The Mysterious Bell – Chapter 124
पापा कोने में खड़े थे। हाथ में स्टील का गिलास, जिससे पानी फ़र्श पर टपक रहा था। उनकी आँखें बहुत बड़ी हो गई थीं और वो हिल नहीं रहे थे, जैसे कोई उन्हें जड़ से पकड़कर खड़ा कर दे। मैंने अपने पापा को पहले कभी ऐसा नहीं देखा था।
"माँ," मैंने कहा और उनके पास घुटने टेक दिए। "माँ, देखो, मैं आ गया।"
उन्होंने आँखें खोलीं। उनकी आँखें कुछ पहचान नहीं रही थीं।
"अंकुश?" उनकी आवाज़ गले से नहीं, कहीं और से आ रही थी।
"हाँ माँ, मैं हूँ।"
"तूने खाना खाया?" उन्होंने पूछा।
और मैं वहीं टूट गया। इस हालत में भी उन्हें यही याद था।
"खाया माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप गई। "खाया। तुम ठीक हो जाओ, फिर दो प्लेट खाऊँगा।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो नर्स थी जो अभी पढ़ रही है, पर उसके हाथ ठीक से काम कर रहे थे — उसने माँ की नाड़ी पकड़ी, घड़ी नहीं थी तो अपनी उँगली से गिनी, फिर मेरी तरफ़ देखकर कहा, "धड़कन तेज़ है और बहुत पतली। यह सिर्फ़ खाँसी नहीं है, अंकुश। यह वही है जिसके बारे में डॉक्टर इसरानी ने कहा था — इलाज रुका तो…"
वो पूरी बात नहीं बोली। बोलने की ज़रूरत नहीं थी।
मैंने माँ के पैरों की तरफ़ देखा। उनके पैर ठंडे थे। बहुत ठंडे। मैंने उन्हें अपनी हथेलियों में लिया।
"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ एकदम साफ़ निकली, जैसी मुझे नहीं आती थी। "गाड़ी। गली के मुहाने से कोई टेम्पो पकड़िए। रास्ते में मिले तो। अभी।"
पापा ने गिलास मेज़ पर रखा। उनके हाथ काँप रहे थे, पर उन्होंने गिलास ठीक से रखा, यह देखकर मुझे किसी चीज़ का भरोसा आया।
"मैं जा रहा हूँ," उन्होंने कहा। यही दो शब्द। और फिर वो दौड़े — पचपन साल की झुकी कमर लेकर दौड़े।
तभी दरवाज़े पर छाया पड़ी।
रज्जो बाई खड़ी थी। उसने हमारे पीछे-पीछे दौड़कर आना चाहिए था, पर वो साँस नहीं फूलने दे रही थी। उसने बैग ज़मीन पर रख दिया और घुटनों के बल मेरे पास बैठ गई। उसने माँ का सिर बड़ी नरमी से अपनी गोद में लिया, जैसे कोई पुरानी आदत हो। "बहन," वो बोली, "बहन, आँख खोलो। मैं रज्जो हूँ। तुम्हारे घर आई हूँ।"
माँ ने उसे देखा। शायद पहचाना नहीं, पर उनकी साँस की आवाज़ थोड़ी कम हुई।
मैंने रज्जो बाई की तरफ़ देखा। उस औरत ने अभी-अभी मुझे बताया था कि उसका बेटा साइट पर सीमेंट ढोता है और उसके हाथ फटे हैं, और अब वो मेरी माँ का सिर अपनी गोद में लेकर बैठी थी, और उसकी आँखों में कोई हिसाब नहीं था, कोई शर्त नहीं थी।
काजल उठी। उसने अपना बैग उठाया, उसकी ज़िप लगाई, और फिर उसने मेरी तरफ़ ऐसा देखा जैसे वो मुझसे बड़ी हो, बहुत बड़ी हो।
वो दरवाज़े के पास गई और वहीं खड़ी हो गई। उसके हाथ में बैग था, उसके पैरों में चप्पल थी, और उसकी आँखों में वो सूखापन था जो रोने के बाद आता है।
उसने कहा, "अंकुश, अब अस्पताल नहीं गए तो कभी नहीं जाएँगे।"
और मैंने अपनी माँ को गोद में उठाया।
॥
मैंने माँ को गोद में उठाया तो पता चला कि वो कितनी हल्की हो गई हैं। जैसे कोई बच्चा उठा लिया हो। मेरी छाती से उनका सिर टिका था और उनकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी — गरम, तेज़, जैसे कोई छोटी सी गाड़ी ऊपर चढ़ाई चढ़ रही हो।
काजल आगे बढ़ी और दरवाज़ा खोल दिया। बाहर गली में शाम की रोशनी पीली पड़ रही थी। पीपल के पत्ते हिल रहे थे और उनकी आवाज़ आ रही थी जैसे कोई दूर से काग़ज़ फाड़ रहा हो।
रज्जो बाई ने मेरी कुहनी पकड़ी। "धीरे, बेटा। सीढ़ी है। पैर संभाल।"
मैंने माँ को कसकर पकड़ा और सीढ़ी उतरा। गली में जो भी था, सब रुक गया। शबनम आपा ने चिमटी छोड़ दी और गुमटी से बाहर निकल आईं। टिंकू दौड़कर आया और मेरे पैरों के आगे खड़ा हो गया, जैसे वो रास्ता साफ़ कर रहा हो।
"उस्ताद," वो बोला, "उस्ताद, बूढ़े काका की साइकिल ले लूँ? उसमें बड़ी सीट है।"
"नहीं," मैंने कहा। "पापा टेम्पो लेने गए हैं। तू पीपल तक दौड़ और देख कि वो आ रहे हैं या नहीं।"
टिंकू उसी पल भागा। उसके घुटने पर पट्टी थी और वो फिर भी हवा से बात करता हुआ भागा — मुझे आज तक समझ नहीं आया कि उसमें इतनी ताक़त कहाँ से आती है।
पीपल के नीचे चबूतरी पर जो बुज़ुर्ग बैठे थे, वो सब उठ खड़े हुए। बंसी बाबा ने अपनी लाठी टिकाकर खड़े होने की कोशिश की और रहमत बाबा ने उन्हें संभाला। दोनों अब साथ बैठते हैं, ये मैंने कुछ दिन पहले ही देखा था। ऐसे लगता है जैसे पचास साल की चुप्पी के बाद उनके पास बोलने के लिए इतना कुछ है कि वो चुप नहीं हो पाते।
"सुशीला?" बंसी बाबा ने कहा। "ये सुशीला है?"
