The Mysterious Bell – Chapter 1071
शबनम आपा सबके आगे खड़ी थीं। उनके हाथ में वो पीतल की थाली थी जिस पर सुबह सील की पट्टी रखी गई थी। थाली खाली थी। उन्होंने उसे उलटकर सिर के ऊपर उठाया और उस पर तीन बार चिमटी मारी।
टन। टन। टन।
"सुनो सब," शबनम आपा बोलीं। "ये जो दरवाज़ा है ना, इसमें अंदर सुशीला जी हैं। जिनके टिफ़िन से हम सबने खाया है। जिनकी कॉपी में हमारा उधार लिखा है, और जो कभी किसी के उधार की बात किसी को नहीं बतातीं। आज पूरी गली इस दरवाज़े के बाहर खड़ी रहेगी। कोई नहीं जाएगा। न दुकान, न हिसाब, न घर। जो चूल्हा जलाएगा, वो यहीं जलाएगा। और अगर किसी को भूख लगी है, तो मेरी गुमटी के बाहर वो बड़ी पीतल की केतली रखी है, पानी भरी हुई, और उसके पास रोटियाँ रखी हैं। उन्हें खाकर इंतज़ार करना।"
भीड़ में कोई नहीं हँसा। किसी ने कोई शरारत नहीं की। किसी ने ये नहीं कहा कि आपा, ये सब फ़िल्मी हो रहा है। बस सब खड़े रहे।
भोला भाई आए और मेरे पास खड़े हो गए।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "एक बात कहूँ?"
"कहो भोला भाई।"
"ये जो तू कल से कर रहा है, ये ठीक नहीं लग रहा था मुझे। मुझे लगा तू छोटा है, तेरी ज़िद है, और ये सब उतर जाएगा।" वो रुके। "आज सुबह जब मैं शटर खोल नहीं पा रहा था, तब मेरी बीवी ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — तू नीचे आ, मैं शटर खोलती हूँ।"
वो हँसे।
"मैं आठ साल से लंगड़ाती बीवी को शटर खोलता देखता रहा। और उसने खोला, अंकुश। एक आदमी की तरह। तो अब मत कहना कि ये सब बेकार है। जो औरत अपना शटर खुद खोल सकती है, वो अपने आदमी को भी खड़ा देख सकती है।"
काजल आई। उसने मेरे हाथ में दवा की पर्ची रखी।
"भैया, डॉक्टर इसरानी ने अंदर से पर्ची भेजी है। हमें ये दवा उनकी खिड़की पर बाहर से जमा करानी है, और उनका आदमी अंदर ले जाएगा। माँ की दवा दो दिन की बची थी। अब कम से कम दस दिन हो जाएँगी।"
"दस दिन," मैंने कहा।
मैंने पर्ची पढ़ी। फिर मैंने काजल को देखा।
"तू रोई?"
"नहीं," उसने कहा, और उसकी नाक लाल थी, और उसने दोनों हाथों से अपनी किताब कसकर पकड़ी हुई थी।
"काजल।"
"भैया, रोऊँगी नहीं। मैं आज रोऊँगी नहीं। मैं आज रात तक रोऊँगी नहीं। जब हम माँ को घर ले जाएँगे, तब रोऊँगी। और उस वक़्त मैं जानबूझकर रोऊँगी, क्योंकि मुझे जानबूझकर रोने का बहुत मन है।"
ठीक बारह बजे शालिनी अस्पताल लौटी। वो सीधी मेरी तरफ़ आई, किसी से नहीं बोली, और मुझे पीछे की दीवार तक ले गई, जहाँ भीड़ नहीं थी।
"अंकुश," उसने कहा, "जज साहब का आदेश है पन्ना। और मैंने जानबूझकर उनसे ये नहीं पूछा कि पन्ना कहाँ है। अगर मैं पूछ लेती, तो भारद्वाज का वकील भी सुन लेता।"
"तो पन्ना कहाँ है?"
"वहीं जहाँ हम पहुँच ही नहीं पाए," उसने कहा। "सील किए वार्ड के पुराने रिकॉर्ड कमरे में।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"पर शालिनी, रिकॉर्ड कमरा तो हम कल रात खोलकर देख आए। उसमें गलियारा, रैक, वो छिपा दरवाज़ा, वो भूरी जिल्द वाला रजिस्टर — सब देख आए।"
"वो रिकॉर्ड कमरा नहीं था," उसने कहा। "वो छोटा कमरा था, जिसे रिकॉर्ड कमरा कहकर बुलाया जाता है। असली रिकॉर्ड कमरा — वो जिसमें पुराने रजिस्टर, पुरानी फाइलें और पुरानी ज़मीन के काग़ज़ रखे जाते थे — वो छिपे दरवाज़े के उस पार वाली सीढ़ियों के नीचे है। और वो सीढ़ियाँ नक़्शे में हैं।"
"और वो जगह सील के अंदर है?"
"सील के ठीक अंदर," उसने कहा। "और मैं तुमसे एक सीधी बात कहूँगी। अब हमारे पास रास्ता सिर्फ़ एक है — वो जो जज साहब ने हमें नहीं दिया, और वो जो बिना अदालत के खुलेगा। मैं तुम्हें ये कहने के लिए नहीं कह रही कि तुम तोड़ो। मैं तुम्हें ये कहने आई हूँ कि जो भी करोगे, एक गवाह साथ रखना। जो अदालत से बाहर हो और साफ़ हो, वो अदालत में टिकता है। और जो छिपकर हो, वो अदालत में गिर जाता है।"
"तो फिर?"
"तो फिर," उसने कहा, "हमें उस पन्ने तक पहुँचना है ऐसे कि कल जब मैं जज के सामने खड़ी होऊँ, तो कह सकूँ — ये पन्ना हमने चुराया नहीं, इस अस्पताल ने हमें दिया।"
मैंने सिर हिलाया।
"और अंकुश," उसने कहा, "एक बात और। जो आदमी जज के पास नहीं गया, वो कुछ और कर रहा है।"
"क्या?"
"उसने दोपहर में एक लड़की को बाहर बुलाकर पूछा कि तुम्हारी माँ किस वार्ड में है। मुझे मीरा ने बताया। लड़की ने कहा — जो सफ़ेद पट्टी लगी है उसी में। और उस आदमी ने कहा — अच्छा, तो फिर सील के अंदर वाले कमरों की चाबी कहाँ रखी जाती है?"
मेरा हाथ जेब में गया। घंटी ठंडी थी। बर्फ़ से भी ज़्यादा नहीं, बस ठंडी। जैसे किसी और के हाथ में।
मैं धीरे-धीरे सील किए वार्ड के बाहर गया। मुझे पीछे से आवाज़ें आ रही थीं — किशनलाल काका किसी से कह रहे थे कि कंबल गीले नहीं होने देने, नसीमा बाई कह रही थीं कि पानी वाले डिब्बे छाया में रखो, भोला भाई किसी लड़के को डाँट रहे थे कि माँ की पर्ची हवा में मत लहराओ।
और सबसे ऊपर शबनम आपा की आवाज़, जो आज किसी से नहीं, खुद से बोल रही थीं।
"चूल्हा जलता रहेगा," वो कह रही थीं। "चूल्हा जलता रहेगा। मशीन आए या न आए।"
मैं सील की पट्टी के सामने खड़ा हुआ।
सफ़ेद पट्टी। दो नीली मुहरें। उनके बीच एक लकीर।
मैंने पट्टी को छुआ नहीं। मैंने सिर्फ़ उसके सामने खड़े होकर साँस ली।
अंदर से साँस की मशीन की आवाज़ आ रही थी। और उसके बीच, बहुत हल्के से, किसी के खाँसने की आवाज़।
माँ की खाँसी।
वो खाँसी मैंने उन्नीस साल से सुनी है। हर सर्दी में, हर बारिश में, हर उस रात में जब वो चूल्हे के पास बैठी होती थीं और कहती थीं — अंकुश, तू पंखा मत चला, मुझे ठंड लगती है।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "मैं एक बात कहने आया हूँ। तूने कहा था कि इस बार खुद को तोड़ना पड़ेगा। मैंने सारी रात सोचा और मुझे पता नहीं क्या तोड़ना है। मैं ईमानदार आदमी हूँ, मैं झूठ नहीं बोलता, मैं लड़कों की जेब में लिफ़ाफ़े नहीं डालता। तो मेरे अंदर ऐसा क्या है जो टूटेगा?"
घंटी चुप रही।
"और अगर टूटना ही है," मैंने कहा, "तो पहले उस पन्ने तक पहुँचने का रास्ता दे। माँ की साँस मशीन पर है, शालिनी के पास एक दिन है, और उस आदमी ने चाबी कहाँ रखी जाती है, ये पूछना शुरू कर दिया है।"
घंटी ठंडी रही।
मैंने उसे हिलाया।
"अरे, बोल ना। बोलती क्यों नहीं?"
फिर भी कुछ नहीं। मैंने उसे कान के पास लाकर सुना। पहले तो कुछ भी नहीं। फिर, बहुत दूर से, जैसे किसी दूसरे शहर के रेडियो से, एक हल्की झुरझुरी आई, जो दब गई।
मैंने घंटी नीचे की। मेरी हथेली पर एक पतली सी लकीर बन गई थी, जैसे किसी ने धूल में उँगली फेर दी हो।
और तभी, सील के अंदर से, खाँसी के बीच, माँ की आवाज़ आई।
कमज़ोर। टूटी। पर साफ़। इतनी साफ़ जैसे वो मेरे कान के पास बोल रही हों।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "अंदर आ।"
और घंटी, जो रात भर ठंडी थी, जो अभी दबी आवाज़ में झुरझुरा रही थी, एकदम बिल्कुल चुप हो गई।
पूरी तरह चुप।
जैसे उसने भी सुन लिया हो।
जैसे उसने भी जान लिया हो कि जो आवाज़ उसके अंदर से नहीं आई, वो किसी और चीज़ ने भेजी है।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno