The Mysterious Bell – Chapter 121
मैंने उसका हाथ पकड़ा और माइक नीचे किया। "मीरा, तुम्हें क्या चाहिए?"
"सच," उसने कहा, और आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो पाँच साल पुरानी थी। "मुझे सच चाहिए। तू इन बुज़ुर्गों के ज़ख़्मों को दिखाकर अपनी दुकान बचा रहा है। तू जानता है न, तेरी दुकान उस ट्रस्ट के नाम है, जिसका मालिक वो आदमी है जिसने तेरे पापा से अंगूठा लिया था। और तू यहाँ नाटक कर रहा है।"
"तुम्हारे पास जो काग़ज़ है," मैंने कहा, "वो मुझे दो।"
"क्यों? ताकि तू उसे फाड़ दे?"
"नहीं। ताकि मैं उसे सबके सामने रखूँ। कल दस बजे। उसी सभा में।"
वो रुकी।
"मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा, मीरा," मैंने कहा। "पर सच है कि मेरे पास सब जवाब नहीं हैं। मेरे पापा ने अंगूठा लगाया था। मेरी माँ पाँच साल से जानती थी। मैंने कल रात तक यह सब नहीं जानता था। अब जानता हूँ। और जब आपको कोई सच पता चलता है, तो पहले लगता है कि दुनिया खत्म हो गई। फिर लगता है कि शायद यही असली दुनिया है।"
"यह बहुत अच्छी बात है," उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में तेवर कम हो गया था। "पर सुन — मैं तुम्हें एक और मौका नहीं दूँगी। कल अगर मुझे पूरा सच नहीं मिला, तो मैं यह सारा रिकॉर्डिंग शहर को दिखा दूँगी।"
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात। आज शाम को जब मैं इन दोनों के बेटों को यहीं बुलाऊँ, तो तुम भी आना। कैमरा लेकर। और जो देखो, वो रिकॉर्ड करना।"
उसने मुझे देखा। "तू मुझे अपने नाटक में बुला रहा है?"
"मैं तुम्हें सच दिखाने बुला रहा हूँ। जानती हो, तुम्हारी सबसे बड़ी ग़लती क्या है? तुम्हें हर किसी पर शक करने की आदत है। चलो आज मैं तुम्हें बता दूँ — तुम शक करने में इतनी लग गई हो कि भरोसे की जगह ही नहीं बची।"
वो एक पल चुप रही। फिर उसने माइक बंद किया, कैमरा उतारा, और धीमी आवाज़ में कहा, "मेरे पास भरोसे की जगह नहीं बची, अंकुश। क्योंकि पाँच साल पहले मैंने एक आधा सच छापा था और एक टीचर का घर टूट गया। तब से मैंने खुद से वादा किया कि अब सिर्फ़ पूरा सच छापूँगी। पूरा। या कुछ नहीं।"
"तो आज शाम आना," मैंने कहा। "और मैं तुमसे वादा करता हूँ — पूरा सच।"
वो पलटी और चली गई। पर जाते-जाते रुकी और बोली, "मैं तेरे पापा से आज नहीं मिलूँगी। उन्हें वक़्त दे।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने तेरे पापा की तरह लोगों को डरते देखा है। और इंसान जब डरता है, तो सच नहीं बोलता। मैं उनका डर नहीं खोलना चाहती।"
वो चली गई। मैं चबूतरी पर खड़ा रहा। बाबा इक़बाल और लाला बद्रीनाथ अब एक-दूसरे से धीमे-धीमे बात कर रहे थे। कभी हँसते, कभी चुप होते। पचास साल का सन्नाटा ऐसे ही नहीं जाता — उसे धीरे-धीरे, शब्द-दर-शब्द खुलना पड़ता है।
मैं घर लौटा। पापा आँगन में बैठे थे, फिर भी पंखे के सामने। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। मैंने देखा कि उनकी आँखों में वो डर अभी भी था जो कल रात से था।
मैं उनके पास बैठ गया। चुप।
फिर बोला, "पापा, मैं आज दो बुज़ुर्गों को मिलाया। पचास साल बाद। बाबा इक़बाल और लाला बद्रीनाथ को।"
पापा ने देखा। कुछ नहीं बोले।
"पापा, जब मैं उनसे बात कर रहा था, तब मुझे लगा कि मैं आपसे बात कर रहा हूँ। क्योंकि वो दोनों भी पचास साल से एक ही बात दबाए बैठे थे — कि हमने एक-दूसरे को दोष दिया, और दोष झूठा था। और मैंने सोचा… मैंने सोचा कि जब तक मैं आपसे वो नहीं कहूँगा जो मुझे कहना चाहिए, तब तक मैं भी उन्हीं दो बुज़ुर्गों जैसा रहूँगा।"
पापा ने फिर भी कुछ नहीं कहा। पर उन्होंने मेरी तरफ़ पूरा मुँह कर लिया। यह उनके लिए बहुत था।
"पापा, मुझे डर लगता है। रोज़ लगता है। जब से घंटी मिली है, मुझे लगता है कि मैं सब ठीक नहीं कर पाऊँगा। कि एक दिन ऐसा आएगा जब मैं अकेला रह जाऊँगा। मैं मज़ाक इसलिए करता हूँ, पापा, ताकि कोई मुझसे पूछ न ले कि मैं कैसा हूँ।"
मेरी आवाज़ टूट गई। मैंने हाथ से मुँह छिपाया।
पापा ने कोई शब्द नहीं कहा। उन्होंने बस अपना हाथ बढ़ाया और मेरे सिर पर रख दिया। वो हाथ काँप रहा था। और उनकी आँखों में पानी था — पहली बार, मैंने उन्हें रोते देखा।
"मैं भी डरता हूँ," वो बोले। इतना ही कहा। पर इतना काफ़ी था।
उसी पल मेरी जेब में घंटी बजी।
"अंक," उसने कहा, "यह अलग जोड़ है। यह घर का जोड़ है। लेकिन यह अभी पूरा नहीं हुआ। यह तब पूरा होगा जब तेरा बाप उस सभा में खड़ा होकर बोलेगा। तब तक तेरा घर चुप रहेगा।"
"फिर मैं क्या करूँ?"