"हाँ बाबा," काजल ने कहा। "हम अस्पताल ले जा रहे हैं।"
"जाओ, जाओ," उन्होंने हाथ उठाया। "और बेटा, सुन —" उनकी आवाज़ भारी हो गई, "अस्पताल में जो दीवार पीली है न, उसके नीचे एक बार मैं भी बैठा था। वहाँ से कोई खाली हाथ नहीं जाता। जा।"
मुझे उनकी बात समझ नहीं आई, पर मैंने सिर हिला दिया। माँ का वज़न मेरी बाँहों में बढ़ता जा रहा था और मेरी पीठ पर पसीना आ गया था।
गली के मुहाने पर टेम्पो आया। पापा ने खिड़की से हाथ निकालकर इशारा किया। उनकी झुकी कमर आज भी झुकी थी, पर उनकी आवाज़ अंदर से कुछ और कह रही थी।
"लाओ," उन्होंने कहा और दरवाज़ा खोल दिया। "धीरे। धीरे से।"
मैंने माँ को टेम्पो में बिठाया। काजल उनके साथ बैठी और माँ का सिर अपने कंधे पर रख लिया। रज्जो बाई पीछे की तरफ़ चढ़ीं और मैंने उन्हें रोका — "आप घर पर रहिए, रज्जो बाई। काजल है ना।"
"बेटा," उन्होंने कहा और मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ बहुत बड़ी ग़लती कर दी हो, "मैं चंद्रेश के दफ़्तार में झाड़ू लगाती हूँ, माँ-बेटी का हिसाब नहीं जानती। पर आज मेरी बहन इस हाल में है और तू मुझे घर भेज रहा है? मैं चलूँगी। चुपचाप बैठूँगी।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने दरवाज़ा बंद किया और मैं खुद आगे बैठ गया।
टेम्पो चला। गली पीछे छूटने लगी। पीपल का पेड़, दुकान का टेढ़ा बोर्ड, शबनम आपा की गुमटी — सब पीछे। पापा ने पीछे मुड़कर माँ को देखा और मैंने उनकी आँखों में वो डर देखा जो वो पंद्रह साल से छुपा रहे थे।
"पापा," मैंने धीरे कहा।
"हाँ।"
"आप ठीक हैं?"
उन्होंने कुछ देर सोचा। फिर बोले, "नहीं।"
बस इतना। दो अक्षर। पर मेरे लिए वो दो अक्षर पंद्रह साल की चुप्पी से भारी थे।
नूर अस्पताल आया तो टेम्पो रुका। पीली दीवारें, ऊपर की मंज़िल की दो खिड़कियों में काँच नहीं थे और उनमें अख़बार की परत चिपकी थी। दरवाज़े पर लोहे का बोर्ड है जिस पर नीले रंग से लिखा है — नूर अस्पताल और उसके नीचे नाम डॉक्टर निहाल इसरानी। बोर्ड का कोना ज़ंग खा गया है।
अंदर जाते ही एक गंध आई। पुरानी दवा की गंध। स्पिरिट, फिनाइल, और उसके ऊपर कुछ मीठा सा — जैसे दादी की अलमारी खोलने पर आती है। मेरी माँ ने ये गंध सूँघी और उनके चेहरे पर एक पल के लिए कुछ उभरा। वो यह जगह पहचानती हैं। पिछले कई महीनों से पहचानती हैं।
काउंटर पर एक लड़का बैठा था जो मुझे पहचानता था। उसने नाम पूछा भी नहीं। उसने बस इशारा किया — "पहली मंज़िल, दूसरा कमरा। डॉक्टर साहब हैं।"
सीढ़ी चढ़ते वक़्त मेरी साँस फूलने लगी थी। काजल आगे-आगे चल रही थी। उसने पीछे मुड़कर देखा और कहा, "जल्दी करो।"
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