The Mysterious Bell – Chapter 1136
“चाचा, पहले बाल्टी नीचे रखिए, पानी बह रहा है।”
“बहने दे,” उन्होंने कहा।
“पूरी गली के पैरों के नीचे पानी आएगा, कीचड़—”
“तू अपनी दुकान संभाल,” सानिया के अब्बा ने कहा। उनकी आवाज़ कड़वी थी, और उसमें वो ज़हर था जिसे मैं पहले कभी उनके लिए नहीं सुना था।
“चाचा—”
“तेरे आने से ही ये सब शुरू हुआ,” उन्होंने कहा। मेरा हाथ उनकी बाल्टी पर था। मैंने हाथ खींच लिया। “तू सबको जोड़ता फिरता है, तेरे जोड़ से ये लड़ाई है। बाल्टी छोड़ दे।”
“चाचा, ये लड़ाई बाल्टी की नहीं है,” मैंने कहा। “ये वो लड़ाई है जो कल किसी ने आपके कान में डाली है।”
वो रुके।
और उसी रुकने में उनका गुस्सा दो गुना हो गया, क्योंकि सच बोलने की चोट सबसे बड़ी होती है।
“बोलता बहुत है,” गुड्डू के पापा ने कहा। “बोलने की उमर हो गई है। अपने बाप को देख, वो कितना बोलता है। सीख ले।”
मुझे बाप की बात पर कुछ चुभ गया। वहाँ पूरी गली खड़ी थी — गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू, औरतें, एक बूढ़ा काका जो खड़ा नहीं हो सकता था पर दरवाज़े से झाँक रहा था। और सानिया। सानिया बीच में खड़ी थी, और वो अपने अब्बा की तरफ़ भी नहीं देख रही थी, और मेरी तरफ़ भी नहीं। वो सिर्फ़ ज़मीन देख रही थी।
मैंने एक लंबी साँस ली।
“ठीक है,” मैंने कहा। “बाल्टी आपकी। दोनों की। मैं दूर खड़ा हूँ।”
मैं पीछे हटा।
बाल्टी उनके बीच झूलती रही। पानी बहता रहा। और फिर बाल्टी छूटी, गिरी, उलटी, और पानी की धार एक तरफ़ को फूट पड़ी। बाल्टी लुढ़ककर मेरे पैरों के पास आई।
मैंने उसे उठाया। मेरे पैर भीगे हुए थे।
“अब बोलो,” मैंने कहा। “बाल्टी ये है। लड़ाई किस बात की है?”
दोनों चुप हो गए।
“तुम दोनों की बीवी-बच्चे एक ही नल से पानी भरते हैं,” मैंने कहा। “आज तक कभी झगड़ा नहीं हुआ। आज क्या हुआ? क्या पानी कम हो गया?” मैंने बाल्टी उनके बीच पत्थर पर रखी। “पानी वही है। डर बढ़ गया है। और डर का रास्ता नल से होकर जाता है, क्योंकि वहाँ सब मिलते हैं।”
किसी ने कुछ नहीं कहा।
“मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा,” मैंने कहा। “कल आप दोनों को याद रहेगा कि लड़ाई किस बात पर हुई थी। और आपको याद नहीं आएगा।”
मैं पलटा और दुकान की तरफ़ चला।
पीछे से गुड्डू के पापा की आवाज़ आई, धीमी, थकी हुई।
“अंकुश।”
मैं रुका।
“तेरे पास जो भी है,” उन्होंने कहा, “वो हमारे काम का नहीं। तू हमें छोड़ दे। हम ऐसे ही ठीक हैं।”
मैंने पलटकर देखा।
“ठीक नहीं हैं,” मैंने कहा।
और मैं चला आया।
शाम चार बजे चबूतरी पर कोई नहीं आया।
उस्ताद आए, अपनी सिलाई मशीन के साथ — मशीन बंद, कपड़े से ढकी, वो उसे गोद में रखकर लाए, ऐसे जैसे कोई बच्चा ला रहा हो। मशीन भारी थी। वो उसे उठाकर फ़र्श पर रखकर सीधे खड़े रहे और साँस नहीं ली, ताकि पता न चले कि उनकी कमर दुख रही है।
शबनम आपा आईं, हाथ में स्टील का गिलास, और रज़िया।
मैं आया।
और पाँच बजे तक सिर्फ़ हम चार थे।
न पीपल के नीचे बैठने वाले बुज़ुर्ग, न औरतें, न बच्चे। एक-एक करके दरवाज़े खुले, लोगों ने झाँका, और बंद कर दिए। काका खाँसते हुए आए, खड़े रहे, और वापस चले गए — उनकी आँखों में वो शर्म थी जो मैं जानता था।
पाँच बजे उस्ताद ने घड़ी देखी।
“बहुत हो गया,” उन्होंने कहा।
उन्होंने मशीन उठाई। मैंने उनका हाथ पकड़ा — उनकी कलाई पतली थी, हड्डी ऊपर उभरी हुई।
“मैं उठाता हूँ,” मैंने कहा।
“मेरी मशीन है।”
“तो आप मशीन उठाइए, मैं आपको उठाता हूँ।”
मैंने उन्हें सहारा दिया। हम दुकान तक चले।
शटर खुला था। अंदर उजाला जल रहा था। मैंने उन्हें अंदर बिठाया, मशीन को उनकी जगह रखा — जहाँ वो पचास साल से रखी थी, वहाँ।
