The Mysterious Bell – Chapter 1066
"एक घंटा," मैंने कहा। "एक घंटे में लौट आना।"
"डेढ़," मीरा ने कहा, और चल दी।
दुबे अंकल लौटे। उनका चेहरा गंभीर था, पर आँखों में कुछ था।
"अफ़सर आएगा," उन्होंने कहा। "दस बजे। पर एक शर्त पर।"
"क्या?"
"वो कहेगा कि यह काग़ज़ उसने नहीं बनाया," दुबे अंकल ने कहा। "वो कहेगा कि उसे सिर्फ़ मुहर लगाने को कहा गया। और अगर वो यह कहे, तो हमें उसकी बात पर भरोसा करना पड़ेगा।"
"और अगर वो झूठ बोले?"
दुबे अंकल ने छड़ी पर दोनों हाथ रखे। "तो काग़ज़ का कोई फ़ायदा नहीं।"
शबनम आपा ने चाय लाई। कुल्हड़ में, गरम। उसने पहले माँ की तरफ़ देखा — पीले वार्ड की बंद खिड़की — फिर सबको चाय बाँटी।
"पी लो," उसने कहा। "रात लंबी है। और भूखे आदमी की बात में दम नहीं होता।"
मैंने कुल्हड़ पकड़ा। गरमी मेरी उँगलियों में गई। उसके पीछे, गलियारे की रोशनी में, मैंने देखा — सल्लू चाचा का बेड, शकील उसके पास बैठा, नीली ऑक्सीजन नली, और शकील के हाथ में एक पुरानी घड़ी जो वो घुमा रहा था।
मैं उसके पास गया।
"क्या समय है?" मैंने पूछा।
"सात बजकर दस मिनट," शकील ने कहा। "पर यह घड़ी रुकी हुई है। इसका समय दो बजकर दस मिनट पर टिका है।"
"किसकी है?"
"अब्बा की," उसने कहा। "मुझे दी थी। कहते थे, यह कभी झूठ नहीं बोलती। पर यह रुक गई।" उसने घड़ी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "तुम देख सकते हो।"
मैंने घड़ी ली। पुरानी, टूटे चमड़े के पट्टे वाली। उसके पीछे एक निशान खुदा था — दो लकीरें और बीच में बिंदु।
वही निशान।
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने शकील की तरफ़ देखा।
"यह निशान," मैंने कहा, "कहाँ से आया?"
"पता नहीं," उसने कहा। "अब्बा कहते थे — यह उनकी माँ का निशान है। मेरी दादी का। जब वो यह घड़ी देखती थीं, तो कहती थीं — यह एक दिन तुम्हें रास्ता दिखाएगी।"
"क्या तुम्हारी दादी ज़िंदा हैं?"
"नहीं," उसने कहा। "कुछ साल पहले चल बसीं।"
मैंने घड़ी को करवट दी। उसकी पीठ पर, निशान के नीचे,मैंने घड़ी को करवट दी। उसकी पीठ पर, निशान के नीचे, धूल भरी खुरचन में एक नाम आधा बना हुआ था।
"हमी…"
मैंने आँखें सिकोड़ीं। गलियारे की पीली रोशनी उस पुरानी धातु पर पड़ रही थी और अक्षर धीरे-धीरे साफ़ हो रहे थे। पहला अक्षर ह, फिर म, और फिर एक आधा ई। बाकी जगह खुरची हुई थी, जैसे किसी ने नाखून से जान-बूझकर मिटाया हो।
"यह क्या है?" शकील ने गर्दन आगे करके पूछा।
"तूने कभी इसके पीछे देखा नहीं?"
"नहीं," उसने कहा। "अब्बा इसे कभी पलटकर नहीं दिखाते थे। उनका कहना था कि घड़ी का पीछा देखा नहीं जाता।"
"क्यों?"
शकील ने कंधे उठाए। "पता नहीं। बस ऐसे ही कहते थे।"
मैंने घड़ी उसकी हथेली पर रख दी और उसके चेहरे को देखा।
"तेरी दादी का नाम क्या था?"
उसने पलक झपकाई, जैसे यह सवाल उसे अचानक उस बात से जोड़ रहा हो जो वह कभी सोचता ही नहीं था।
"हमीदा," उसने कहा। "हमीदा बेगम। पर गली में सब उन्हें हमीदा दाई कहते थे।"
मेरा हाथ ठंडा हो गया। गलियारे की रोशनी, सल्लू चाचा के बेड से आती ऑक्सीजन की फुसफुसाहट, दूर कहीं खड़ी शबनम आपा की चूड़ियों की हल्की खनक — सब एक ही हिसाब में बैठ गए, जैसे किसी बुज़ुर्ग ने बैठकर उँगली से गिनती करके बताया हो।
"क्या वो वही हमीदा दाई हैं," मैंने धीरे से पूछा, "जो नूर अस्पताल में काम करती हैं? जो रसोई में चाय-पानी करती हैं?"