"इंतज़ार कर। और आज शाम को जो तू करने जा रहा है, वो कर। दोनों बेटों को बुला। उनकी सुलह भी इसी सिलसिले की कड़ी है।"
मैंने पापा के हाथ को पकड़ा। वो चुप बैठे रहे, पर इस बार उनकी चुप्पी पहले जैसी नहीं थी। इस बार वो चुप्पी बोल रही थी।
मैं उठा। दुकान की तरफ़ चला। रास्ते में उस्ताद अली बक्श की दुकान से आवाज़ आई — सिलाई मशीन की टिक-टिक। पचास साल बाद आज फिर आवाज़ आ रही थी। और मुझे लगा कि आज गली में कुछ बदल रहा है — धीरे-धीरे, पर बदल रहा है।
मैंने दुकान खोली और मेज़ पर छोटी फूल वाली घंटी रखी — वो जो उस्ताद ने दी थी। उसे देखा। वो चुप थी, पर मुझे लगा जैसे वो मेरी तरफ़ देखकर कह रही हो — "अब बड़ी घंटी से पूछ।"
मैंने बड़ी घंटी निकाली, उसे हथेली पर रखा और धीमे से पूछा, "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
घंटी ने जवाब दिया। और इस बार उसका जवाब छोटा नहीं था। इस बार उसने पूरा कहा।
"तेरा घर चुप है क्योंकि उस घर में दो आदमी हैं जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं, पर एक-दूसरे को बताना नहीं जानते। तेरा बाप पचास साल से एक अंगूठे का बोझ ढो रहा है, और तेरी माँ पाँच साल से उसे देख रही है। तू बीच में खड़ा है, दोनों से हँसकर बात करता है, और दोनों को लगता है कि तू ठीक है। पर तू ठीक नहीं है, अंक। तेरा घर इसलिए चुप है क्योंकि तीनों ने एक-दूसरे को बचाने की कोशिश में खुद को बचाना भूल दिया है।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने घंटी को जेब में रखा और दुकान के दरवाज़े पर खड़ा हो गया। बाहर गली में शाम उतर रही थी। शबनम आपा गुमटी का पहला दीया जला रही थीं। पीपल की छाया लंबी हो रही थी। और दूर कहीं, गली के मुहाने पर, एक सफ़ेद गाड़ी धीरे से गुज़री और रुक गई।
मैंने साँस ली। आज शाम दो बेटों को बुलाना था। और उसके बाद, कल सुबह दस बजे, सबसे बड़ा सच सबके सामने रखना था।
पर तभी मुझे लगा कि घंटी फिर गरम हो रही है। मैंने उसे निकाला।
"क्या?" मैंने पूछा।
"अंक," घंटी ने कहा, "आज शाम को जो होगा, वो सिर्फ़ सुलह नहीं है। वो एक औरत की ज़िंदगी का सच है जो अभी तक तेरे पास नहीं आया। और आज शाम वो तेरे दरवाज़े पर आने वाला है।"
"कौन?"
पर घंटी चुप हो गई। सिर्फ़ इतना कहा, "दरवाज़ा देख।"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
बाहर गली में एक औरत खड़ी थी। सिर पर सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में छोटा बैग, और चेहरे पर वो थकान जो सिर्फ़ उन लोगों की होती है जिन्होंने बहुत लंबा सफ़र किया हो।
मैं उसे नहीं पहचानता था। पर घंटी पहचानती थी।
और तभी उस औरत ने कदम बढ़ाया, दुकान की तरफ़, और धीमी आवाज़ में कहा, "तुम शंकर के बेटे हो न?"
मैंने सिर हिलाया।
वो मुस्कुराई। पर उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था जो बोल रहा था — "मैं तुम्हारे पापा की उस रात की गवाह हूँ जिस रात उन्होंने अंगूठा लगाया था।"
मैंने दुकान का दरवाज़ा पूरा खोल दिया।
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