The Mysterious Bell – Chapter 1144
मैं चौंका। "मैं बस—"
"तू बस क्या?" उन्होंने मेरा हाथ झटक दिया। "तेरे आने से नल में पानी बढ़ जाता है क्या?"
"अब्बा, नहीं—"
"नहीं क्या?" उनकी आवाज़ ऊँची हो गई। "तू जिसे जोड़ता है, उसका घर टूटता है। मेरी बकरी मरी। मेरी बेटी स्कूल में पीछे बैठ गई। मेरे घर सुख नहीं। और अब तू मेरी बाल्टी के पास खड़ा है। मेरा पानी छीनने आया है?"
मैं चुप रह गया।
गुड्डू के पापा बोले — "ये बात सही है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तू इसे सही मत कह," मैंने कहा। "तू अभी इससे लड़ रहा था। अब तू इसकी बात सही कह रहा है। दो मिनट पहले तू इससे उलझा हुआ था। तुझे इन बातों से फ़र्क़ नहीं पड़ता, तुझे बस बाल्टी चाहिए।"
गुड्डू के पापा झिझके।
सानिया के अब्बा बोले — "बाल्टी चाहिए तो चाहिए। पर तेरे साथ नहीं। तू जोड़ने वाला है, तेरे जोड़ से हमारी गली टूट रही है। तू दूर रह, इसी में हमारा भला है।"
मैंने बाल्टी छोड़ दी।
मैंने कहा — "अगर मैं दूर रहूँ, तो कल एक और आदमी आएगा जो कहेगा कि यह नल अब उसकी ज़मीन पर है। और तब आपकी बाल्टी के लिए पानी नहीं होगा।"
"तो वो ज़मीन का मालिक होगा," सानिया के अब्बा बोले। "ज़मीन का मालिक आए तो बात करेंगे। पर तू मालिक नहीं है। तू तो बस एक लड़का है जो साइकिल ठीक करता है और समझता है कि पूरी गली उसकी ज़िम्मेदारी है।"
मैं वहीं खड़ा रहा।
फिर मैं मुड़ा। मैं सीधा दुकान की तरफ़ गया।
पीछे से गुड्डू के पापा ने कहा — "बाल्टी का झगड़ा छोड़, ये बता, अब पानी कौन भरेगा?"
मैंने पलटकर नहीं देखा।
पर मैंने सुना — सानिया के अब्बा ने कहा — "तू भर। मुझे तेरे भरे पानी की ज़रूरत नहीं।"
छह बजे दरोगा आए।
मैं दुकान पर था। शटर उठा था पर अंदर कोई काम नहीं था। मैं दीवार से टेक लगाकर बैठा था और मेरी गोद में एक पुरानी रिंच थी जिसे मैं बार-बार घुमा रहा था।
दरोगा ने पीपल के नीचे आकर अपनी लाठी टेकी। उनके साथ तीन सिपाही थे। एक के हाथ में काग़ज़ था, बाक़ी दो के हाथ खाली।
"अंकुश यादव?"
मैं उठा।
"हाँ।"
"ये जगह सरकारी है।" उन्होंने पीपल के नीचे वाली खाली जगह की तरफ़ इशारा किया। "यहाँ तुम्हारा जो भी बोर्ड था, वो हटा दिया गया है। अब यहाँ कोई सभा नहीं, कोई काउंटर नहीं, कोई कुर्सी-मेज़ नहीं।"
"मैंने बोर्ड खुद उतार दिया था," मैंने कहा।
"तो अच्छा किया।"
उन्होंने एक काग़ज़ आगे बढ़ाया।
"ये पढ़ ले।"
मैंने पढ़ा। उसमें लिखा था कि पिछले एक हफ़्ते में इस जगह पर लगातार सभाएँ हो रही थीं और इससे कानून-व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। इसीलिए अगले तीन दिन तक यहाँ कोई सभा नहीं होगी। तीन दिन बाद समीक्षा होगी।
"तीन दिन," मैंने कहा।
"तीन दिन।"
"और तीन दिन बाद?"
