The Mysterious Bell – Chapter 1023
मैंने अपनी आँखों से गली को देखा — शबनम, उस्ताद, दुबे अंकल, माँ, पापा, टिंकू, काजल, मीरा, भोला, सिपाही, चंद्रेश, भीड़।
सब वहीं थे।
कोई टूटता नहीं दिख रहा था।
पर घंटी कभी झूठ नहीं बोलती थी।
मैंने गहरी साँस ली और आगे बढ़ा — चबूतरी की तरफ़, माँ की तरफ़, पापा की तरफ़, थाने की तरफ़।
और मेरे अंदर एक आवाज़ थी, बहुत शांत, बहुत साफ़:
"अंकुश, आज रात तेरे हाथ में सिर्फ़ एक चीज़ है — तेरे हाथ। और तेरे साथ जो लोग खड़े हैं, वो तेरे पास हैं। जो टूटने वाला है, उसे पहले पहचान। क्योंकि अगर तू नहीं पहचानेगा, तो उसे तोड़ने वाला पहचान जाएगा।"
मैंने चबूतरी की तरफ़ आँखें उठाईं और मन में बोला —
"दिखा दे। कौन टूटने वाला है।"
और ठीक उसी पल, माँ ने अपना डिब्बा खोला।
॥
माँ ने डिब्बा खोला।
और मैंने साँस रोक ली।
डिब्बे में सबसे ऊपर एक मुड़ा हुआ पन्ना था — माँ की हिसाब की कॉपी का, जिसके कोने पीले पड़ चुके थे और किनारे उँगली से बार-बार दबाने से घिस गए थे। उसके नीचे एक लिफ़ाफ़ा था, जिस पर कोई नाम नहीं लिखा था, बस एक छोटी सी तारीख़ और उसके नीचे माँ की लिखाई में दो शब्द — "बचा हुआ।"
और उसके नीचे, सबसे नीचे, एक छोटी सी पीतल की कड़ी थी। जिस तरह की कड़ी बच्चों के हाथ में पहनाई जाती है, फिर कभी नहीं निकाली जाती। कड़ी पर एक फूल खुदा था — छोटा, मामूली सा, जिसे देखकर मुझे उस्ताद की दुकान की दराज़ याद आई।
माँ ने वो पन्ना उठाया और बिना कुछ कहे मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
मैंने लिया।
चबूतरी के नीचे लगी पीली रोशनी में उनकी लिखाई पढ़ी — काँपती, हड़बड़ाई, जैसे लिखते वक़्त हाथ नहीं, दिल लड़खड़ा रहा हो।
"पापा ने अंगूठा लगाया। मैं जानती थी। मैंने पूछा नहीं। मैंने बचाने के लिए चुपी चुनी। मेरी भी ग़लती है।"
नीचे तारीख़ थी। और तारीख़ के नीचे, उसी पन्ने पर, माँ ने एक और लाइन जोड़ी थी, बाद में, किसी और दिन, काले पेन से, ज़ोर से दबाकर —
"अब नहीं चुपूँगी।"
मेरे हाथ काँप रहे थे।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो चीज़ नहीं थी जो मैं ज़िंदगी भर देखता आया था — वो सहमी हुई, हर वक़्त कुछ छिपाती हुई, हर बात पर "कुछ नहीं हुआ" कह देने वाली चुप्पी। उनकी आँखें सूखी थीं। बिल्कुल सूखी। जैसे रोने का सारा पानी उन्होंने उन बाईस सालों में बहा दिया हो और अब सिर्फ़ साफ़ दिखने वाली चीज़ बची हो।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई।
"पहले पूरी भीड़ के सामने सुन ले," उन्होंने कहा।
और वो मुड़ीं।
माँ ने पूरी गली की तरफ़ मुँह किया — शबनम आपा, उस्ताद, दुबे अंकल, भोला, चंद्रेश, सिपाही, सब। चंद्रेश की आँखें सिकुड़ गईं।
"यह डिब्बा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ गली के हर कोने तक पहुँची, "…मैं सुबह से लिए घूम रही हूँ। इसमें मेरे बचाए हुए सात सौ इकहत्तर रुपये हैं। वकील के लिए। अंगूठा मिटाने के लिए। और एक पन्ना है — जिस पर मैंने अपनी ग़लती लिखी है।"
गली में सन्नाटा छा गया।
"मैंने बाईस साल चुप रहकर सोचा था कि मैं अपने घर को बचा रही हूँ।" उन्होंने कहा। "आज मुझे पता चला कि मैंने सिर्फ़ डर को खाना खिलाया।"
उन्होंने डिब्बा बंद किया और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"यह तेरे पास रहेगा," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो मैं बाईस साल नहीं बोल पाई, वो अब कोई और बोलेगा — और वो तू है।"
मैंने डिब्बा लिया। भारी था। सात सौ इकहत्तर रुपये का वज़न नहीं था उसमें। बाईस साल की चुप्पी का वज़न था।
चंद्रेश आगे आया।
"सुशीला जी," उसने मीठी आवाज़ में कहा, "यह सब भावुकता अच्छी लगती है, पर काग़ज़—"
