The Mysterious Bell – Chapter 1074
"मैं हमीदा दाई की बेटी का रिश्तेदार हूँ। जो काग़ज़ तुम्हें दिया गया, वो पूरा नहीं है।"
मैंने कदम रोक लिए।
"क्या मतलब?"
"तुम्हारे पास जो आधा जला काग़ज़ है न," उसने कहा। "वो एक काग़ज़ का आधा हिस्सा है। आधा और है। और उसमें एक नाम है जो तुम्हारे अपने घर का है।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
"ये कब आई?" मैंने पूछा।
"मैंने इसे अन्दर आते नहीं देखा," शालिनी ने कहा।
लड़की ने कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"यह मुझे अपनी माँ की अलमारी में मिली," उसने कहा। "इसमें सुशीला यादव का नाम है। और नीचे एक लाइन है, जो मेरी माँ की लिखाई नहीं है।"
मैंने कॉपी ली। काग़ज़ हल्का था — इतना हल्का कि जैसे उसका कोई वज़न ही न हो। उसमें सिर्फ़ एक पन्ना था। और उस पन्ने पर मेरी माँ का नाम।
"तुम्हारी माँ कौन है?" मैंने पूछा।
"वो जो तीन दिन पहले अस्पताल के रसोई में काम करती थीं," उसने कहा। "और जिन्हें कल रात से काम पर नहीं आने को कहा गया है।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा। फिर उस लड़की की तरफ़।
"और उस लाइन में क्या लिखा है?"
"उसमें लिखा है," उसने धीरे से कहा, "कि जो नाम जोड़ता है, उसका नाम पहले लिखा जाता है।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि मेरी जेब से, तीसरी बार, वो टिक आई। और इस बार टिक के साथ एक हल्की सी गरमी भी थी, जो पहले नहीं थी।
मैंने हाथ जेब में डाला।
घंटी अब भी ठंडी थी, पर उसकी सतह पर, जहाँ कल नई काली लकीर उभरी थी, वहाँ अब दो लकीरें थीं, बीच में एक बिंदु।
और घंटी के अंदर से, बहुत दूर से, धीमी आवाज़ में तीन शब्द आए, जो पहले कभी नहीं आए थे:
"अब मुझे भी भूख लगी है।"
मैंने घंटी को मुट्ठी में दबाया।
"क्या कहा तूने?"
घंटी चुप हो गई।
मैं धूल में खड़ा रह गया। मेरे सामने वो लड़की थी, जिसके हाथ में मेरी माँ का नाम लिखा एक पन्ना था। मेरे पीछे सफ़ेद कमीज़ वाला पहरेदार खड़ा था, जिसकी जेब में मेरा नाम लिखा एक काग़ज़ था। और मेरी जेब में वो घंटी थी, जो अब पहली बार अपनी भूख बोल रही थी।
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
"ये सब —"
"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा, "तुम्हारी माँ ने तुमसे जो पूछा, वो अब हमें सबसे पहले जवाब देना पड़ेगा।"
मैंने सिर हिलाया।
मैंने उस लड़की से कहा — "तुम मेरे साथ चलो। काग़ज़ अपने पास रखो। जब तक मैं तुम्हें न कहूँ, किसी को नहीं देना।"
"और अगर कोई छीनने आए?"
मैंने उसकी ओर देखा।
"तो पहले मुझे छीनेगा।"
उसकी आँखें भर आईं — पर वो रोई नहीं। वो गली में पली लड़की थी। जिसे रोना नहीं आता, चुप होना आता है।
हम आँगन से बाहर निकले।
और जैसे ही मैं गली के मोड़ पर पहुँचा, मेरी जेब में घंटी ने एक आख़िरी बार कहा, इतनी धीमी आवाज़ में कि शायद मैंने ही सुना —
"जोड़ा, तो किसने खाया?"
मैंने एक पल के लिए कदम रोक लिया।
कहीं दूर, पीछे वाले प्लॉट से मशीन के टायर की रगड़ आ रही थी — वो धीमी, भारी आवाज़, जो अब हमारे पास रुकी हुई थी, पर जिसे रोकने वाला पापा अब भी वहीं कुछ कर रहे थे, जो मुझे नहीं पता।
मैंने गहरी साँस ली।
"चल," मैंने शालिनी से कहा।
और हम चल पड़े।
पर मेरे अंदर, जहाँ कल तक सिर्फ़ एक घंटी बजती थी, अब एक और चीज़ बज रही थी — एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब शायद मेरी गली में नहीं, मेरे ही हाथों में था।
जो जोड़ता हूँ, वो कहाँ जाता है?
और जो खा रहा है, वो क्या मेरे ही हाथ से खा रहा है?
॥
"जोड़ा, तो किसने खाया?"
गली के मोड़ पर मेरी जेब से यह आवाज़ आई और मेरे पाँव अपने आप रुक गए।
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "घंटी को आज सुबह से बोलने का ज़्यादा मन है। जैसे उसने भी रात भर की नींद पूरी कर ली हो।"
वो लड़की मेरे पीछे खड़ी थी, कॉपी सीने से चिपकाए। उसकी आँखें मेरी जेब पर टिकी थीं, जैसे उसे भी लग रहा हो कि जेब में कोई ज़िंदा चीज़ बैठी है।
"तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
वो एक पल रुकी। फिर बोली, "भैया, मेरा नाम बाद में पूछिएगा।"
"नाम में क्या रखा है?"
"नाम में बहुत कुछ रखा है।" उसने कॉपी अपनी बाँहों में और कस ली। "जिस काग़ज़ पर मेरी माँ की लिखाई नहीं है, उस पर मेरी माँ का नाम है। और उसके नीचे लिखा है कि जो नाम जोड़ता है, उसका नाम पहले लिखा जाता है। तो मैं अपना नाम नहीं बताऊँगी। जब तक आप इसे साफ़ नहीं करते।"
मैं उसे देखता रह गया।
गली में लड़कियाँ ऐसे ही बड़ी होती हैं। पहले चुप रहना सीखती हैं, फिर बोलना — और जब बोलती हैं तो सीधे हड्डी पर।
"ठीक है," मैंने कहा। "तू बता, तेरी माँ कहाँ है अभी?"
"घर पर। कल रात से रो रही है। उसने कहा कि अस्पताल की रसोई में अब नहीं जाना, और मुझे किसी से कुछ नहीं बताना। पर मैंने सोचा, अगर मैं नहीं बताऊँगी तो कौन बताएगा?"
"अच्छा किया।" मैंने उसके सिर पर हाथ रखा, फिर हटा लिया — क्योंकि मेरे हाथ में ग्रीस थी और वो गली की बच्ची थी। "चल, शबनम आपा के यहाँ चल। वहाँ तू बैठेगी, और जब तक मैं न कहूँ, कोई काग़ज़ नहीं दिखाना।"
"और अगर कोई छीनने आया?"
"तो पहले मुझे छीनेगा।"
उसने सिर हिलाया। और हम चल पड़े।
रास्ते में शालिनी धीरे से बोलीं, "अंकुश, आज दोपहर की बात भूल मत जाना। मशीन जब तक रुकी है, पीछे का प्लॉट देखना है।"
"भूला नहीं," मैंने कहा। "बस सुबह ही से कुछ ऐसा लग रहा है कि आज दिन मेरा नहीं, किसी और का है।"
दुकान पहुँचा तो पापा वहीं बैठे थे।
कमीज़ की आस्तीन चढ़ी हुई, हाथों में काली ग्रीस, और चेहरे पर वो थकान जो पूरी रात की होती है — बिना सोए नहीं, उठकर कुछ किए बिना।
"मशीन?" मैंने पूछा।
"टायर में हवा डाल दी," पापा ने कहा। छोटे वाक्य। "वाल्व भी ठीक कर दिया।"
मैं सुनकर रुक गया। "किसने?"
"पता नहीं। सुबह जाकर देखा तो टायर कड़ा था। मैंने पंप माँगा, और उन्होंने कहा कि हमने तो अपने आप भर दिया।" पापा ने हाथ पोंछा। "कल सुबह छह बजे मशीन चलेगी। काग़ज़ से पहले नहीं चलेगी, ऐसा उनका कहना है।"
मेरे पीछे शालिनी ने गहरी साँस ली।
तो सरकारी शर्त भी एक दिन की रह गई।
"पापा," मैंने कहा, "आप आज घर जाकर सो जाइए। मुझे आपकी ज़रूरत शाम को होगी।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर देखते रहे, जैसे मेरे चेहरे पर कोई लकीर खोज रहे हों।
"बेटा," उन्होंने कहा, "जो काम आज करेगा, वो अकेले मत करना।"
"नहीं करूँगा।"
"कह के नहीं, कर के दिखाना।" वो उठे और ट्रंक से अपना पुराना रिंच उठाकर ले गए — जाने किस चीज़ के लिए। पुरानी आदत।
शबनम आपा ने लड़की को देखा, फिर उसकी कॉपी देखी, फिर उसका हाथ पकड़कर गुमटी के पीछे वाले स्टूल पर बैठा दिया।
"यहाँ बैठ," आपा ने कहा। "मेरी गुमटी में आज तेरे सिवा कोई नहीं छूएगा। चाय पीती है?"
"नहीं।"
"तो पानी पी।" आपा ने कटोरी में पानी दिया और गर्म चिमटी अपने हाथ में उठाकर मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, ये बच्ची आज तक जो काग़ज़ लाई है, वो सबसे भारी काग़ज़ है जो तेरी दुकान पर आया। देख लेना।"
"देख रहा हूँ, आपा।"
"देखना और है," आपा ने कहा, "और मान लेना और है।"
मैं गुमटी के बाहर आया।
और तभी पीपल की तरफ़ से आवाज़ आई — बच्चों की चीख, फिर "छोड़ दे, छोड़ दे", फिर किसी लड़के की तेज़ हँसी।
मैं दौड़ा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno