The Mysterious Bell – Chapter 1086
बाहर गली बहुत चुप थी।
आम दिन इस वक़्त तक शबनम आपा की गुमटी पर बर्तन खड़कते रहते, भोला भाई की दुकान से रेडियो बजता रहता, और दूर कहीं कुत्ते भौंकते रहते। आज कुछ नहीं। बस कभी-कभी पीपल की पत्तियाँ हिलती और लगता जैसे कोई बुज़ुर्ग दूर बैठकर धीरे-धीरे साँस ले रहा हो।
मैंने टिंकू के आगे वो लोहे का गिलास रख दिया जिसमें पानी था। उसने नहीं पिया।
"उस्ताद।"
"हूँ।"
"तुम सच में कहोगे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या कहूँगा?"
"वो ही।" उसने नीचे देखते हुए कहा। "कि जा, राँची जा, वहाँ पढ़।"
मैं एक पल चुप रहा। फिर चारपाई पर उसके पास बैठ गया। मेरे हाथ में घंटी थी, और वो अब भी गरम थी — बहुत ज़्यादा नहीं, बस इतनी कि जेब में रखने का मन न करे।
"तूने मुझसे एक बात पूछी थी," मैंने कहा। "कि तुम मना करोगे ना।"
"हाँ।"
"तो सुन। मैं उस बात का जवाब आज नहीं दूँगा। आज रात मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा कि तेरी माँ के सामने जो कहा, वो मेरी ज़ुबान से निकला है और मैं उसे मुकरने वालों में से नहीं हूँ। पर तेरे सामने मैं एक और बात कहना चाहता हूँ, और वो ये है — तू मुझसे पूछ रहा है कि क्या करूँ। मैं तुझे यह नहीं बताऊँगा। आज रात तू खुद बता — क्या करना है।"
टिंकू ने सिर उठाया।
"मैं बताऊँ?"
"हाँ।"
"उस्ताद, मैं तेरह साल का हूँ।"
"तो?"
"तो मुझे क्या पता—"
"मुझे भी नहीं पता," मैंने कहा। "पर मैं चौबीस साल का हूँ और अब तक जो भी बड़े फ़ैसले लिए, आधे गलत निकले। तेरी उम्र का तो पता नहीं, पर मेरी उम्र में भी कोई जवाब जेब में लेकर नहीं घूमता। तू बता। अपनी बात बता। डर के बिना।"
वो चुप हो गया।
बल्ब गुनगुनाया। बाहर कहीं कोई दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ।
"मुझे स्कूल से डर लगता है," उसने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"ऐसे नहीं कि वहाँ मार पड़ती है। मार तो मेरे अब्बा भी नहीं मारते थे।" उसकी आवाज़ फिसल गई, और वो फिर सँभल गया। "मुझे इस बात से डर लगता है कि मास्टर जी क्लास में मेरा नाम पुकारेंगे और कोई बच्चा हँसेगा। और मैं जानता हूँ कि वो क्यों हँसेंगे — क्योंकि मेरा बस्ता फटा है, क्योंकि मेरी चप्पल टूटी है, क्योंकि मैं पिछली क्लास में बैठा रह जाऊँगा। मास्टर जी ने दो बार मुझे बुलाया और दोनों बार मेरे सामने कह दिया — ये बच्चा यहीं रह जाएगा, क्लास में आगे नहीं जाएगा। और मैं वहाँ बैठा रहा। मैं कुछ नहीं बोला। मुझे लगा अगर मैं बोलूँगा तो सब मुझे और देखेंगे।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
वो जारी रहा।
"और सबसे ज़्यादा डर…" उसने कहा, और रुक गया। फिर बहुत धीरे, "सबसे ज़्यादा डर इस बात का है कि तुम मुझे भूल जाओगे।"
मैं एक पल के लिए हँस पड़ा। असली हँसी नहीं, वो हँसी जो आदमी तब हँसता है जब अंदर कुछ चुभ रहा हो, और वो हँसी से उसे दबाना चाहता हो।
"भूल जाऊँगा?" मैंने कहा। "टिंकू, मैं वो आदमी हूँ जो सुबह उठकर भूल जाता हूँ कि चाय में चीनी डाली थी या नहीं। दो बार नहा धोकर भूल जाता हूँ कि नहाया था। मैंने एक बार अपनी ही दुकान का शटर बंद करके तीन दिन उसे खुला समझकर घूमता रहा। मेरी याददाश्त बहुत खराब है, टिंकू।"
उसने मुझे देखा।
"पर दिल खराब नहीं है," मैंने कहा। "याददाश्त भूल जाती है चीज़ें। दिल नहीं भूलता आदमी।"
टिंकू हँसा। पहली बार उस रात। वो एक छोटी सी हँसी थी — नाक से निकली, आधी आँखों में ही रुक गई। पर हँसी थी।
"ये भी कोई बात हुई," उसने कहा। "तुमने दो बार नहाया?"
