The Mysterious Bell – Chapter 1051
वो रुके।
"आज रात तुम्हें एक बार मिलेगा," उन्होंने कहा। "एक बार जो तुम्हें चाहिए, वो सब उठा लो। और उसके बाद अगर कल सुबह मुझसे कहा जाए कि सब कुछ ठीक है, तो सब कुछ ठीक है। मेरे पास कोई दरवाज़ा नहीं बचेगा। कोई हथियार नहीं बचेगा। सिर्फ़ तुम्हारी गवाही बचेगी।"
मैंने चाबी उठाई।
वो बहुत ठंडी थी। उतनी ठंडी, जितनी रात में लोहे की चीज़ें होती हैं।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"वो बूढ़ा, जो रिकॉर्ड कमरे के बाहर बैठा रहता है — वो कौन है?"
डॉक्टर इसरानी ने अपना चश्मा ठीक किया और बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।
"वो मेरे साथ यहाँ आया था," उन्होंने कहा। "चालीस साल पहले। मैं जब पहली बार इस अस्पताल में आया, तब रजिस्टर की और भी किसी की नज़र थी। उस आदमी का नाम मैं नहीं बताऊँगा। पर इतना बता दूँ — वो जो रोज़ बाहर बैठता है, वो नौकरी नहीं कर रहा। वो अपनी जगह पहरा दे रहा है।"
"किससे?"
"उसी चीज़ से," उन्होंने कहा, "जो उसने बनाई थी और जो अब उसके हाथ में नहीं है।"
मैंने चाबी अपनी जेब में रखी। घंटी भी वहीं थी। दोनों में सिर्फ़ कपड़े की एक परत थी, और मुझे लगा, जैसे दो लोहे की चीज़ें आपस में बात कर रही हों, बहुत धीमी आवाज़ में, जिसे सिर्फ़ मैं सुन सकता हूँ।
बाहर निकला तो मीरा गलियारे की खिड़की पर खड़ी थी, और शालिनी सीढ़ी के मोड़ पर। मैंने उन्हें इशारा किया।
"कितना वक़्त है?" मीरा ने पूछा।
"सुबह तक," मैंने कहा। "पर मुझे एक बार ही अंदर जाना है। और अंदर जाने के बाद जो कुछ निकलेगा, वो सब एक साथ बाहर आना चाहिए।"
"तो हम नज़र रखते हैं," शालिनी ने कहा। "जाओ।"
रिकॉर्ड कमरा नीचे की मंज़िल पर था, पीछे की तरफ़, दवा की खिड़की से दो कमरे आगे। बाहर की कुर्सी खाली थी, पर कुर्सी के पाए पर एक मैला सा रूमाल रखा था और फ़र्श पर एक टूटा चश्मा। जैसे बूढ़ा अपने पहरे से उठा हो, पर हथियार वहीं छोड़ गया हो।
ताला बड़ा था। पुराना। लोहे का।
मैंने चाबी डाली। चाबी पहले नहीं घूमी। मैंने ज़ोर लगाया, फिर छोड़ दिया। फिर अंदर से आवाज़ आई — जैसे किसी पुराने आदमी के जोड़ में कुछ चटकता हो — और चाबी घूम गई।
एक बार।
दरवाज़ा दबाकर खुला और मुझे पीछे से किसानों की पुरानी गंध आई। सील, फंगस, काग़ज़, धूल, और कहीं दूर से आती हुई किसी दवा की मीठी बदबू।
मैं अंदर गया, टॉर्च जलाई, दरवाज़ा अपने पीछे बंद नहीं किया — सिर्फ़ चौड़ा छोड़ दिया, ताकि गलियारे की रोशनी अंदर आती रहे। कमरा बड़ा था, पर भरा हुआ। चारों तरफ़ लोहे के रैक, और उन पर रजिस्टरों की ईंट जैसी तहें।
मैंने सबसे पहले वही देखा जो सबसे ऊपर रखा था — नई जिल्दों वाले रजिस्टर, ताज़ा काग़ज़, चमकदार रबर के बंधन। ये हाल के सालों के थे। इन्हें किसी ने सँभालकर रखा था। चालीस साल पुराने काग़ज़ों की धूल इन पर नहीं थी।
फिर नीचे, दूसरे रैक पर, एक अलग तरह की तह थी। हाथ से सिली हुई फाइलें, पुराने कपड़े की जिल्द, और उन पर नीली स्याही में लिखे नंबर, जो अब मिट रहे थे।
मैंने तीसरे रैक को छुआ तो पूरा रैक हिला। उसमें से एक फाइल गिरी और खुल गई।
काग़ज़ बाहर फैल गए।
और उनमें से, एक काग़ज़ ऐसा था जिसे देखकर मेरा हाथ वहीं रुक गया।
दवा वितरण की सूची। दो पन्नों की, मोटे काग़ज़ की, और उस काग़ज़ के ऊपर, दाहिनी तरफ़, एक नीली गोल मोहर — वही मोहर जो शकील के सफ़ेद लिफ़ाफ़े पर थी, वही मोहर जो पीले नोटिस पर थी, वही मोहर जो रणवीर की हर काग़ज़ी चीज़ पर लगती थी।
मोहर के नीचे दो लाइनें थीं, हाथ से लिखी। पहली लाइन में मरीज़ का नाम था। दूसरी लाइन में दवा का नाम। और फिर, नाम के ऊपर, एक सीधी काली लकीर। जिसने नाम को काट दिया था।
