The Mysterious Bell – Chapter 1151
"तू बोल क्यों नहीं रही?" मैंने धीरे से कहा।
कोई जवाब नहीं।
"अरे, मैं तुझसे पूछ रहा हूँ।"
फिर भी कुछ नहीं।
मैंने उसे जेब में रखा और मुँह धोने चला गया। पानी ठंडा था। आईने में अपना चेहरा देखा — आँखों के नीचे कालापन, बाल बेतरतीब, गले में वही पुरानी चाबी। मैंने अपने आप से कहा — आज रिकॉर्ड कमरा खोलना है। आज वो काग़ज़ बचाना है जो किसी और के हाथ में जाने वाला है।
पर जब मैं अस्पताल पहुँचा, तो सूरज अभी पूरा नहीं निकला था और उस्ताद अली बक्श पहले से गेट पर खड़े थे।
"आ गए?" उन्होंने कहा।
"आप इतनी सुबह?"
"नींद नहीं आई।" उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया। "जब पचास साल की मशीन धागा तोड़ने लगे, तो आदमी को सब कुछ टूटता दिखता है।"
हम अंदर गए। डॉक्टर इसरानी अपने कमरे के बाहर खड़े थे, हाथ में एक चाबी थी, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे रात भर वो सोए ही नहीं।
"चाबी?" मैंने पूछा।
"यही है।" उन्होंने कहा। "और यही नहीं है।"
"मतलब?"
"मतलब यह कि रिकॉर्ड कमरे का जो नया ताला कल शाम लगा था, उसकी चाबी अब मेरे पास नहीं है। समिति वालों ने रात में फ़ैसला कर दिया — काग़ज़ साहब के दफ़्तार से आएँगे, तो चाबी भी साहब के दफ़्तार जाएगी। सुबह सात बजे कोई आदमी आकर ले गया।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"कब ले गया?" मैंने पूछा।
"करीब आधा घंटा पहले। काला थैला था, सफ़ेद कुर्ता था, और मुँह पर कोई भाव नहीं था।"
मैं दौड़कर ऊपर गया। रिकॉर्ड कमरे के बाहर बूढ़ा सफ़ेद टोपी वाला आदमी अपनी चारपाई पर बैठा था, जो चालीस साल से वहीं बैठता है।
"काका, अंदर कौन गया?"
"मैंने किसी को जाते नहीं देखा।" उसने कहा, और उसकी आँखें ज़मीन पर थीं।
"काका, आप यहीं बैठे थे।"
"बेटा, मैं चालीस साल से यहाँ बैठा हूँ।" उसने धीरे से कहा। "इस दौरान मैंने बहुत कुछ देखा है और बहुत कुछ नहीं देखा है। आज वाला दूसरा है।"
मैं कमरे में गया। रैक खाली थे। धूल में चौकोर साफ़ जगहें बनी हुई थीं — जहाँ कल तक फाइलें रखी थीं। फ़र्श पर जले काग़ज़ की गंध अब भी बाकी थी, हल्की, जैसे किसी ने जल्दी में कुछ जलाया हो और बुझा दिया हो।
उस्ताद दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपनी लाठी ज़मीन पर टिका दी।
"देर हो गई।" मैंने कहा।
"नहीं।" उन्होंने कहा। "देर तब होती है जब हाथ खाली रह जाए। हाथ में अभी भी एक चीज़ है — गली।"
मैं कमरे से बाहर आया। सीढ़ियों से नीचे उतरते वक़्त मुझे लगा कि अस्पताल भी आज खाली है। कल तक यहाँ मरीज़ों की भीड़ थी, बच्चों की आवाज़ थी, बूढ़ी औरतें बेंच पर बैठी मिलती थीं। आज सिर्फ़ सन्नाटा था। एक बूढ़ी मरीज़ बेंच पर बैठी थी, वो भी अपनी पुरानी परची को हाथ में लेकर ऐसे देख रही थी जैसे उस पर लिखा हुआ नाम ही उसका आख़िरी सहारा हो।
मैं बाहर निकला, और तभी समझ आया — आज गली सिर्फ़ चुप नहीं है। आज गली बदल रही है।
मोड़ पर खड़ी दो औरतें मुझे देखकर चुप हो गईं। एक ने दूसरी की कोहनी दबाई। मैं आगे बढ़ा तो सुना —
"वही है ना? जो काला जादू करता है?"
"हाँ, वो ही। मेरी बहन कह रही थी, जो उसके पास जाता है, उसका घर टूट जाता है।"
"भगवान बचाए।"
मैं रुका। मुड़ा।
"आंटी," मैंने कहा, "मैं काला जादू नहीं करता। मैं साइकिल ठीक करता हूँ। पंचर, चेन, ब्रेक — यही मेरा काम है।"
वो दोनों चुप हो गईं। एक ने मुँह फेर लिया। दूसरी ने कहा —
"बेटा, हमें कुछ नहीं पता। हम तो बस सुनकर कह रहे हैं।"
"किससे सुना?"
"अरे, गली में सब कह रहे हैं। स्कूल में भी कहा गया है। कल सुबह की सभा में कहा गया है कि बच्चों को उस दुकान से दूर रखो।"
पेट में कुछ ठंडा सा उतरा।
मैं सीधा स्कूल गया। गेट पर रामलाल बाबा झाड़ू लगा रहे थे। मुझे देखा तो रुक गए।
"रामलाल बाबा, स्कूल में क्या कहा गया कल?"
