The Mysterious Bell1073 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1073

6 min read November 5, 2026

"क्या?"

"अगर हम उसे जल्दी निकालते हैं, तो उनके पास वक़्त नहीं होगा। और जो वक़्त के लिए खेलते हैं, उन्हें खुद चलना पड़ता है।"

मैंने सिर हिलाया।

"समझ गया। आज दोपहर।"

"कब?"

"मशीन के रुकने से पहले।"

फिर मैंने रेहाना आपा की बात दोबारा अपने दिमाग़ में उठाई। चाबी। चाबी कहाँ रखी जाती है। मेरा हाथ जेब में गया। घंटी ठंडी थी। बर्फ़ जैसी नहीं — बस ठंडी।

"माँ," मैंने दरवाज़े की तरफ़ वापस देखते हुए धीरे से कहा, "तूने सही पूछा।"

मैं पीछे मुड़ा।

और तभी मेरी नज़र उस सफ़ेद कमीज़ वाले पर पड़ी।

वो अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाल रहा था। बहुत छोटा काग़ज़। किसी दुकान की पर्ची जैसा। वो उसे खोलकर हथेली पर रख लिया, फिर जेब से ही पेंसिल निकाली, और उस पर एक नाम लिखने लगा।

पेंसिल धीरे चल रही थी। जैसे कोई खुद नहीं जानता कि वो सही लिख रहा है या ग़लत।

मैं एक पल को रुका। उसने मुझे नहीं देखा।

फिर काग़ज़ हथेली से उतरकर उसकी जेब में चला गया।

"ये लिख क्या रहे थे?" मैंने पूछा।

रामलाल बाबा ने सिर उठाया। उनकी आँखों में एक पल के लिए जो चीज़ आई, वो डर नहीं थी। वो यह थी — जैसे किसी ने उन्हें किसी ऐसी चीज़ के लिए मजबूर किया हो, जिसे वो खुद भी नहीं चुनते।

"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "लोगों के नाम लिखता हूँ। जो मिलने आते हैं।"

"और अभी किसका नाम लिखा?"

"आपका।"

मैंने सिर हिलाया।

"अच्छा। फिर मेरे नाम के साथ यह भी लिख देते कि आज सुबह सील के सामने मैंने एक आवाज़ सुनी, और मैंने सील नहीं तोड़ी।"

उसके होंठ हिले, पर कुछ नहीं निकला।

"अंकुश," शालिनी ने धीरे से कहा। "काग़ज़ ज़रूरी है, पर सोच-समझकर।"

"सोच रहा हूँ," मैंने कहा। "पर अभी मुझे एक बात समझ में नहीं आ रही।"

"क्या?"

"मैं जब भी किसी को जोड़ता हूँ, कुछ न कुछ कहीं ज़रूर टूटता है। सल्लू चाचा का नाम रद्द हुआ, माँ की दवा घटी, गली का शटर गिरा, भवन की सीढ़ी बंद हुई। यह एक-दो बार नहीं हो रहा। बार-बार हो रहा है। और जितना मैं जोड़ता हूँ, उतना ही किसी और का हिसाब बढ़ता जाता है।"

शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पहले कुछ सोचने वाली झलक आई, फिर वो झलक उतरकर किसी और चीज़ में बदल गई — किसी ऐसी चीज़ में जो वकील बनने से पहले हर इंसान एक बार देखता है।

"यह सवाल है," उन्होंने कहा। "और जिस दिन इसका जवाब मिलेगा, उस दिन यह शहर का नक़्शा बदल जाएगा।"

"तो जवाब कहाँ मिलेगा?"

"वहीं जहाँ हिसाब रखा जाता है," उन्होंने कहा। "जहाँ से चाबी गई।"

मैंने गले से नीचे तक साँस खींची।

अब मेरी नज़र आँगन के उस कोने पर गई जहाँ भोला भाई, रफ़ीक़ और चिंटू मिलकर कुछ ठीक कर रहे थे। काजल के पास वो पुरानी नर्सिंग दवा की थैली थी और उसने गुड्डू को कुछ समझाया। सानिया अपनी लाल कॉपी में कुछ लिख रही थी। बूढ़ी मैडम पहली मंज़िल की खिड़की से नीचे देख रही थीं, और जैसे ही मैंने उनकी तरफ़ देखा, परदा हिल गया।

फिर मैंने सफ़ेद कमीज़ वाले की तरफ़ मुड़कर देखा।

"रामलाल बाबा," मैंने कहा। "तीन दिन की नौकरी है?"

"हाँ।"

"तीन दिन में मुझसे एक बार बात करेंगे?"

"क्या बात?"

"वो लोग जो आपको नाम लिखने को कहते हैं, वो कौन हैं? और उनके पास यह काग़ज़ कहाँ से आता है?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। इस बार उसकी आँखों में थकान के साथ एक और चीज़ आई — दया जैसी, पर दया नहीं। जैसे किसी बूढ़े ने किसी नए से कहा हो — तू अभी छोटा है, ये रास्ता लंबा है।

"तीन दिन में," उन्होंने कहा, "अगर तुम उस पन्ने के साथ बाहर निकले, तो मैं तुमसे एक बात कहूँगा।"

"और अगर नहीं निकला?"

