The Mysterious Bell – Chapter 1070
मैं कुछ नहीं बोला। मैं गली का मिस्त्री हूँ, मैं तेल, पेंच और तार समझता हूँ। माँ के उधार का हिसाब मैं नहीं समझता। माँ का हिसाब उसी के पास रहने दो।
चार बजकर दस मिनट पर शालिनी का फोन आया।
"अर्ज़ी दर्ज हो गई," उसने कहा। "जज साहब साढ़े नौ बजे बैठेंगे। हम वहाँ पहले पहुँचेंगे। जो काग़ज़ हैं, सब लेकर। असली, नकल, सील आदेश की कॉपी, और वो पीला पन्ना जो तेरे पास है।"
"और आठवाँ पन्ना?"
"वो नहीं है," उसने कहा। "इसीलिए हमें एक भी चीज़ नहीं छिपानी है। जो है वो सब दिखाना है। जज के सामने अधूरा सच छिपाना सबसे बड़ी गलती होती है। तेरी घंटी के हिसाब से भी, और मेरे हिसाब से भी।"
"मेरी घंटी," मैंने जेब में हाथ डालकर कहा, "आज रात पत्थर जैसी ठंडी है।"
"तो ठंडी रहने दे। तू बोलता रह, वो गरम हो जाएगी।"
सुबह नौ बजे अदालत के बाहर की गर्मी पहले से चढ़ी हुई थी। पत्थर की बेंचें गरम थीं, पेड़ की छाया छोटी थी, और बाहर एक लाइन थी जिसकी शुरुआत दीवार से और आख़िर किसी की जेब से होती थी।
अंदर जाने से पहले शालिनी ने अपना बाल पीछे बाँधा और मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश, एक बात।"
"बोल।"
"जज साहब काग़ज़ देखेंगे और सवाल पूछेंगे। मैं तेरी जगह जवाब दूँगी, क्योंकि मैं वकील हूँ। पर अगर वो खुद तुझसे पूछें, तो सीधा जवाब देना। ताना मत मारना। मज़ाक मत करना। तेरा मज़ाक अदालत में बहुत प्यारा लगता है, पर बाहर फिर वही मज़ाक खबर बन जाता है।"
"समझ गया," मैंने कहा। "सीधा बोलूँगा।"
"वादा?"
"वादा। उतना ही जितना ज़रूरी है।"
मीरा कैमरा बैग में रखकर गई, हाथ में सिर्फ़ एक कॉपी और कलम। उसने जाते वक़्त मेरे कंधे पर हल्का हाथ रखा और कहा, "मैं तेरी जगह नहीं बोलूँगी। मैं सिर्फ़ सुनूँगी और लिखूँगी। और जो जज साहब कहेंगे, वो शब्द-दर-शब्द गली तक पहुँचेगा।"
"तू अंदर जा रही है?"
"वकील के साथ सहायक की जगह मिलती है, अगर अंदर वाला इजाज़त दे। मैंने अर्ज़ी में अपना नाम सहायक लिखवाया है।"
वो गई। दरवाज़ा बंद हुआ। उसके बाद की घंटी घड़ी पर बजती रही और हम बाहर बैठे रहे।
अंदर क्या हुआ, ये मुझे शालिनी ने बाद में बताया, क्योंकि वो बाहर आकर लगभग पूरा हिसाब मुझे सुनाती रही, शब्द-दर-शब्द, जैसे माँ टिफ़िन का हिसाब बताती हैं।
जज साहब ने पहले शालिनी की अर्ज़ी पढ़ी। फिर सील आदेश की नकल उनके सामने रखी गई। फिर वही सवाल आया जो मैं सोच रहा था।
"अस्पताल के नाम पर कोई काग़ज़ है?" जज साहब ने पूछा।
"है, माय लॉर्ड," शालिनी ने कहा। "नूर अस्पताल की ज़मीन का शर्तनामा, जिसमें सात अंगूठे और आठवाँ गवाह अंगूठा है। उसकी मूल नकल अस्पताल के बंद रिकॉर्ड कमरे में है।"
"तो लाओ।"
"वही अर्ज़ी है, माय लॉर्ड। वार्ड सील है, रिकॉर्ड कमरा उसी सील के दायरे में है। हमें एक दिन की अनुमति चाहिए, एक आदमी और एक वकील के लिए।"
जज साहब ने चश्मा उतारा। वो बूढ़े थे, और उनकी मेज़ पर पानी का गिलास रखा था जिसमें एक भी बूँद कम नहीं हुई थी, जैसे उन्होंने पूरे दिन उसे छुआ ही न हो।
"मैं सील नहीं खोल सकता," उन्होंने कहा। "और मैं तुम्हें बिना सील खोले अंदर भी नहीं भेज सकता। पर एक बात है जो मैं कर सकता हूँ।"
शालिनी ने सिर उठाया।
"जो मरीज़ अंदर हैं, उनके इलाज के लिए एक नर्स और दवा अंदर जा सकती है। सिर्फ़ इलाज। कोई काग़ज़ नहीं, कोई सामान नहीं, कोई रिश्तेदार नहीं।"
"माय लॉर्ड, ज़मीन का काग़ज़—"
"मिस दीक्षित," उन्होंने कहा, "मैं सील नहीं खोलूँगा। पर मैं इतना कहूँगा कि अगर तुम्हारे हाथ में वो आठवाँ पन्ना आ जाए, तो सुनवाई भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का पक्ष सुने बिना नहीं होगी। और उस दिन अगर काग़ज़ ठीक निकला, तो मैं उस सील को उसी दिन हटा दूँगा। यह मेरा आदेश है, मेरी मेज़ से, तारीख़ के साथ।"
शालिनी ने वो लाइन अपनी कॉपी में लिखी और जज साहब ने उस पर मुहर लगाई। मीरा ने कहा कि उस वक़्त शालिनी का हाथ नहीं काँप रहा था, पर उसकी आँखें ज़रूर भर आई थीं।
अदालत से लौटकर मैं अस्पताल के गेट पर पहुँचा तो सामने वही आदमी खड़ा था। मोटी फाइल, सफ़ेद कुर्ता, और जूते ऐसे चमक रहे थे जैसे अभी दुकान से निकाले हों। वही चंद्रेश का आदमी जो कल सील की पट्टी लेकर आया था।
"अंकुश यादव?"
