The Mysterious Bell – Chapter 1110
लक्ष्मी दीदी हँसी — छोटी-सी हँसी, जिसमें रोना घुला हुआ था। फिर उन्होंने घंटी अपने हाथ में उठाई।
"अब मेरा सवाल," उन्होंने कहा। "ये घंटी मेरे हाथ में बजेगी या नहीं?"
उन्होंने उसे हिलाया।
घंटी बजी। साफ़। बड़ी। जैसे शाम की आरती में मंदिर की घंटी। पर उसमें कोई आवाज़ नहीं आई — कम से कम मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया। सिर्फ़ एक साफ़, लंबा, ईमानदार बजना। जैसे घंटी ने भी कह दिया हो — मैं हर हाथ में बज सकती हूँ, पर बोलती सिर्फ़ एक को हूँ।
लक्ष्मी दीदी ने देर तक उसकी आवाज़ को जाते हुए सुना। फिर वो मुस्कुराईं और घंटी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"तुम्हारी चीज़ है," उन्होंने कहा। "मेरा हिस्सा मेरे हाथ में बजकर पूरा हो गया। अब बाकी तुम सुनो।"
मैंने घंटी अपनी हथेली में ली। वो गरम थी। बहुत गरम नहीं, बस इतनी कि हाथ में रखने का मन करे।
और फिर घंटी बोली।
"तीन सच। पूरे हुए।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"अड़सठ।"
मैं वहीं जम गया। टिंकू ने चीख मारी, "कितने?"
"अड़सठ," मैंने दोहराया, और मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लगी।
मैंने जेब से अपनी कॉपी निकाली — वो नई कॉपी जिसमें मैंने सबसे पहले माँ का नाम लिखा था, फिर टिंकू का, फिर उस्ताद का। कलम उठाई और उसी लाइन के नीचे लिखा — अड़सठ।
लिखते वक़्त मेरा हाथ काँप रहा था, और ये कंपकंपी डर की नहीं थी।
लक्ष्मी दीदी ने मेरी कॉपी देखी।
"इसमें क्या लिखते हो?"
"नाम," मैंने कहा। "हर उस आदमी का नाम जिसने मुझे अपने हाथ से कुछ जोड़ने दिया।"
"तो फिर मेरा नाम भी लिखो," उन्होंने कहा। "लक्ष्मी देवी — चलती सिलाई।"
और मैंने लिखा।
तभी शटर पर बाहर से आवाज़ आई — ज़ोर-ज़ोर से, बहुत सारे हाथों की।
"अरे, खुला है! शटर आधा उठा है! आवाज़ आ रही है!"
मैंने शटर ऊपर धकेला।
बाहर शाम की रोशनी थी — पीली, हल्की, पीपल की छाया में घुली हुई। और उस रोशनी में खड़ी थीं शबनम आपा, हाथ में चिमटी लिए, आँखें फाड़े। उनके पीछे उस्ताद अली बक्श — बिना चश्मे, बिना औज़ार, सिर्फ़ चुपचाप खड़े। और उनके पीछे पाँच जोड़ी छोटी आँखें — टिंकू के जासूस — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू, और एक छोटा लड़का जो शायद रास्ते में मिल गया था।
मशीन की आवाज़ सुनकर सबकी आँखें उसी तरफ़ गईं।
टिंकू खिड़की के पास खड़ा था, सीना फुलाए, दोनों हाथ कमर पर।
"देखा?" उसने कहा, इतनी ऊँची आवाज़ में कि पूरी गली सुन ले। "मेरी माँ! गली की सबसे तेज़ सिलाई करने वाली औरत!"
शबनम आपा ने चिमटी हवा में घुमाई और ज़ोर से ताली बजाई। बच्चों ने हुड़दंग शुरू कर दिया। चिंटू ने अपनी झंडी जैसी पतली लकड़ी उठाकर नाच नचाया। रफ़ीक़ ने अपना फटा चश्मा पहनकर मशीन को गौर से देखा, जैसे वो कोई नई मूर्ति हो।
शबनम आपा अंदर आईं और लक्ष्मी दीदी के सामने खड़ी हो गईं।
"तू यहीं काम करेगी?"
लक्ष्मी दीदी ने उन्हें देखा। "हाँ।"
"तो सुन," शबनम आपा ने कहा, "मेरी गुमटी के पीछे वाला कमरा खाली पड़ा है। वहाँ तेरी मशीन रख। बारिश में भूल जाएगी।"
लक्ष्मी दीदी एक पल चुप रहीं, फिर हँस पड़ीं — पूरी हँसी, खुली हँसी, वो हँसी जो कई महीनों से उनके घर में नहीं बजी थी।
"चाय बाकी है मेरी," उन्होंने कहा।
"कल से कटेगी," शबनम आपा ने कहा, और ये इतनी सख़्ती से कहा कि हम सब हँस पड़े।
तभी मुझे याद आया — बाहर खड़ा वो आदमी।
मैं शटर के पास गया और पूरा ऊपर कर दिया। बाहर धूप में धूल ही धूल थी। गुमटी के कोने पर कुछ बच्चे खड़े थे, दो बाइकें जा रही थीं। पर लकड़ी के जूतों वाला कोई नहीं।
न ही कोई छोटा साया।
मैं उस जगह पर गया जहाँ दस्तक पड़ी थी। धूल में निशान पहले से ही मिट रहे थे। पर वहीं, शटर के नीचे, एक छोटी-सी पोटली रखी थी — मोटे जूट के कपड़े में बँधी, ऊपर एक पत्थर रखा हुआ, ताकि हवा उसे न उड़ाए। और पोटली के नीचे एक काग़ज़ — बिना लिफ़ाफ़े का, एक कोने पर मोड़ा हुआ।
मैंने काग़ज़ उठाया। उस पर नीली स्याही में बस एक पंक्ति थी।
"पोटली तुम्हारी है। अभी मत खोलना। जब दोनों भाई एक साथ बैठें, तब खोलना।"
मैंने पोटली उठाई। वो हल्की थी — इतनी हल्की कि लगा कुछ भी नहीं है। पर जब हाथ में रखी, तो उसमें एक हल्की गरमाहट थी, जैसे कोई औरत उसे अभी-अभी अपनी साड़ी के कोने में से निकालकर दी हो।
मैंने उसे अपनी जेब में डाल लिया।
"क्या था वो?" सानिया ने पूछा, गर्दन खींचकर।
"अभी नहीं," मैंने कहा, और सच कहा, क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था।
दुकान के भीतर लौटकर मैंने देखा — लक्ष्मी दीदी ने मशीन पर एक और कपड़ा चढ़ा दिया था। ये कुर्ता नहीं था। ये एक छोटा-सा तकिया सा कपड़ा था, जिस पर हल्के फूल बने थे।
"ये किसका है?"
"गली के मंदिर की चादर का धागा खुल गया था," उन्होंने कहा, बिना रुके। "आज पंद्रह दिन से पड़ी है। बोलो, किसने रोक रखी है?"
और सुई ने फिर टिक किया।
मैं खड़ा होकर देखता रहा। दुकान के भीतर अब कुछ अलग हो गया था। दीवार वही थी, ट्रंक वही था, छत वही थी। पर वो सब कुछ, जो कल तक भारी लगता था, हल्का हो गया था। जैसे किसी ने कमरे से एक पुरानी, गीली बोरी उठाकर बाहर कर दी हो। धूल अब धूल नहीं लग रही थी — अब वो सिर्फ़ धूल लग रही थी। और ये बहुत बड़ी बात है, मेरे भाई। तुम्हें पता है, जब घर में कुछ हल्का होता है, तो पूरा घर अलग दिखने लगता है।
मैंने कॉपी खोली और उस नई लाइन के नीचे, बिना किसी झिझक के, अपनी कलम से एक और नाम लिखा — टिंकू कुमार। और उसके आगे — सुबह स्कूल, शाम दुकान।
टिंकू ने देखा और उसका चेहरा चमक उठा।
"आपने मेरा पूरा नाम लिखा।"
"अब छोटा भी कभी नहीं बुलाऊँगा," मैंने कहा। "बस शर्त पर — मिस्त्री नहीं।"
"ठीक। नाम से।"
लक्ष्मी दीदी ने सुई रोकी और मेरी तरफ़ देखा।
"एक बात कहूँ, अंकुश जी?"
"कहो, दीदी।"
"तुमने कल रात भी हमें बताया था कि तुम्हें अपनी छोड़ी हुई चीज़ें मुफ़्त नहीं लगती। ये अड़सठ अंक क्या हैं?"
मैंने उन्हें वो सब समझाया जो मैं जानता था — कि हर जोड़ पर अंक मिलते हैं, बड़े रिश्ते पर ज़्यादा। अपनों के बीच का जोड़ हो तो सबसे ज़्यादा, क्योंकि वहाँ शब्द सस्ते नहीं पड़ते।
"अड़सठ," मैंने कहा, "मेरे हिसाब से सबसे बड़े जोड़ों में से एक है।"
"तो अब ये अंक से क्या खरीदोगे?" टिंकू ने पूछा। "कोई शक्ति? सच्ची ज़ुबान?"
मैंने कॉपी बंद करते-करते कहा, "आज कुछ नहीं। आज मैं इन्हें यूँ ही रहने दूँगा, कॉपी में। जैसे कोई बूढ़ा अपनी बेटी की शादी का लिफ़ाफ़ा संदूक में रख देता है।"
वो हँसे।
पर फिर — जब मैंने कॉपी में आख़िरी बार नज़र दौड़ाई, तो मेरी मुस्कान वहीं रुक गई।
क्योंकि मैंने जो लिखा था — अड़सठ — उसके नीचे मैंने कुल जोड़ देखा, और जोड़ अड़सठ नहीं था।
चौंतीस था।
मैंने फिर गिना। चौंतीस। फिर फिर गिना। चौंतीस।
जैसे किसी लिफ़ाफ़े में से आधे पैसे पहले ही किसी और ने निकाल लिए हों।
चौंतीस अंक कहाँ गए?
मैंने दोबारा घंटी को हथेली में उठाया।
"यह क्या है?"
घंटी ने एक छोटी, रूखी आवाज़ में कहा —
"आधा उधार।"
"किसका उधार?"
"तेरा नहीं।"
"तो किसका?"
वो चुप हो गई। बिल्कुल चुप। इतनी चुप कि मुझे लगा वो बुझ गई है।
मैंने कोई जवाब नहीं पाया, तो कॉपी के पन्ने पलटने लगा। हो सकता है कहीं मैंने गलती की हो। हो सकता है किसी पुराने जोड़ का हिसाब मैंने खुद ही काट दिया हो।
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