The Mysterious Bell123 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 123

7 min read November 5, 2026

पर वो नहीं हँसी।

उसकी आँखें फिर भर आईं, और इस बार उसने अपना दुपट्टा उठाकर चेहरा छिपा लिया। बहुत देर तक उसने चेहरा नहीं दिखाया। और मुझे समझ आ गया कि मैंने क्या कह दिया।

शहर में जब कोई बात दबानी होती है, तो लोग यही कहते हैं — काग़ज़ साफ़ कर दो। मतलब, मिटा दो। और मैंने उसी ज़ुबान में मज़ाक कर दिया था। वो औरत पंद्रह साल से लोगों के दफ़्तरों में झाड़ू लगा रही थी, और उसके सामने ही एक काग़ज़ पर कोई औरत का इलाज बन रहा था।

मैंने हाथ जोड़े।

"माफ़ कर दीजिए, बाई।" मेरी आवाज़ सीधी थी, कोई मज़ाक नहीं। "ये ज़ुबान दिमाग़ से पहले दौड़ जाती है। मैं ऐसा नहीं कहता, पर कह गया।"

उसने दुपट्टा नीचे किया। आँखें लाल थीं, पर उसने सिर हिलाया। "बड़े बेटे वाली बात है। तुम्हारे पापा की याद दिला दी।"

"अब पूरी बात कहिए," मैंने कहा। "कमरे में तीसरा आदमी था, वो चला गया। और फिर?"

"फिर मैं सीढ़ी से नीचे उतर गई," वो बोली। "झाड़ू सीढ़ी पर छोड़ गई। अगली सुबह जब साहब आए, तो मुझे कहा — रज्जो, आज से तू दूसरी मंज़िल नहीं चढ़ेगी। नीचे के कमरे ही झाड़ना। और उस दिन के बाद चंद्रेश ने मुझसे सीधे आँख मिलाकर बात नहीं की।"

"पर आपने नौकरी नहीं छोड़ी।"

"क्या करती?" उसने कहा। "मेरा बेटा है। इसी शहर में मज़दूरी करता है।"

वो खामोश हुई, फिर खुद ही बोली, "शाहिद। उन्नीस साल का। भारद्वाज की साइट पर सीमेंट ढोता है। सुबह छह बजे से शाम सात बजे तक। हाथ फटे पड़े हैं और उसकी कमीज़ पर अब कभी साबुन की गंध नहीं आती, बस सीमेंट की।"

मैं समझ गया कि बात कहाँ जा रही है। और मेरा पेट भारी हो गया, जैसे कोई पत्थर अंदर रख दिया हो।

"तीन दिन पहले बबलू पांडे साइट पर आया," रज्जो बाई ने कहा। "पान चबाकर। बड़ी चमकदार चेन गले में। उसने शाहिद का कंधा थपथपाया और कहा — सुन, तेरी माँ कोई सभा में जाकर बोलने न जाए। साइट पर हादसे होते रहते हैं। बोरे गिरते हैं, बल्ली फिसलती है।" वो रुकी। "और फिर हँसकर बोला — तेरी माँ की ज़ुबान लंबी है ना? तो काट देंगे।"

"शाहिद ने क्या कहा?"

"कुछ नहीं।" रज्जो बाई ने आँखें बंद कर लीं। "वो रात को घर आया, खाना नहीं खाया, और बस मेरे पैरों पर सिर रखकर रोया। फिर बोला — माँ, तू कुछ न बोलना। हमारे पास कुछ नहीं है, माँ। हम मुकदमा नहीं कर सकते।"

दुकान के बाहर पीपल की छाया और लंबी हो गई। कहीं दूर एक टेम्पो गुज़रा, उसकी आवाज़ आकर फिर लुप्त हो गई। और मैंने अपने अंदर उठती हुई एक गर्म चीज़ महसूस की, जो गुस्से जैसी थी पर गुस्सा नहीं थी — कुछ और थी, जिसका नाम मैं नहीं जानता।

"रज्जो बाई," मैंने कहा। "आप गवाही देंगी?"

उसने देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर धीमे से कहा, "मैं पंद्रह साल से उस आदमी के काग़ज़ झाड़ती हूँ। मैंने उसे कभी गुस्से में नहीं देखा। वो हर किसी को बेटा कहता है। और मेरे शाहिद को भी एक बार बेटा कहा था, जिस दिन वो दफ़्तर में नौकरी माँगने गया था। उस दिन मेरा बेटा खुश होकर लौटा था।" उसकी आवाज़ काँपी। "और आज मैं यहाँ बैठी हूँ यह सोचने के लिए कि उस एक बेटे ने मेरे बेटे का क्या कर दिया।"

फिर उसने सीधा जवाब दिया, जैसे कोई औरत बाज़ार में भाव पक्का करती है।

"मैं गवाही दूँगी। पर पहले मुझे यह जानना है कि मेरा बेटा सुरक्षित रहेगा। तुम मुझे यह भरोसा दो, तो मैं कल सभा में अपना नाम बोल दूँगी। यह भरोसा नहीं दिया, तो मैं चुप रहूँगी।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मैं कायर नहीं हूँ। पर माँ हूँ।"

उसकी बात मुझे चुभी।

क्योंकि मैं उसे भरोसा दे नहीं सकता था। मैं सोलह साल का लड़का नहीं था कि कह दूँ — चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा। मेरे पास कुछ नहीं था। एक दुकान, एक घंटी, कुछ टूटे हुए रिश्ते, और एक गली जो अभी खुद ही ठीक हो रही थी, कमज़ोर पैरों से।

मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। उसे हथेली पर रखा।

"बता," मैंने धीमे से कहा। "यह गवाह सच बोलेगी या नहीं?"

