The Mysterious Bell – Chapter 1134
क्योंकि रणवीर की मुस्कान इसलिए काम करती है कि वो लोगों से कहता है — "मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ।" और मेरी घंटी इसलिए चुप है कि मैं लोगों से ये नहीं कह पाया — "मैं तुम्हारे साथ हूँ, पर तुम्हारे बिना कुछ नहीं हूँ।"
कल सुबह मैं उस्ताद की दुकान पर जाऊँगा। उनके साथ बैठूँगा। चाय पीऊँगा। बिना सफ़ाई दिए।
और गली देखेगी।
और उसके बाद जो होगा, देखा जाएगा।
क्योंकि जिस घंटी में लोगों की आवाज़ होती है, उसे तोड़ने के लिए जादू नहीं चाहिए।
उसे तोड़ने के लिए बस इतना काफ़ी है कि गली चुप हो जाए।
और उसे वापस जोड़ने के लिए भी जादू नहीं चाहिए।
उसे जोड़ने के लिए बस इतना चाहिए कि एक आदमी अपना दरवाज़ा खोले और कहे — "भाई, चाय पी ले।"
बस इतना।
और आज रात मुझे सिर्फ़ इतना करना था कि सुबह तक ज़िंदा रहूँ, ताकि कल वो चाय पी सकूँ।
मैंने शटर गिराया।
गली में आख़िरी आवाज़ शटर की थी।
और फिर सब चुप।
॥
सुबह मैं पहले जागा या गली पहले जागी, ये मुझे आज भी नहीं पता चला।
आँख खुली तो छत का पुराना पंखा चुप था। बल्ब की गुनगुनाहट भी नहीं थी। बाहर से किसी साइकिल की घंटी नहीं आ रही थी, किसी बच्चे के पैरों की थपकी नहीं आ रही थी, कोई माँ अपने बेटे को स्कूल के लिए नहीं डाँट रही थी। कमरे में सिर्फ़ मेरी साँस थी और औज़ारों के ट्रंक से आती धूल की पुरानी गंध।
मैं उठा। मुँह धोया। पानी के टब में हाथ डाला तो पानी भी ठंडा लगा, जैसे रात भर किसी ने उसे भी चुप रहने को कह दिया हो।
शटर उठाया।
गली खाली थी।
पीपल के नीचे पत्थर की चबूतरी सूनी पड़ी थी। चबूतरी पर धूल की एक पतली परत जम गई थी, जिस पर किसी के बैठने का एक भी निशान नहीं था। नाली पर पुराना पत्थर का पुल था, वहाँ भी कोई नहीं। गुमटी की तरफ़ देखा तो चूल्हा जल रहा था, धुआँ उठ रहा था, पर वहाँ भी कोई खड़ा नहीं था।
और सबसे डरावनी बात — स्कूल की तरफ़ से बच्चों की आवाज़ नहीं आ रही थी।
मैं दुकान के बाहर आया। खड़ा रहा। सुबह की हवा चल रही थी, पीपल के पत्ते हिल रहे थे, पर उनकी आवाज़ भी कुछ अजीब तरह से दबी हुई लग रही थी।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी। ठंडी। बिल्कुल वैसी ही जैसी रात में थी। मैंने उसे निकाला, हथेली पर रखा, उँगली से छुआ। कुछ नहीं।
“सुबह हो गई,” मैंने धीरे से कहा। “देख, सुबह हो गई।”
घंटी चुप।
मैंने उसे जेब में रखा और उस्ताद की दुकान की तरफ़ चला।
उनका शटर आधा उठा हुआ था। अंदर उजाला जल रहा था। सिलाई मशीन पर पुराना कपड़ा ढका हुआ था, और उस्ताद अपनी लकड़ी की छोटी स्टूल पर बैठे थे, हाथ में एक पुराना लोहे का ताला पकड़े हुए।
“आ जा,” उन्होंने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा।
मैं अंदर गया। उनके सामने बैठ गया। चारपाई नहीं थी, स्टूल एक ही था, तो मैं फ़र्श पर बैठ गया, पीठ दीवार से टिकाकर।
“चाय?” उन्होंने पूछा।
“आप बना रहे हैं?”
“नहीं। तू बना।”
मैं उठा। पीछे के कोने में स्टोव था, केतली थी। मैंने चाय बनाई। दो गिलास भरे। एक उनकी तरफ़ बढ़ाया, एक अपने पास रखा।
“ताला किसका है?” मैंने पूछा।
उस्ताद ने ताले को हवा में घुमाया।
“ये मेरा है। पुराना है। मेरे अब्बा के ज़माने का। दुकान खोलने से पहले मैं इसे हर रोज़ देखता था। लगाता नहीं था, बस देख लेता था — कि जिस दिन लगाना पड़े, तब भी मेरा ही रहे।”
“काग़ज़ आ गया?”