दरोगा ने अपनी लाठी उठाई।
"तीन दिन बाद तुम्हारी दुकान का काग़ज़ भी आएगा," उन्होंने कहा। "और वो ज़्यादा सख़्त होगा। आज मैं तुम्हें रस्म के तौर पर बता रहा हूँ। कल से तुम यहाँ किसी को नहीं बुलाओगे। अगर बुलाया, तो कुर्सी पर बैठकर पछताओगे।"
"दरोगा जी—"
"मत बोलो," उन्होंने कहा। "मैं जानता हूँ तुम क्या कहोगे। तुम कहोगे कि मैं किसी को नहीं बुला रहा, लोग खुद आते हैं। पर आज लोग आए? तुम्हारे आसपास भीड़ थी? नहीं ना। सो अब तुम्हारे पास कोई नहीं आ रहा, और ये भी जान लो—जिसके पीछे भीड़ नहीं, उसके पीछे काग़ज़ भी नहीं होता।"
वो चले गए।
मैं खड़ा रहा।
उनकी लाठी की आवाज़ दूर तक गई। फिर गली में वो भी नहीं रही।
उस शाम गली में बच्चों की आवाज़ नहीं आई।
यह सबसे अजीब बात थी। मुझे बच्चों की आवाज़ की आदत थी। दिन में कम से कम दस बार कोई न कोई बच्चा गली में चिल्लाता था — क्रिकेट का शोर, पतंग की चिल्लाहट, पंचर वाली साइकिल की घंटी, टिंकू की हँसी, सानिया की डाँट, गुड्डू की भागदौड़। ये गली इन्हीं आवाज़ों से ज़िंदा थी।
आज कोई आवाज़ नहीं थी।
छह बजे से आठ बजे तक मैं दुकान के बाहर बैठा रहा। एक बच्चा भी नहीं दिखा। मुझे पता था कि बच्चे स्कूल से लौट चुके थे। मुझे पता था कि वो घरों के अंदर बंद हैं। मैंने किसी के दरवाज़े पर खटखटाने की नहीं सोची। अगर अब्बा ने मना किया होता, तो बच्चे डरते। और बच्चे जब डरते हैं, तो वो छुपकर भी नहीं आते। वो सीधे मान लेते हैं।
आठ बजे मैंने घंटी निकाली।
मैंने उसे हथेली पर रखा। ठंडी थी। मैंने उसे हिलाया। टन — बस एक धातु की आवाज़। फिर मैंने उसे दोबारा हिलाया। टन। तीसरी बार। टन। चौथी बार। पाँचवीं बार।
कुछ नहीं।
पहली बार ऐसा हुआ कि घंटी बजी और उसने कुछ नहीं कहा।
मैंने उसे सीने से लगाया। वो गरम नहीं हुई। न ही ठंडी पड़ी। वो बस पीतल बन गई थी।
मैं उठा। मैं अस्पताल गया।
डॉक्टर इसरानी अपने कमरे में बैठे थे। उनके सामने एक मोमबत्ती जल रही थी और वो उसकी रोशनी में कुछ काग़ज़ पढ़ रहे थे।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। उन्होंने सिर उठाया।
"आ गए," उन्होंने कहा। "बैठो।"
मैं बैठ गया। मैंने घंटी जेब से निकाली और उनके सामने रख दी।
"इसने आज कुछ नहीं कहा," मैंने कहा।
वो घंटी को देखते रहे।
फिर उन्होंने कहा — "मैंने तुम्हें कल बताया था, तुमने सुना नहीं?"
"सुना था।"
"तो फिर डर क्यों रहे हो?"
"क्योंकि कहना और होना अलग बात है," मैंने कहा। "जब वो बोलती थी, तब मुझे लगता था कि ये बोलना आसान है। अब जब वो चुप है, तब पता चल रहा है कि ये चुप्पी कितनी भारी है।"
डॉक्टर इसरानी ने घंटी उठाई। उन्होंने उसे कान के पास ले जाकर हिलाया।
"तुम्हें पता है, इस घंटी की आवाज़ किस चीज़ से आती है?"
"लोगों से।"
"हाँ।" उन्होंने घंटी रख दी। "पर लोगों से कैसे? ये समझो। ये घंटी तुम्हारे हाथ से नहीं बजती। ये उन आवाज़ों से बजती है जो तुम्हारे पीछे हैं। जब गली में कोई किसी से बोलता है, तो वो आवाज़ इस घंटी में बैठ जाती है। जब कोई किसी की मदद करता है, तो वो हाथ इस घंटी में बैठ जाता है। जब कोई माफ़ी माँगता है, तो वो काँपती आवाज़ इस घंटी में बैठ जाती है।"
वो रुके।
"और आज तुम्हारी गली में किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा। किसी ने किसी को माफ़ी नहीं माँगी। किसी ने किसी की मदद नहीं की। गली चुप थी। और जब गली चुप हो, तो इस घंटी में बोलने के लिए कुछ नहीं बचता।"
"तो ये घंटी खत्म हो गई?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "ये घंटी भूखी है। ये तुम्हें यह बता रही है कि उसका ईंधन खत्म हो गया। और ईंधन है — गली का भरोसा।"
मैंने कहा — "तो मैं क्या करूँ?"
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर उनमें वो चीज़ थी जो उम्मीद से ज़्यादा ज़िद जैसी लगी।
"तुम क्या करो?" उन्होंने दोहराया। "तुम कुछ मत करो। तुम बस उनकी आवाज़ न बनो। तुम उनकी आवाज़ बनने की कोशिश करोगे, तो वो और चुप हो जाएँगे। तुम अभी उनके बीच सबसे बड़ी चर्चा हो। इसलिए तुम उनके बीच से हट जाओ।"
"मैं कहाँ जाऊँ?"
"कहीं मत जाओ," उन्होंने कहा। "अपनी दुकान पर बैठो। चुप बैठो। काम करो। जिस दिन तुम्हारे पास कोई न आए, तब भी तुम शटर खोलो, अपनी साइकिल के पुर्ज़ों को साफ़ करो, अपने औज़ार तेल से पोंछो। गली देखेगी कि तुम डरे नहीं। और जब गली देखेगी कि तुम डरे नहीं, तो एक-एक करके लोग लौटेंगे।"
"और अगर न लौटें?"
"तो फिर सच जान लो," उन्होंने कहा। "गली तुम्हारी नहीं थी। गली कभी किसी की नहीं होती। गली बस अपनी होती है। और जो अपनी होती है, वो अपनी राह चलती है।"
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