The Mysterious Bell1065 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1065

6 min read November 5, 2026

माँ अस्पताल के गलियारे में थीं। जब हम पहुँचे तो डॉक्टर इसरानी बाहर आए थे। उनका चेहरा थका हुआ था, पर आँखों में वही चीज़ थी जो पहले दिन थी — ज़िद। ठंडी, सूखी, बूढ़ी ज़िद।

"अंदर कोई नहीं जा सकता," उन्होंने कहा। "मैंने भी अंदर जाने के लिए अपनी नौकरी दाँव पर लगाई थी। वो मरीज़ है, मैं डॉक्टर। यही मेरा हक़ है, कोई एहसान नहीं।"

"डॉक्टर साहब," पापा ने कहा। "मैं उसका शौहर हूँ।"

डॉक्टर इसरानी ने उन्हें देखा। कुछ देर देखा। फिर उन्होंने कहा, "शौहर होने से काग़ज़ नहीं बदलता। पर आज शाम को एक बात हो सकती है।"

"क्या?"

"एक नर्स अंदर जा सकती है," उन्होंने कहा। "अगर प्रशासन की तरफ़ से काग़ज़ बने। मेडिकल कारण से। मैंने अभी दुबे जी से बात की है। वो अपना पुराना रिश्ता लगा रहे हैं।"

मैंने दुबे अंकल की तरफ़ देखा। वो पास ही खड़े थे, छड़ी पर टिके, सफेद कुर्ता, नीली आस्तीन। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस सिर हिलाया।

"आज रात दस बजे," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "एक नर्स अंदर जाएगी। दवा बदलेगी। और माँ की साँस की नली देखेगी।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "पर एक शर्त है। काग़ज़ पर नाम मेरा नहीं, किसी और का होगा।"

"किसका?"

"तुम्हारा," उन्होंने कहा। "तुम लिखवाओगे।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"मैं अंदर नहीं जाऊँगा," मैंने कहा। "पर नाम लिखवाऊँगा।"

डॉक्टर इसरानी ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गए। फिर बोले, "ठीक है। काग़ज़ लाओ।"

शालिनी पीछे से आई। उसकी काली फाइल हाथ में थी, और उसके ऊपर एक नई सफेद शीट थी।

"काग़ज़ मेरे पास है," उसने कहा। "पर एक बात पहले।"

"क्या?"

"सील आदेश में," उसने कहा, "एक तारीख़ की जगह खाली है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "मतलब?"

"मतलब ये कि जिसने यह आदेश बनाया, उसने जल्दी में बनाया। चंद्रेश के दफ़्तार की परची पर तारीख़ खाली है। यह काग़ज़ अदालत में टिक नहीं सकता जैसा है। अगर हम कल सुबह नौ बजे से पहले—"

"नौ बजे क्या है?"

"नौ बजे रिकॉर्ड कमरे की चाबी रणवीर के दफ़्तार भेजी जानी है," शालिनी ने कहा। "अगर वो चाबी भेज दी गई, तो रजिस्टर, चाबी, सब कुछ उनके हाथ में चला जाएगा। पर इस एक तारीख़ की वजह से हमें कुछ घंटे की राहत मिल सकती है।"

"कितने घंटे?"

"शायद आठ। शायद सिर्फ़ चार।" उसने फाइल बंद की। "पर जब तक मामला खुला है, सील को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। और चुनौती देने के लिए हमें वह पन्ना चाहिए जो सील के आदेश के साथ जुड़ा है।"

"कौन सा पन्ना?"

"आठवाँ पन्ना," उसने कहा। "जिसे मैं सात अंगूठों के साथ खोज रही हूँ। वो अभी रिकॉर्ड कमरे में है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हारे पास चाबी है। उस चाबी से वो पन्ना आज रात निकल सकता है।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और चाबी को टटोला। ठंडी थी। डॉक्टर इसरानी की दी हुई। एक बार खुलने वाली।

"अगर हम आज रात वो पन्ना निकाल लें," मैंने कहा, "तो सुबह अदालत जा सकते हैं?"

"मैं जा सकती हूँ," शालिनी ने कहा। "अदालत में एक वकील चाहिए।"

"तुम हो ना।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर देखा। फिर उसने सिर हिलाया। "हाँ," उसने कहा। "मैं हूँ।"

पीछे से शबनम आपा की आवाज़ आई — काजल को सँभालते हुए। "मैं काजल के पास हूँ। तुम अपना काम देखो।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। काजल गलियारे की बेंच पर बैठी थी। उसकी आँखें लाल थीं, पर वो रो नहीं रही थी। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी नज़र में कुछ था — जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार।

मैं उसके पास गया।

"काजल," मैंने कहा।

"मैं ठीक हूँ," उसने कहा। "तू अपना काम कर।"

"तू ठीक नहीं है।"

"नहीं हूँ," उसने कहा। "पर ठीक होने का वक़्त बाद में आएगा। अभी माँ अंदर है।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। "एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"रात को जो नर्स अंदर जाएगी — वो मुझे अंदर ले जा सकती है?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"ट्रेनी नर्स हूँ," उसने कहा। "मेरा नाम काग़ज़ पर है। अगर नर्स अंदर जाती है, तो मैं उसके साथ जा सकती हूँ।" उसकी आवाज़ काँपी। "मुझे माँ को देखना है।"