“सुबह सात बजे आया। सफ़ेद कमीज़ वाला आदमी, हाथ में लिफ़ाफ़ा। काग़ज़ चिपकाकर चला गया। लिखा है — दुकान दो दिन में खाली। आज पाँच बजे तक पहला ताला।”
मेरा गला सूख गया। चाय का गिलास हाथ में था, पर मुँह तक नहीं गया।
“उस्ताद—”
“सुन पहले,” उन्होंने कहा। “ताला वो लगाएँगे, नहीं लगाएँगे, ये मैं नहीं जानता। पर आज शाम पाँच बजे मैं अपनी दुकान का शटर अपने हाथ से नीचे गिराऊँगा। ताला अपना लगाऊँगा। चाबी अपनी जेब में रखूँगा।”
“पर इससे तो वो जीत जाएँगे—”
“नहीं,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो पचास साल से ज़्यादा पुरानी थी, कुर्सी की लकड़ी जैसी सूखी पर मज़बूत। “जो आदमी अपनी दुकान अपने हाथ से बंद करता है, उसकी दुकान बंद नहीं होती। दबती है, पर बंद नहीं होती। और जिसे दूसरे का हाथ बंद करता है, वो सच में बंद हो जाती है।”
मैं चुप बैठा रहा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा। “आज तेरा दिन है।”
“मेरा दिन?”
“सुन। आज सुबह से तेरे कान में जो आवाज़ आएगी, वो तू सुन। बोलना नहीं। बस सुनना।” उन्होंने चाय का घूँट लिया। “मैंने तुझे एक बात बताई थी न — जोड़ने वाला अकेले नहीं जोड़ता। आज वो सब अपने आप दिखेगा।”
“क्या दिखेगा?”
“ये दिखेगा कि गली को तेरी घंटी से कोई दुश्मनी नहीं थी,” उन्होंने कहा। “लोगों को तू और तेरी दुकान से दुश्मनी है। और वो दुश्मनी आज बोलेगी। तैयार रह।”
मैंने गिलास मुँह तक उठाया। चाय गरम थी, पर मेरे अंदर कुछ ठंडा रह गया था।
पहला झटका उस वक़्त आया जब मैं दुकान लौटा।
चूड़ी वाली बाई अपनी गुमटी के बाहर बैठी थी, सामने लाल धागे से लिपटी चूड़ियों की पेटी खुली, और उसके पास एक दुबला आदमी खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, हाथ में काग़ज़ों का बंडल। वो उससे धीरे-धीरे कुछ कह रहा था। उसका हाथ बीच-बीच में उस तरफ़ उठता था जिधर मेरी दुकान थी।
मैं रुक गया। मुझे सुनना था। उस्ताद ने कहा था — सुनने का।
मैं उस्ताद की दुकान के साये में खड़ा रहा। आवाज़ पूरी नहीं आ रही थी, शब्द टूटकर आ रहे थे।
“…उसके जोड़ से घर टूटते हैं…”
“…भूला भाई की दुकान गई, शबनम की गुमटी बंद, उस्ताद की दुकान पर ताला…”
“…पर वो किसी को कुछ नहीं बताता, इसलिए पता नहीं चलता…”
“…दिखता है जोड़ने वाला, पर असल में वो…”
आख़िरी शब्द हवा में गम हो गए, पर मैंने उन्हें पूरा समझ लिया। वो शब्द था — जादू।
मैं खड़ा रहा। मेरा हाथ जेब की तरफ़ गया, घंटी की तरफ़, फिर रुक गया। नहीं। मैंने हाथ निकाल लिया।
वो आदमी काग़ज़ों का बंडल सीने से लगाए आगे बढ़ गया। चूड़ी वाली बाई ने सिर उठाया और मुझे देखा।
उसका चेहरा बदल गया।
मैं मुस्कुराया। “बाई, चूड़ियाँ ठीक चल रही हैं?”
वो जवाब देने से पहले एक बार इधर-उधार देखा। फिर धीरे से बोली, “अंकुश बेटा, तू बुरा मत मानना।”
“मैं नहीं मानता।”
“मेरी दुकान पर रोज़ तीन आदमी आते हैं। बैठते हैं। पूछते हैं कि तू क्या करता है, तेरे पास कौन आता है। मैं क्या बोलूँ?” उसने अपनी उँगली पर लिपटा लाल धागा खींचा। “मैं बोलती हूँ — कुछ नहीं, वो तो साइकिल ठीक करता है। पर…” वो रुकी।
“पर?”
“पर बेटा, जब उस्ताद की दुकान पर ताला लगने की खबर आई, तो मैं सोच में पड़ गई।” उसने आँखें नीची कर लीं। “मुझे डर लगता है। मेरे लड़के की नौकरी लगी है, नई बस्ती में। अगर नाम कट गया तो…”
“मैं समझता हूँ,” मैंने कहा।
और सच में समझता था। इसीलिए और दर्द हो रहा था।
मैं आगे चला।
दुकान के मोड़ पर चिंटू आ रहा था, दौड़ता हुआ, हाथ में पुरानी रिम। उसकी अम्मी पीछे खड़ी थीं, एक हाथ में तांबे की केतली थी।
“चिंटू!” उन्होंने पुकारा।
चिंटू ने मुझे देखा। उसका चेहरा खिला। “उस्ताद—”
“चिंटू, हमारी केतली का ढक्कन—” वो बोलता हुआ मेरी तरफ़ बढ़ा।
“चिंटू!” अम्मी की आवाज़ दो गुना ऊँची हो गई। “इधर आ। अभी।”
वो रुक गया। मेरे और अपनी अम्मी के बीच में खड़ा रह गया, हाथ में रिम, आँखों में सवाल।
“इधर आ,” अम्मी ने दोहराया। “उसकी छाया में भी मत खड़ा हो।”
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