घंटी ठंडी हो रही थी। मैंने महसूस किया, जैसे उसके अंदर कोई दीया बुझ रहा हो।

"गवाह डरी हुई है," उसने कहा। "सच अधूरा है। एक डोर अभी जुड़ी हुई है जो उसके गले में है। यह गवाह तभी बोलेगी जब उसके बेटे का डर पहले किसी और के कंधे पर रख दिया जाएगा। अंक, सच का वज़न अकेले उठाने से औरत टूट जाती है।"

"तो क्या करूँ?"

"अभी कुछ नहीं।" घंटी की आवाज़ और धीमी हो गई। "अभी तेरे पास और भी कोई आ रहा है। और वो तेरे हाथ में नहीं है।"

"कौन?"

पर घंटी चुप हो गई। बिल्कुल चुप।

मैंने उसे दोबारा हिलाया। "अरे, कम से कम बता तो दे कि क्या…"

और तभी घर की तरफ़ से काजल की आवाज़ आई।

वो आवाज़ ऐसी थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। मेरी बहन दिन में सौ बार चिल्लाती है — "अंकुश, तेरा टिफ़िन फिर बासी पड़ा है," "अंकुश, मेरी किताब पर ग्रीस मत लगा," "अंकुश, ज़रा अपनी सफ़ाई का तो ख़याल कर।" वो चिल्लाना घर की आवाज़ है, जैसे कोई गाना चल रहा हो।

पर यह आवाज़ वैसी नहीं थी।

"अंकुश! अंकुश, जल्दी आ!"

मैं उठ खड़ा हुआ। स्टूल पीछे गिरा, मैंने उसे सँभाला भी नहीं।

"अंकुश!" काजल फिर चिल्लाई और इस बार उसकी आवाज़ फट गई। "माँ के होंठ नीले पड़ रहे हैं! साँस फूल रही है! अंकुश!"

रज्जो बाई भी उठ खड़ी हुई। उसने अपना बैग गोद में दबा लिया और उसका चेहरा एक झटके में सफ़ेद पड़ गया। "जाओ," वो बोली। "जाओ, बेटा।"

मैं दौड़ा।

दुकान से निकलते वक़्त मेरा कंधा दरवाज़े के छज्जे से टकराया, और मैंने दर्द नहीं महसूस किया। गली में शाम उतर चुकी थी। शबनम आपा की गुमटी से धुआँ उठ रहा था और पीपल की छाया नीली पड़ गई थी। बच्चे कुछ बोलने लगे, पर मैंने सुना नहीं। मेरी चप्पल फिसली, पैर नंगा हो गया, मैंने पीछे जाकर चप्पल पहनी भी नहीं, बस दौड़ता रहा।

और दौड़ते-दौड़ते मुझे महसूस हुआ कि जेब में घंटी ठंडी है।

ठंडी।

इतनी ठंडी जैसे उसे किसी बर्फ़ के पानी में रख दिया गया हो। कुछ दिन पहले भी एक बार ऐसा हुआ था — जब मैंने गिरधारी के सामने झूठ बोला था और घंटी ठंडी हो गई थी। पर आज मैंने कोई झूठ नहीं बोला। आज मैंने किसी चीज़ की कोशिश भी नहीं की।

मैंने दौड़ते-दौड़ते जेब में हाथ डाला और घंटी को हथेली में दबा दिया।

"क्यों ठंडी है?" मैंने पूछा। मेरी साँस उखड़ी हुई थी। "क्या हो रहा है? बोल!"

घंटी ने कहा, बहुत दूर से, बहुत धीमे, जैसे किसी गली के दूसरे सिरे से कोई बोल रहा हो —

"आज जोड़ नहीं। आज सिर्फ़ दौड़।"

घर का दरवाज़ा खुला था। मैं सीधे अंदर गया।

माँ रसोई और बैठक के बीच के फ़र्श पर बैठी थीं, चूल्हे के पास, एक हाथ ज़मीन पर और दूसरा सीने पर। साड़ी का पल्लू कमर से खुल गया था और फ़र्श पर फैला हुआ था। उनके होंठ नीले थे। सच में नीले। और उनकी साँस ऐसी आवाज़ कर रही थी जैसे कोई पुराना पंप चल रहा हो।

काजल उनके पीछे घुटनों के बल बैठी थी। उसने माँ का सिर अपनी जाँघ पर रखा था और उनके माथे पर पानी का गीला कपड़ा रख रही थी। उसका चेहरा लाल था, आँखें सूजी हुई थीं, और उसकी नर्सिंग की किताबें बैग से आधी निकली पड़ी थीं, जैसे उसने बैग उठाया और गिरा दिया हो।

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