"तीन बार," मैंने कहा। "और तीसरी बार मुझे लगा मैं बार-बार नहा रहा हूँ क्योंकि शायद बदबू बाकी है। फिर माँ ने आकर कहा — बेटा, तू साबुन ही खा गया।"
वो और हँसा।
और फिर, हँसी धीरे-धीरे उतर गई। क्योंकि मेरी आवाज़ खुद धीमी हो रही थी।
मैंने घंटी को हथेली में लिया। वो हल्की गरम थी, जैसे बस अभी-अभी किसी ने छुआ हो और हटा दिया हो। मैंने उसे दोनों हाथों में ले लिया, ताकि वो ठंडी न लगे।
"टिंकू।"
"हाँ।"
"मुझे भी डर लगता है।"
वो चुप हुआ।
"मैंने किसी को नहीं बताया," मैंने कहा। "ना माँ को, ना काजल को, ना मीरा को। कभी किसी को नहीं। पर आज तुझे बता रहा हूँ, क्योंकि तू मुझसे अपना सबसे बड़ा डर बता चुका है, और अब बारी मेरी है।"
मैंने घंटी को नीचे देखा।
"मुझे यह डर लगता है कि जिस दिन मैं सबको बचाने निकलूँगा, उसी दिन मैं सबको खो दूँगा। हर एक को। इस गली को, इस दुकान को, इन लोगों को। मुझे यह डर लगता है कि एक-एक करके सब मेरे हाथ से चला जाएगा और मैं बीच में खड़ा चीखता रहूँगा — रुको, रुको — और कोई नहीं रुकेगा। मुझे यह डर लगता है कि मैं शाम को यहाँ बैठूँगा और चारों तरफ़ देखूँगा और हर जगह खाली कुर्सियाँ दिखेंगी। और मुझे यह डर लगता है कि उस दिन कोई कहेगा — अंकुश भाई, तुमने बहुत अच्छा किया। बाईस साल की गलती सुधार दी। और मैं कहूँगा — हाँ। और वो जो मैंने सुधारी, वो मेरी नहीं होगी, क्योंकि सुधारने वाले के पास अक्सर सिर्फ़ सुधार बचता है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"उस्ताद—"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं तुझे रुलाने नहीं बैठा। मैं बस कह रहा हूँ — तुझे अपने स्कूल से डर लगता है, मुझे अपनी गली से डर लगता है। तेरा डर तेरह साल का है, मेरा डर चौबीस साल का। पर दोनों एक ही जगह से आते हैं। अंदर से। किसी के देखने से नहीं, अपने आप को देखने से।"
वो चुप बैठा रहा।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"और एक बात सुन। तेरे स्कूल वाला डर — वो तेरा नहीं है। वो उनका है जो तुझे देखकर हँसते हैं। मिट्टी में सबसे पहले वो हँसते हैं जो खुद पर हँसने से डरते हैं। मैं भी हँसता था, तेरी उम्र में। मैं भी किसी को नीचा दिखाता था, ताकि कोई मुझे नीचा न दिखा दे। तू मुझसे बेहतर है, टिंकू। तेरा डर सीधा है।"
उसने आँखें मलीं।
"उस्ताद—"
"क्या?"
"एक बात कहूँ?"
"कह।"
"मैं राँची जाना नहीं चाहता।"
"मुझे पता है।"
"पर माँ—"
"तेरी माँ बहुत मज़बूत औरत है," मैंने कहा। "और मज़बूत औरतें अक्सर अपने बेटों को दूर इसलिए भेजती हैं कि वो डरती हैं उन्हें कुछ हो जाएगा। तेरी माँ ने अपना आदमी खोया है। वो दोबारा किसी को खोना नहीं चाहती। इसीलिए वो तुझे अपने से दूर करके भी सोचती है कि वो तुझे बचा रही है।"
टिंकू ने सिर उठाया।
"मेरे अब्बा?"
"हाँ।"
"तुम जानते हो?"
"मैं जानता हूँ कि तेरे अब्बा छह महीने पहले गए। और उसके बाद से माँ क्या-क्या झेल रही है, वो भी जानता हूँ। पर टिंकू, मैं तुझे यह नहीं कहूँगा कि तू बड़ा होकर उसका दुख पूरा कर देगा। आज मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा — तू जो है, वही रह। डर के साथ भी रह। और मुस्कुराना छोड़ मत।"
वो चुप हो गया। और उस चुप्पी में उसकी आँखों से फिर पानी आया, पर इस बार वो पोंछ नहीं रहा था। वो बस बहने दे रहा था, जैसे पानी को बहने देना भी एक काम हो।
और तभी मुझे आहट मिली।
दरवाज़े के बाहर किसी के पैर ज़मीन पर रगड़े थे।
मैंने सिर उठाया। दरवाज़ा आधा खुला था — मैंने उसे बंद समझा था, पर शायद हवा से या शायद किसी ने खोल दिया था।
बाहर, अँधेरे में, टिंकू की माँ खड़ी थीं।
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