"बेटा…"
"साफ़ बोलिए।"
उन्होंने झाड़ू टिका दी।
"बच्चों के अभिभावकों की सभा थी। किसी ने कहा कि उस दुकान पर जाने वाले बच्चों के घर में बीमारी आती है, दिमाग़ खराब होता है। दो-तीन अम्माओं ने कह दिया कि हमारा बच्चा वहाँ नहीं जाएगा।"
"और स्कूल ने?"
"स्कूल ने कुछ नहीं कहा।" उन्होंने धीरे से कहा। "स्कूल चुप रहा। और बेटा, चुप रहना भी एक बात कहना होता है।"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
तभी सानिया दिखी। स्कूल की वर्दी में, बैग कंधे पर। उसने मुझे देखा, और उसकी आँखें एक पल को रुकीं — फिर झुक गईं। वो दीवार की तरफ़ होकर निकल गई, जैसे मैं कोई खंभा हूँ।
"सानिया।"
वो रुकी, पर मुड़ी नहीं।
"तुम्हारे अब्बा ने कहा है?"
उसने सिर हिलाया। हल्का सा। हाँ में।
"तुम्हें मेरी दुकान पर नहीं आना है?"
वो कुछ नहीं बोली। बस बैग की पट्टा कसकर पकड़ लिया।
"ठीक है।" मैंने कहा। "पढ़ाई मत छोड़ना। और हाँ — तुम्हारी लाल कवर कॉपी में जो ट्रकों की लिस्ट है, वो किसी को मत देना। वो तुम्हारी है।"
वो चली गई। पर जाते वक़्त उसके कंधे हिल रहे थे।
मैं दुकान की तरफ़ मुड़ा। शबनम आपा की गुमटी से चाय की भाप नहीं उठ रही थी — बस चूल्हा जल रहा था, और वो बेंच पर बैठी थीं, हाथ में लोहे की चिमटी पकड़े, सामने देख रही थीं।
"आपा।"
"आ गया?" उन्होंने सिर उठाया।
"चाय नहीं बनी?"
"बनाई थी। तीन कप। कोई नहीं आया।" उन्होंने चिमटी मेज़ पर रखी। "सुबह से दो आदमी आए। दोनों ने नोटिस देखा, बैठे, फिर चले गए। एक ने कहा — शबनम, तू भी इस लड़के के चक्कर में बर्बाद हो जाएगी।"
"आपने क्या कहा?"
"मैंने कहा — मेरी बर्बादी मेरी चाय में है। जो पीना हो पिए, जो नहीं पीना हो, उसके लिए दरवाज़ा खुला है।" उन्होंने कहा, और फिर धीरे से। "पर बेटा, दरवाज़ा खुला रखना आसान है। उसमें से कोई आए, यह मुश्किल है।"
रज़िया पीछे से आई, बाल बाँधते हुए। उसने मुझे देखा, और उसकी आँख में गुस्सा था।
"तू रोज़ आता है।" उसने कहा। "और रोज़ गली में एक नई बात। मेरी बहन तेरे पीछे खड़ी है, इसीलिए आज उसकी गुमटी पर नोटिस लगा है।"
"बहन, चुप।" शबनम आपा ने कहा।
"मैं चुप नहीं रहूँगी।" रज़िया ने कहा। "पंद्रह साल बाद मैं लौटी हूँ, और मुझे यहाँ भी वही मिला — कोई लड़ता है, कोई भागता है, कोई चुप हो जाता है।"
मैं कुछ नहीं बोला। बोलता तो और बिगड़ता। मैंने सिर्फ़ इतना कहा —
"आपा, चूल्हा जलता रहे।"
"जलेगा।" उन्होंने कहा। "जिस दिन हाथ चिमटी उठाना भूल जाए, उस दिन बंद होगा।"
आगे बढ़ा तो उस्ताद की दुकान दिखी। शटर आधा गिरा था। वहीं खड़े भोला भाई हाथ में काग़ज़ लिए खड़े थे — वही सफ़ेद, बिना मुहर वाला।
"क्या है भोला भाई?"
"दो दिन।" उन्होंने कहा। "दो दिन में दुकान खाली करो, वरना ताला। नाम नहीं, मुहर नहीं, तारीख़ नहीं। बस काग़ज़।"
"उस्ताद ने देखा?"
"देखा। और उन्होंने कहा — मैं अपनी दुकान का ताला खुद लगाऊँगा, कोई और नहीं।" भोला भाई ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पर बेटा, यह काग़ज़ ऐसे ही नहीं आया। कल शाम को सफ़ेद कुर्ते वाला यहाँ खड़ा था और उसने उस्ताद को गली के नाम पर चेताया था।"
मैंने काग़ज़ लिया, मोड़ा, जेब में रखा। मुझे पता था इसमें कोई मुहर नहीं है, कोई तारीख़ नहीं है। इसे किसी भी अदालत में कोई नहीं मानेगा। पर गली में यह काग़ज़ काम करता है। गली में डर काग़ज़ माँगता है, मुहर नहीं।
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