मैंने टॉर्च पास लाई।
नाम पढ़ा।
सलीमुद्दीन।
और उसके आगे, छोटे अक्षरों में, किसी ने लिखा था — सल्लू। यानी वही नाम जो सूची से आज सुबह काट दिया गया था, जिसकी दवा के दो पत्ते ही बचे थे, जिसका बेटा शकील आज मेरे पास से लौटकर अपने अब्बा के पास गया था।
पर यहाँ, इस काग़ज़ पर, यह नाम कल का नहीं था। स्याही पुरानी थी। काग़ज़ का कोना मुड़ा हुआ था। किसी ने पहले भी इसे काटा था, फिर मोहर लगाई, फिर दोबारा लिखा — और दोबारा लिखे हुए नाम पर भी लकीर थी।
और मोहर के नीचे, सबसे नीचे, एक और चीज़ थी। छोटी सी, तीन शब्दों की।
"सूची भेजी गई।"
तीन शब्द, जिनसे पता चलता था कि यह काग़ज़ यहाँ रुकने के लिए नहीं था। यह बाहर जाता था। किसी और कमरे में। जहाँ से दवा आती थी या जहाँ से दवा रुकती थी।
मैंने वो काग़ज़ अपने सीने से लगाया और फिर आगे बढ़ा।
अगली तह में पुरानी मरीज़ परचियाँ थीं। सैकड़ों। गड्डी में बँधी हुईं, डोरी से, जैसे कोई हिसाब का दिन खत्म करके बाँध देता हो। इनमें से कई पर नाम पढ़े नहीं जाते थे, कुछ पर तारीख़ें मिट गई थीं, कुछ पर सिर्फ़ अंगूठे के निशान बचे थे।
और फिर, सबसे नीचे की तह में, मुझे एक ऐसी फाइल मिली जिस पर कोई नाम नहीं लिखा था। सिर्फ़ ऊपर, किनारे पर, वही निशान खींचा था — दो लकीरें, बीच में एक बिंदु।
वही निशान।
मैंने फाइल खोली।
अंदर चार काग़ज़ थे। पहला — अस्पताल की ज़मीन का पुराना काग़ज़, फोटोकॉपी, जिस पर नीचे के कोने में एक इंसान का अंगूठा था। दूसरा — उसी ज़मीन का नया काग़ज़, जिस पर मोटी काली स्याही से कुछ जोड़ा गया था। तीसरा — एक छोटी परची, जिस पर सिर्फ़ दो शब्द थे: "नाम बदलेगा।" और चौथा — मेरे हाथ में आकर जैसे गरम हो गया — एक खाली काग़ज़, जिस पर सिर्फ़ एक जगह बनी थी।
अंगूठा लगाने की जगह।
खाली।
इंतज़ार करती हुई।
उसी वक़्त, बाहर से आवाज़ आई।
खाँसी।
बहुत पुरानी खाँसी, जिसे मैं बचपन से सुनता आया था। जो रात में उठकर आती थी और सुबह तक रुकती नहीं थी।
मेरे हाथ काँपने लगे। मेरे हाथ काँपने लगे और मैं उस खाली काग़ज़ को संभाल नहीं पाया — वो मेज़ पर गिरा, और मैं उसे उठाने के बजाय दरवाज़े की तरफ़ चला।
बाहर गलियारे में मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और तुरंत समझ गई।
"वो वार्ड की तरफ़ से आई," उसने धीरे कहा। "मैं तुम्हारे साथ चलूँ?"
"नहीं," मैंने कहा। "तुम यहाँ रहो। दरवाज़ा खुला है, कोई आए तो खाँस देना।"
मैं वार्ड की तरफ़ भागा।
वार्ड में बत्ती मंदी थी, सिर्फ़ दो रात की छोटी लाइटें जल रही थीं। कुछ बेड खाली थे, कुछ पर लोग सो रहे थे। माँ का बेड खिड़की के पास था, और उसके चारों तरफ़ सफ़ेद पर्दा डाला हुआ था।
पर्दे के बाहर, स्टूल पर, काजल बैठी थी और सो रही थी। उसका सिर स्टील की अलमारी से टिका था और नर्सिंग की मोटी किताब उसकी गोद में खुली पड़ी थी। उसके बगल में एक और स्टूल था, जिस पर शकील सो रहा था — तेरह-चौदह साल का दुबला लड़का, अपने दादा के साथ, जो उस बेड पर था जिस पर सिर्फ़ सफ़ेद चादर ओढ़ी हुई थी।
मैंने पर्दा धीरे से उठाया।
माँ ने पहले मेरी आवाज़ नहीं सुनी, मेरी चप्पल की आवाज़ सुनी। उन्होंने आँखें खोलीं, और मुझे देखकर पहले तो कुछ देर समझने की कोशिश की, फिर वो मुस्कुराईं। बीमार आदमी की मुस्कान, जिसमें ताक़त कम और प्यार बहुत होता है।
"तू अभी आया?" उनकी आवाज़ चटक रही थी। "काजल कह रही थी तू उस्ताद के साथ गया है।"
"लौट आया," मैं कहा। "तू कैसी है?"
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