उस्ताद ने मशीन पर हाथ रखा।
“पचास साल,” उन्होंने कहा।
“कुछ नहीं होगा,” मैंने कहा।
“मुझे पता है,” उन्होंने कहा। “वो आ जाएगा। मशीन उठेगी, ये टेबल उठेगी, ये सिला हुआ कपड़ा भी उठेगा। पर मशीन का हाथ बराबर नहीं होगा।”
उन्होंने ताला निकाला।
“अंकुश।”
“हाँ।”
“बाहर आ।”
हम बाहर आए।
फिर उन्होंने शटर नीचे गिराया।
आवाज़ पूरी गली में गई। मैंने कभी नहीं सुना था कि एक लोहे का शटर इतनी ज़ोर से गिरता है। उसके पीछे दो बच्चों की आवाज़ दब गई, गुमटी का चूल्हा भी मानो धीमा पड़ गया, और पीपल के पत्ते बजने से रुक गए।
उस्ताद ने ताला लगाया।
चाबी जेब में रखी।
“अब जो भी आए, मैं नहीं,” उन्होंने कहा। “जबरदस्ती लगाएँ, तो लगाएँ।”
मैं उनके साथ खड़ा रहा।
और तभी पुलिस आई।
दरोगा जी सफ़ेद जीप में थे। दो सिपाही पीछे। एक के हाथ में काग़ज़ था, दूसरे के हाथ में कुछ नहीं था।
दुबे अंकल जीप से उतरे — वो हमेशा से जीप से नहीं उतरते थे, पर आज उतरे थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो बात थी जो कहना चाहती थी और कह नहीं सकती थी।
दरोगा मेरे पास आए।
“अंकुश यादव?”
“हाँ।”
“तुम यहाँ पीपल के नीचे जोड़ केंद्र नाम का चबूतरा चला रहे हो?”
“नहीं चला रहा।”
“बोर्ड लगा था।”
“बोर्ड नहीं है।”
“कल था।”
“कल था। आज नहीं है।”
उन्होंने मेरे पीछे चबूतरी की तरफ़ देखा। मैंने भी देखा। वहाँ कुछ नहीं था। फिर भी उन्होंने सिपाही की तरफ़ हाथ बढ़ाया, और सिपाही ने काग़ज़ दिया।
“काग़ज़ लिखा है — पीपल के नीचे बिना अनुमति इकट्ठा होने और लोगों को इकट्ठा करने की शिकायत मिली है,” उन्होंने कहा। “जन-सुविधा की जगह है। इसका उपयोग धंधे के लिए नहीं कर सकते।”
“मैं धंधा नहीं करता।”
“कहते हैं कि टूटी चीज़ों के पैसे लेते हो।”
“कभी नहीं।”
“काग़ज़ कुछ और कहता है।”
“काग़ज़ पर मेरा हस्ताक्षर है?”
उन्होंने काग़ज़ देखा। फिर नीचे पढ़ा। फिर मेरे सामने उसे मोड़ लिया।
“हस्ताक्षर नहीं है,” वो कहने ही वाले थे, तभी सिपाही ने उन्हें रोका, कुछ कान में कहा, और दरोगा ने काग़ज़ फिर खोला और बोले, “पर शिकायत पहले भी आई थी। हमारे रजिस्टर में है।”
“कब आई?”
“तारीख़ काग़ज़ पर है।”
“काग़ज़ पर तारीख़ ही नहीं है।”
दरोगा जी रुक गए। उन्होंने मुझे देखा। वो गुस्सा नहीं दिखा रहे थे। वो थके हुए थे। उनकी आँखों के नीचे काला था, और उनकी वर्दी के कॉलर पर पसीने का निशान था।
“सुन बेटा,” उन्होंने धीरे से कहा। “मैंने इस गली में साइकिल चलाई है। मेरी बीवी ने तुम्हारी माँ से टिफ़िन लिया है। मुझे अपनी नौकरी से ज़्यादा इस गली से लगाव है, तभी मैं आज आया हूँ। दूसरा आदमी आता तो लाठियाँ लेकर आता।”
“मैं समझता हूँ।”
“तो समझ ले — आज मैं ये जगह खाली कराने आया हूँ। काग़ज़ के हिसाब से। मुझे पता है ये काग़ज़ सही नहीं है। परीक्षा में मैं ये लिखकर भी नहीं दे सकता।” उन्होंने जेब से रूमाल निकाला। “मैं सेवा में हूँ, अंकुश। सेवा में आदमी अपना मन नहीं रखता।”
“जब तक आपकी सेवा है, तब तक किसी का काम नहीं आएगा,” मैंने कहा।
दरोगा जी रुके।
“ये तूने ठीक कहा,” वो बोले।
उन्होंने सिपाहियों की तरफ़ इशारा किया।
दोनों सिपाही चबूतरी के पास गए। मैंने उन्हें रोका।
“एक मिनट,” मैंने कहा। “मैं हूँ।”
मैंने खुद चबूतरी पर चढ़कर टूटी लकड़ी की मेज़ उठाई — जो जोड़ केंद्र की मेज़ थी, जिसकी एक टाँग नाप में नहीं थी। अब मैंने उसे सहारा दिया, और उतारकर नीचे रखा। फिर उस सफ़ेद पतंग को देखा जो पीपल की डाल में टँगी थी और अब आधी-आधी हो चुकी थी।
वो वहीं रह गई। मैंने उसे नहीं छुआ।
“ये दें?” सिपाही ने पूछा।
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