मैंने सोचा। फिर मैंने कहा, "डॉक्टर इसरानी से पूछता हूँ।"

"पूछ," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में जो था, वो माँग नहीं थी। वो अधिकार था।

मैं लौटा। डॉक्टर इसरानी से बात की। उन्होंने पहले मना किया, फिर कहा, "अगर वो मेरे साथ रहेगी, तो मैं उसका नाम काग़ज़ पर लिखवा सकता हूँ। पर वो मरीज़ है, तुम्हारी माँ है — वो इलाज नहीं करेगी।"

"मैं नहीं करूँगी," काजल ने पीछे से कहा। "मैं सिर्फ़ हाथ पकड़ूँगी।"

डॉक्टर इसरानी ने उसकी तरफ़ देखा। और पहली बार उनके चेहरे पर कुछ नरम हुआ। "ठीक है," उन्होंने कहा। "नाम लिखवाओ।"

शालिनी ने काग़ज़ तैयार किया — एक पन्ना, दो हस्ताक्षर, और नीचे वो खाली तारीख़।

"यहाँ," उसने कहा, "एक दिक्कत है।"

"क्या?"

"तारीख़," उसने कहा। "अगर मैं आज की तारीख़ डालूँगी, तो यह काग़ज़ सुबह नौ बजे से पहले चलना चाहिए। पर नर्स को दस बजे जाना है।" उसने रुककर कहा। "मतलब रात दस बजे। इसे आज ही की तारीख़ में डालना पड़ेगा, और अफ़सर का हस्ताक्षर अभी चाहिए।"

"अफ़सर कहाँ है?"

"वो जिसने सील लगाई थी — वो शायद शहर में है," उसने कहा। "पर उसका दफ़्तार कल खुला रहता है।"

"तो हम रात में उसे कैसे पाएँगे?"

उसने फाइल खोली और एक काग़ज़ निकाला। "यह," उसने कहा, "सील अफ़सर की कॉपी है। इस पर एक नंबर लिखा है।"

उसने मुझे काग़ज़ दिया। उस पर एक फोन नंबर था, और नीचे लिखा था — समय सीमा: सील लागू होने के छह घंटे के भीतर।

"मतलब हमें उसे अभी बुलाना पड़ेगा," मैंने कहा।

"हाँ," शालिनी ने कहा। "पर एक बात। जो काग़ज़ सील के साथ आया, वो इस अफ़सर ने नहीं बनाया। उसने सिर्फ़ मुहर लगाई। असली काग़ज़ किसी और दफ़्तार में बना। और अगर वो अफ़सर आज रात यहाँ आता है, तो वो अपने ऊपर लगा इल्ज़ाम भी लाएगा।"

"मतलब अगर उसने काग़ज़ खुद बनाया नहीं, तो वो हमारी तरफ़ है?"

"शायद," शालिनी ने कहा। "या शायद वो डरा हुआ है। और डरा हुआ आदमी सच नहीं बोलता। हमें उसे अपनी तरफ़ करना पड़ेगा।"

मैंने पीले वार्ड की तरफ़ देखा। फिर घड़ी देखी। सात बजने वाले थे।

"मैं उसे फोन करता हूँ," मैंने कहा।

"नहीं," दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने अपनी छड़ी ज़ोर से ज़मीन पर टिकाई। "तुम नहीं, मैं करूँगा।"

उन्होंने अपनी जेब से एक पुरानी डायरी निकाली। नीली जिल्द वाली, घिसी हुई। उसके पन्ने उलटे, एक नंबर ढूँढ़ा, और दूर खड़े होकर बात करने लगे।

हम सब चुप खड़े रहे। मीरा मेरे पास आई।

"तू ठीक है?" उसने पूछा।

"नहीं," मैंने कहा।

"अच्छा," उसने कहा। "अगर तू ठीक होता, तो मुझे डर लगता।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने मेरी बात का मज़ाक नहीं उड़ाया। वो सीधे मेरी आँखों में देख रही थी, जैसे मुझमें कुछ ढूँढ रही हो। और शायद उसे मिल गया, क्योंकि उसने कहा, "काग़ज़ के बारे में मत सोच। जो करना है, कर।"

"तुम नहीं आ रही?"

"मैं वार्ड के बाहर रहूँगी," उसने कहा। "अब तक जो कुछ हुआ, वो सब रिकॉर्ड कर चुकी हूँ। पर अब मैं कुछ और करने जा रही हूँ।"

"क्या?"

"उस औरत को ढूँढूँगी," उसने कहा। "दुपट्टा लपेटे औरत। जिसने शकील की अम्मी को धमाया।"

"मीरा—"

"मैं अकेली नहीं जाऊँगी," उसने कहा। "सानिया साथ आएगी। बच्चे हर जगह घुस जाते हैं, कोई नहीं पूछता।"

मैंने सानिया की तरफ़ देखा। वो पीछे खड़ी थी, और जैसे ही उसने मेरी नज़र पकड़ी, उसने सिर हिला दिया — जैसे कह रही हो, हाँ, मैं तैयार हूँ।

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