथ रखा। छोटी घंटी ठंडी थी, पर अब उसमें एक तरह की कसमसाहट थी — जैसे कोई चीज़ मुझसे कहना चाह रही हो, पर बोल न पा रही हो।
मैं गलियारे की तरफ़ भागा।
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