The Mysterious Bell – Chapter 1084
"देखो," उन्होंने कहा, "अब मैं सुन चुकी हूँ सबको। कोई कहता है बंद कर दो, कोई कहता है पीछे हटो। मैं इन सबकी बात सुनकर एक बात कहूँगी।" वो सीधी खड़ी हुईं। "हम अगर जोड़ना बंद कर देंगे, तो उस आदमी को एक भी गोली नहीं चलानी पड़ेगी। वो सिर्फ़ ये देखेगा कि गली के लोग अपने ही घरों में दरवाज़े बंद करके बैठ गए। और जिस गली में लोग एक-दूसरे से सच नहीं बोलते, वहाँ वो जो चाहेगा लिखवा लेगा, जो चाहेगा अंगूठा लगवा लेगा।"
"तो क्या करें?" किशनलाल काका ने कहा। "लड़ें?"
"लड़ें," शबनम आपा ने कहा। "पर पता है लड़ना क्या है? लड़ना ये है कि कल सुबह मैं अपनी बहन के पास बैठकर ये कहूँ कि तेरे हिस्से का आधा भी उसके पेट में जाएगा, पर जाएगा मेरे साथ। और तू अगर मेरे साथ आएगी, तो वो उसे उगल देगा।"
"ये तो आप कह रही हैं," भोला भाई ने कहा, "पर कैसे? हमारे पास कोई तरीक़ा है?"
सब फिर मेरी तरफ़ देखने लगे।
और मैंने वो किया जो मुझे करना चाहिए था, और जो मुझे करते हुए सबसे ज़्यादा डर लगा।
कोई जवाब देने का सहारा नहीं था।
"नहीं है," मैंने कहा।
कमरा सुन्न हो गया।
"नहीं है," मैंने फिर कहा, धीरे से। "मेरे पास कोई तरीक़ा नहीं है कि वो और न बढ़े। मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि वो मेरे जोड़ से खाता है। मुझे ये नहीं पता कि उसका मुँह कैसे बंद होगा। उस्ताद कहते हैं महँगा जोड़ करो। शबनम आपा कहती हैं उससे बड़ा जोड़ करो। पर मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा — मैं अभी उस रास्ते पर खड़ा हूँ जिसका आगे का हिस्सा मुझे नहीं दिख रहा।"
उस्ताद अली बक्श ने अपना चश्मा उतारा और उसे कमीज़ से पोंछने लगे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनकी चुप्पी कमरे में सबसे ऊँची आवाज़ थी।
"तो फिर हम क्यों लड़ें?" रमेश भाई ने कहा। उनकी आवाज़ अब गुस्से की नहीं थी। वो थकी हुई थी और थकी हुई आवाज़ गुस्से से ज़्यादा काटती है। "अगर तुम्हें खुद नहीं पता कि क्या होगा, तो मैं अपनी औरत को किस भरोसे पर ले जाऊँ?"
"इसी भरोसे पर," मैंने कहा, "कि मैं तुम्हें झूठ नहीं बोलूँगा।"
"ये भरोसा नहीं है," उन्होंने कहा। "ये तसल्ली है।"
और वो पहले आदमी थे जो उठे।
उन्होंने अपनी बाल्टी उठाई, दरवाज़े की तरफ़ बढ़े, फिर रुके और मेरी तरफ़ देखा।
"मैं तुम्हारे खिलाफ़ नहीं हूँ, अंकुश," उन्होंने कहा। "मैं अपने घर के साथ हूँ। फ़र्क़ ये है कि मेरे घर में सिर्फ़ मैं हूँ।"
वो चले गए।
उनके जाने के बाद कमरा वैसा नहीं रहा। कमरा हर बार थोड़ा-थोड़ा खाली होने लगा।
किशनलाल काका उठे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। उनकी आँखों में वो बात थी जो बूढ़े लोग कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते, क्योंकि कहने से उनका बचा हुआ थोड़ा-सा यक़ीन भी चला जाएगा। उन्होंने अपने चने का लोटा उठाया, लाठी उठाई, और धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतर गए।
नसीमा बाई उठीं। उन्होंने अपना दुपट्टा सीधा किया।
"मैं कल सुबह आ जाऊँगी," उन्होंने कहा। "पर मैं साजिद को अकेला नहीं छोड़ सकती। वो रात भर छत पर बैठा है और मैं उसे देख नहीं सकती।"
"आपा, आप उससे—"
"मैं जानती हूँ," उन्होंने मेरी बात काटी, और उनकी आवाज़ में थोड़ी कड़वाहट थी। "मुझे लगेगा कि मैं तुम्हें छोड़कर जा रही हूँ। पर मैं अपने बेटे को छोड़कर नहीं जा सकती। माफ़ करना।" और वो चली गईं।
भोला भाई ने अपना रूमाल निकाला, माथा पोंछा, और दो कदम बढ़े।
"भाई," उन्होंने कहा, "मैं कल दुकान का शटर उठाऊँगा या नहीं, ये मुझे नहीं पता। पर ये पता है कि अगर आरज़ू की दवा कल भी चली तो मैं तुम्हारे काम आऊँगा।"
"भोला भाई, आपकी दुकान—"