"काग़ज़ कल सुबह दस बजे देख लूँगा," मैंने कहा, और उसकी बात काट दी। "आपने ही तो बुलाया है।"
चंद्रेश ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो उसके चेहरे से कभी नहीं उतरती, जैसे चिपकी हुई हो।
"हाँ," उसने कहा। "बुलाया है। और मैं तुम्हें याद दिला दूँ — काग़ज़ के साथ आना। बयान के साथ आना। और भोला का खाता तो सरकारी हिरासत में है, याद रखना।"
भोला ने सुना और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
चंद्रेश मुड़ा और सिपाहियों के साथ चला गया। उसके जाने के बाद गली में जो आवाज़ उठी, वो किसी एक की नहीं थी — वो पूरी गली की थी। बातें, सवाल, "ये क्या हो रहा है", "हम फँस गए", "अब क्या होगा"।
शबनम आपा ने अपनी चिमटी उठाई और चबूतरी के पत्थर पर ज़ोर से पटकी।
टन्।
सब चुप।
"अब सुनो," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो बारूद में होती है। "जो डर गया है, वो घर जाए और दरवाज़ा बंद करके बैठ जाए। पर याद रखे — वो दरवाज़ा भी किसी को सौंपना पड़ेगा। और जो नहीं डरा है, वो मेरी गुमटी पर आए। आज रात चाय मेरी तरफ़ से। और डाँट भी।"
मैं हँसा।
गली में पहली बार उस शाम कुछ हिला।
लोग हँसे नहीं, पर कंधे ढीले हुए। कुछ लोग गुमटी की तरफ़ चल पड़े। उस्ताद ने गले का फीता उतारकर जेब में रखा और दुकान का शटर आधा गिराया। दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा, धीरे से सिर हिलाया, और अपनी कुर्सी की तरफ़ लौट गए।
मीरा ने मेरा कंधा छुआ।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा। "माँ ने जो किया… वो आसान नहीं था।"
"जानता हूँ," मैंने कहा।
"और घंटी ने जो कहा—"
"जानता हूँ," मैंने दोहराया, और मेरी आवाज़ में वो तीखापन आ गया जो मुझे खुद पसंद नहीं।
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
रात ग्यारह बजे के आसपास गुमटी पर लोग जमा हुए। बहुत लोग नहीं — गिनती की लोग। शबनम आपा, उस्ताद, दुबे अंकल, भोला, माँ-पापा, काजल, टिंकू, मीरा, रज़िया — जो अब गुमटी के पीछे वाले कमरे में रहने लगी थी — और गली के चार-पाँच और लोग, जिनमें नसीमा बाई का बेटा साजिद और रमेश भाई थे।
शबनम आपा ने एक-एक को चाय पकड़ाई। खुद नहीं बैठी। खड़ी रही, हाथ में केतली, और हर किसी को देखती रही जैसे कोई माँ अपने बच्चों को स्कूल भेजने से पहले देखती है।
"एक बात साफ़ कर दूँ," उसने कहा, जब सबके हाथ में कप आ गए। "आज रात यहाँ कोई रोएगा नहीं। रोने से पेट नहीं भरता, और कल सुबह सात बजे मशीन आ रही है। जिसे रोना है, वो कल शाम को आए, जब काम हो जाए।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
"अब बताओ," उसने कहा। "क्या है जो हमारे पास है?"
"कुछ नहीं," रमेश भाई ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो हारे हुए आदमी की आवाज़ में होती है। "सब काग़ज़ उनके पास है। हमारे पास सिर्फ़ अंगूठे हैं, जो हमने खुद लगा दिए।"
"तो अंगूठे ही सही," उस्ताद ने कहा, और सबने उनकी तरफ़ देखा। वो अपनी लाठी पर झुके बैठे थे, और उनकी आवाज़ धीमी थी, जैसे पुरानी मशीन की टिक-टिक। "काग़ज़ उनका है। पर अंगूठा हमारा है। और जो अंगूठा अपनी मर्ज़ी से लगा है, वो कभी न कभी अपनी मर्ज़ी से कटेगा भी।"
"कब?" रमेश भाई ने पूछा।
"जब कोई उसे काटने की हिम्मत करे," उस्ताद ने कहा।
तभी दरवाज़े पर आहट हुई।
सबने देखा।
बबलू था। पर वो वाला बबलू नहीं जिसे मैं जानता था। न सोने की चेन, न पानदान, न पान। कमीज़ की जेब उलटी हुई थी, बाल बिखरे थे, और उसकी आँखें — उसकी आँखें लाल थीं। जैसे उसने रात भर रोया हो और फिर भी आँसू न सूखे हों।
वो दरवाज़े पर खड़ा रहा। अंदर नहीं आया।
"बबलू," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ सख़्त थी। "अंदर आ।"
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