शकील की आँखें फैल गईं।
"तुम्हें कैसे पता? वो तीस साल से वहीं हैं। पहले वार्ड में झाड़ू लगाती थीं, अब रसोई में।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ उस घड़ी को देखा जो उसकी हथेली पर पड़ी थी, और उस खुरचे नाम को, जो आधा था, पर बोलने के लिए काफ़ी था।
वही हमीदा, जिसने उस रात पिछले दरवाज़े की नाली से आधा जला काग़ज़ उठाकर रखा था। वही हमीदा, जिसने कहा था — सफ़ेद वर्दी वाली बाई ने कहा, यह उस लड़के को दे देना। और उसी के पोते के हाथ में आज यह घड़ी थी, जिस पर उसी का आधा नाम खुरचा हुआ था।
"अंकुश भैया," शकील ने कहा, "कुछ हुआ है?"
"हुआ है," मैंने कहा। "पर अभी पूरा नहीं पता क्या।" मैंने घड़ी उसकी तरफ़ बढ़ाई। "यह घड़ी रात भर मेरे पास रह सकती है?"
शकील ने एक पल सोचा, फिर उसे मेरी हथेली पर रख दिया।
"रख लो," उसने कहा। "मेरे पास यह रोज़ रुकी रहती है। शायद तुम्हारे पास चल पड़े।"
"सही-सलामत लौटा दूँगा," मैंने कहा।
शकील हँसा। "अब्बा कहते थे — चीज़ें लौटाने के वादे मत करो। चीज़ें लौटा दो।"
मैंने घड़ी जेब में रखी और उसके कंधे पर हाथ रखा। उसका कंधा पतला था, हड्डी जैसा। सोलह साल का लड़का, जिसकी जेब में किसी ने एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा डाल दिया था और जिसकी ज़िंदगी उसी दिन से दो हिस्सों में बँट गई थी।
मैं पीले वार्ड की दीवार के सहारे बैठ गया। सफ़ेद पट्टी मेरे सिर के ऊपर चिपकी थी और उस पर दो नीली मुहरें लगी थीं। मुहरों की स्याही अब सूख चुकी थी और उस पर धूल बैठ रही थी, जैसे वह काग़ज़ पहले से ही पुराना हो गया हो।
मैंने घुटनों में सिर रख लिया।
मैं रो नहीं रहा था। मैं बस बैठा था। पर सच यह था कि मेरी आँखों के कोने में जो था, वह रोने जैसा ही था। कभी-कभी आँसू बहते नहीं, बस थक जाते हैं और वहीं ठहर जाते हैं, जैसे घर की दीवार के नीचे रुका हुआ बरसाती पानी।
पैरों की आवाज़ आई। हल्की, जल्दी में।
"अंकुश।"
मैंने सिर नहीं उठाया। मुझे पता था कौन है।
मीरा मेरे बगल में बैठ गई। उसकी जैकेट ठंडी थी, जैसे वह बाहर की हवा में काफ़ी देर रही हो। उसने अपना कैमरा घुटनों पर रखा और दोनों हाथों से अपने बाल पीछे किए।
"तू यहाँ क्या कर रहा है?" उसने पूछा।
"गिन रहा हूँ," मैंने कहा।
"क्या?"
"दरवाज़े के इस तरफ़ की टाइलें," मैंने कहा। "बारह पूरी, और आधी। फिर टूटी हुई।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ में ताना नहीं था, सिर्फ़ सच था।
"रोने से काग़ज़ नहीं बदलेगा।"
"मैं रो नहीं रहा।"
"मैंने कहा भी नहीं कि तू रो रहा है," उसने कहा। "मैंने सिर्फ़ बता दिया कि रोने से क्या नहीं होता।"
मैं हँसा। छोटी, टूटी हँसी। फिर मैंने सिर उठाया। मीरा के माथे पर धूल की एक पतली लकीर थी और उसकी आँखें लाल थीं, पर वह रो नहीं रही थी। मुझे लगा कि आज किसी को भी रोने की इजाज़त नहीं मिली है — सिवाय माँ के, जो अंदर थीं और जिन्हें हमारी इजाज़त की ज़रूरत नहीं थी।
"तूने कैमरा बंद क्यों किया?" मैंने पूछा।
"क्योंकि जो आगे होने वाला है," उसने कहा, "वो कैमरे के लिए नहीं है। वो हमारे लिए है।"
मैंने वार्ड की बंद खिड़की की तरफ़ देखा। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। पर मुझे पता था कि वहाँ अंदर एक औरत है जो साँस गिन रही है, और एक डॉक्टर है जो उसकी साँस के साथ-साथ अपनी साँस भी रोककर बैठा है।
"मीरा," मैंने कहा।
"हाँ।"
"अगर कल सुबह सब ठीक नहीं हुआ," मैंने कहा, "अगर हम वो काग़ज़ नहीं तोड़ पाए — तो क्या होगा?"
वह कुछ देर चुप रही। फिर उसने अपने घुटनों पर रखे कैमरे का ढक्कन खोला और बंद किया। खट, खट। दो बार।
"तो काग़ज़ जीत जाएगा," उसने कहा। "और हम सब कहीं बैठकर यह याद करेंगे कि एक बार हमने कोशिश की थी।"
"तू बहुत दिलासा देने वाली है," मैंने कहा।
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