"मेरी दुकान जाए भाड़ में," उन्होंने कहा, और मुझे लगा कि उन्होंने ये पहली बार इतनी साफ़ आवाज़ में कहा। फिर उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मेरे कान के पास धीरे से कहा, "पर मैं तुमसे एक बात कहूँगा। तुमने आज जो सच बोला — कि तुम्हें नहीं पता — वो तुम्हें डुबोएगा। पर वो तुम्हें झूठ से बचाएगा। झूठ और भरोसा, दोनों साथ नहीं चलते।"
वो चले गए।
मैं खड़ा रहा। मैंने खुद को रोका, क्योंकि अगर मैं एक बार भी उनसे ये कहता कि रुक जाओ, तो मैं अपनी ही बात का झूठा हो जाता। और मैं झूठ नहीं बोल सकता था। मैं चुप बैठ सकता था, बात छुपा सकता था, पर झूठ — नहीं।
मीरा मेरे पास आई। उसका कैमरा मेज़ पर पड़ा था, लाल बत्ती बुझी हुई। उसने कुछ नहीं कहा। उसने सिर्फ़ अपनी कॉपी खोली और उसमें देखने लगी, जैसे वहाँ लिखा हुआ कुछ उसे अगली लाइन बता देगा। उसकी कलम टेबल पर रखी थी और वो उसे उठाने की ज़हमत नहीं कर रही थी।
और फिर उस्ताद उठे।
उन्होंने अपना मोटा चश्मा पहना, कान पर पेंसिल ठीक की, और मेरी तरफ़ देखा।
"पचास साल पहले," उन्होंने कहा, धीरे से, "मेरे भाई ने मुझसे यही पूछा था — कब खत्म होगा। और मैंने कहा था — जब हम जोड़ना बंद कर देंगे। वो दिन आया और आज तक खत्म नहीं हुआ।" उन्होंने लाठी उठाई। "मैं डरा हुआ आदमी हूँ, अंकुश। सत्तर साल का डरा हुआ आदमी, जिसने पचास साल अपने भाई से बात नहीं की। इसलिए मैं ये नहीं कहूँगा कि डरना मत। मैं ये कहूँगा कि अगर डर गए, तो मेरी दुकान पर आ जाना। वहाँ मशीन है, मैं तुम्हें सिलाई सिखा दूँगा। हाथ का काम डर को थोड़ा हल्का कर देता है।"
वो भी चले गए।
कमरे में अब गिने हुए लोग बचे थे। शबनम आपा, मीरा, भैरों काका, और दीवार के सहारे खड़ा टिंकू।
और टिंकू की माँ।
जो अब तक चुप खड़ी थीं और सब सुन रही थीं।
उन्होंने कुर्सी खींची और बैठ गईं। पहली बार वो बैठीं। उनके हाथ काँप रहे थे, और उन्होंने उन्हें अपनी साड़ी में छिपा लिया।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं तुझसे बुरी नहीं हूँ।"
"मुझे पता है।"
"तू मेरे लड़के को सिखाता है, मैं जानती हूँ। उसके बाप के जाने के बाद ये बच्चा चुप हो गया था। छह महीने इसने किसी से ठीक से बात नहीं की। फिर तू आया और ये रोज़ सुबह दुकान की तरफ़ भागने लगा। मैंने सोचा था कि भगवान ने भेजा है।"
"तो फिर—"
"इसीलिए।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो बात थी जो माँ की आँखों में होती है — प्यार और डर, एक ही रंग में। "क्योंकि मैं उसे दोबारा नहीं खो सकती। तू उसे ज़िंदगी दे रहा है, और मैं देख रही हूँ कि ये ज़िंदगी उसे कहाँ खींच रही है। कल रात बारह बजे ये घर पर नहीं था। मैं सड़क पर खड़ी थी और मेरे हाथ में उसकी पुरानी कॉपी थी, जिसमें उसने पाँच रुपये जोड़कर लिखा था — 'उस्ताद के लिए नया पेचकस'।"
मेरी आँखें जलने लगीं।
"वो पाँच रुपये उसने अपने खाने से बचाए," उन्होंने कहा। "और मैं उस वक़्त सोच रही थी कि ये पाँच रुपये किस दिन उसकी जान लेंगे।"
शबनम आपा ने धीरे से कहा, "लक्ष्मी।"
"आपा, मुझे मत समझाइए," उन्होंने कहा। "मैं दो रात से सो नहीं रही। मैं जानती हूँ कि आप सब जो कर रहे हैं, वो सही है। मगर सही होना और मेरे लड़के का होना, दोनों एक साथ नहीं हो सकते। मैंने सोच लिया है। कल सुबह गाड़ी है।"
कमरा फिर चुप हो गया।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
वो दीवार के सहारे से हटा और मेज़ के पास आया। उसने काग़ज़ उठाया — वही पीला, भीगा काग़ज़ — और उसे दोनों हाथों से सीधा किया, जैसे वो कोई बहुत कीमती चीज़ हो।
"माँ," उसने कहा, "ये काग़ज़ तुमने कहाँ से लिया?"
"स्कूल के गेट से।"
"किसने चिपकाया?"
"पता नहीं।"
"तो इस पर अंकुश भैया का नाम किसने लिखा?"
उसकी माँ ने जवाब नहीं दिया।
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