"हाँ," मैंने कहा। "मैं हूँ। और ये अस्पताल है, यहाँ लोग बीमार आते हैं, यहाँ खड़े होकर फ़ाइल लहराना ठीक नहीं लगता।"
वो मुस्कुराया। इन लोगों की सबसे बड़ी ताक़त यही है — वो बुरा नहीं लगते। वो मुस्कुराते हैं, और आपको लगता है कि शायद ये इंसान ही ठीक कह रहा है।
"सुनो," उसने कहा। "साहब ने कहा है। एक काग़ज़ है, दुकान का। तुम उस पर अंगूठा लगा दो, और तुम्हारी माँ को आज ही निजी कमरे में भर्ती कर दिया जाएगा। अलग कमरा। अलग नर्स। अलग डॉक्टर। जो जाँच रुकी हैं, वो आज शाम तक हो जाएँगी।"
मैंने उसकी फ़ाइल देखी। फिर उसके जूते। फिर उसकी फ़ाइल।
"और उस काग़ज़ पर क्या लिखा है?"
"वही जो कल तुम्हारे पापा ने मना किया था। तुम्हारी दुकान। तुम्हारा नाम। तुम्हारा अंगूठा। बस।"
मैं हँस पड़ा। सच में हँसा। वो हँसी ऐसी नहीं थी जैसी दुकान पर टिंकू के मज़ाक पर आती है। वो हँसी वैसी थी जैसे अंदर कुछ टूट गया हो और आवाज़ बाहर हँसी बनकर निकली हो।
"सुन भाई," मैंने कहा, "मैं तुझे एक बात बताऊँ। मैं चौबीस साल का हूँ। मेरे पास कुछ नहीं है। एक दुकान है जिसका बोर्ड कल बदल दिया गया, एक ट्रंक है जिसमें रिंच हैं, एक साइकिल है जिसकी घंटी कभी-कभी मेरी बात सुनती है, और एक माँ है जो आज सील के अंदर साँस ले रही है।"
"तो फिर अंगूठा लगा दो। माँ भी बचेगी, दुकान भी।"
"दुकान नहीं बचेगी," मैंने कहा। "दुकान तो अंगूठे के साथ जाएगी। और सुन — अगर मैं अपनी माँ को ज़िंदा रखने के लिए अपनी गली बेच दूँ, तो मेरी माँ जब ठीक होकर बाहर आएगी, तो वो मुझे क्या कहेगी? वो कहेगी कि बेटा, तूने मेरी साँस के बदले गली दे दी? मेरी माँ वो औरत है जो टिफ़िन में दाल से पानी नहीं मिलाती। वो यह कभी नहीं कहेगी कि अच्छा किया। वो मुझे मारेगी। हाथ में चिमटी पकड़े मारेगी।"
उस आदमी की मुस्कान थोड़ी कम हुई।
"ये भावुकता है," उसने कहा। "सोच लो। शाम तक का वक़्त है।"
"मैंने सोच लिया है," मैंने कहा। "और तेरे साहब से ये भी कह देना कि काग़ज़ काग़ज़ होता है, माँ माँ होती है। दोनों एक ही तराज़ू पर नहीं तोले जाते। हम मिस्त्री लोग हैं, हमें तराज़ू का हिसाब आता है।"
वो चला गया। उसकी गाड़ी के दरवाज़े की आवाज़ आई, और फिर धूल उड़ी, और फिर शांति।
मैं सील के सामने खड़ा रहा। दो मिनट। पाँच मिनट।
और तभी मुझे पीछे से आवाज़ें सुनाई दीं, जो किसी भीड़ जैसी थीं, पर गुस्से वाली नहीं, काम वाली।
मैं मुड़ा।
गेट पर पूरी गली खड़ी थी।
भोला भाई के हाथ में एक बड़ी पटिया थी जिसे उन्होंने पत्थर के पुल से उठाकर लाकर अस्पताल के बाहर रख दिया था। नसीमा बाई के हाथ में पानी की बाल्टी थी और सिर पर दाल का एक पैकेट। किशनलाल काका एक बोरी पर बैठे थे जिसमें कंबल थे, और वो कंबल उन्होंने अपनी दुकान से नहीं, अपने घर से उठाए थे, क्योंकि दुकान के कंबल बिक चुके थे। रमेश भाई के हाथ में दवा की एक थैली थी और उनकी आँखें लाल थीं, और मुझे पता था कि वो इसलिए नहीं रोए कि माँ बीमार हैं, वो इसलिए रोए कि उनकी बीवी की दवा भी इसी अस्पताल से आती है और आज सुबह उन्हें भी डर लगा था कि अस्पताल बंद हो गया तो क्या होगा।
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