"तो तीन दिन बाद मैं वो काग़ज़ फाड़कर फेंक दूँगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो पन्ना खुल जाए, उसके साथ नाम रहते हैं। और जो पन्ना बंद रहे, उसके साथ कोई नाम नहीं होना चाहिए।"

मुझे उसकी बात पूरी समझ नहीं आई। पर मैंने सिर हिला दिया — क्योंकि कभी-कभी आदमी को पूरी बात न समझने पर भी सिर हिलाना पड़ता है, वरना सामने वाला बोलना बंद कर देता है।

तभी मेरी जेब से एक आवाज़ आई।

बहुत हल्की। ठंडी। एक टिक जैसी।

मैंने हाथ जेब में डाला। घंटी की सतह पर उँगली फिसल गई, जैसे ठंडे पत्थर पर।

फिर मेरे कान के अंदर, बहुत धीमी आवाज़ में, घंटी ने कहा:

"जोड़ा, तो किसने खाया?"

मैं एक पल के लिए जम गया।

यह वो आवाज़ नहीं थी जो पहले आती थी। पहले घंटी कहती थी — बोल, देख, खोल। ये आवाज़ किसी के कान में फुसफुसाने जैसी नहीं थी। यह किसी के पेट की आवाज़ थी। जैसे किसी ने मेरे ही जोड़ों का हिसाब चुरा लिया हो, और अब बता रहा हो कि चोर कहीं और बैठा है।

मैंने घंटी को मुट्ठी में दबाया।

"कौन?" मैंने धीरे से पूछा। "किसने खाया?"

घंटी चुप रही।

"फिर कब बोलेगी?"

अब भी चुप्पी।

केवल इतना एहसास हुआ कि घंटी अब उन्हीं तीन शब्दों के बोझ से और ठंडी हो गई है, जैसे उसने एक नाम लिया हो और उसे अपने अंदर छिपा लिया हो।

मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कीं, फिर खोलीं।

मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।

"मुझे पीछे वाले प्लॉट पर जाना है।"

"अभी?"

"हाँ। ज़मीन का काग़ज़ कहाँ से बना, वहाँ पहले वो देखना है।"

शालिनी ने घड़ी देखी। फिर मेरी तरफ़ देखा।

"और तुम्हारी माँ?"

"वो अपना काम कर रही हैं," मैंने कहा। "मुझे बताने के लिए वो आईं — सील मत तोड़ना। और अब मुझे उनकी बात का जवाब देना है।"

मैंने पीछे मुड़कर सफ़ेद कमीज़ वाले की तरफ़ देखा।

"रामलाल बाबा।"

"हाँ।"

"अगर आप मेरी तरफ़ से कुछ पूछना चाहें, तो मैं अपने काम में लगा हूँ। पर काग़ज़ तीन दिन का है। मेरे पास उससे कम है।"

"कितना?"

"मुझे नहीं पता।"

"तो फिर —"

"तो फिर मैं चलता हूँ।"

और मैं मुड़ गया।

जैसे ही मैंने पहला कदम उठाया, मेरी जेब से फिर वही टिक आई। छोटी। ठंडी। किसी के नाखून की आवाज़ जैसी।

फिर कुछ नहीं।

मैंने हाथ जेब पर रखा। फिर हटा दिया।

और मैंने शालिनी से कहा — "मीरा को बोल दो कि उसी तरह पीछे से चले। भोला भाई को साथ रखो। टिंकू और बच्चों को अस्पताल के आँगन में ही रहने दो। और उस्ताद —"

"उस्ताद क्या?"

मैंने एक पल सोचा। "उस्ताद को कहना कि वो अपनी दुकान की तरफ़ से कोई काग़ज़ लेकर आएँ। जिस पर स्याही वो नहीं जो कल की हो। जिस पर हमारे हाथ न हों।"

शालिनी ने लिखने के लिए काग़ज़ निकाला। मैंने उनका हाथ थाम लिया।

"लिखने की ज़रूरत नहीं," मैंने कहा। "मौखिक कह दो। अगर इस गली में कुछ है जो स्याही में फँस जाता है, तो वो हमारा काम है।"

शालिनी ने सिर हिलाया। काग़ज़ वापस जेब में गया।

मैं चल पड़ा।

मैंने पीछे मुड़कर देखा नहीं।

पर सफ़ेद कमीज़ वाले की छाया मेरे कान के पीछे दरवाज़े की चौखट पर पड़ी रही — एक सीधी, ठंडी लकीर, जो मेरे कदम के साथ लंबी होती जा रही थी।

मैंने आँगन की धूल में अपने जूतों के निशान देखे। जैसे कोई मेरे रास्ते पर चल रहा हो। पर मेरे पीछे कोई नहीं था। सिर्फ़ शालिनी, दस कदम पीछे, फाइल लिए।

आँगन के बीच में, जहाँ सील की सफ़ेद रोशनी पड़ रही थी, एक लड़की खड़ी थी — सफ़ेद कपड़े में, हाथ में पतली पुरानी कॉपी। मैंने उसे पहले नहीं देखा था।

"तुम अंकुश हो?" उसने पूछा।

"हूँ।"

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