The Mysterious Bell – Chapter 1009
"वहाँ," उन्होंने कहा। "उस मोड़ पर जहाँ से रास्ता पीछे के प्लॉट की तरफ़ जाता है। तीन दुकानें हैं, तीनों बंद। बीच वाली उसकी है।"
मैंने घंटी को जेब में रखा।
वो अब भी ठंडी थी, पर ठंडक बदल गई थी। पहले वो बर्फ जैसी थी, अब ऐसी थी जैसे बहुत दिनों से बंद पड़ी किसी कोठरी का दरवाज़ा खोला गया हो।
"मीरा," मैंने कहा।
"हाँ।"
"आज रात नौ बजे का हिसाब है।"
"हाँ।"
"पर उससे पहले," मैंने कहा, "हमें उस बंद दुकान पर जाना है।"
टिंकू ने अपना माइक उठाया।
"उस्ताद," उसने कहा, "आपको पता है ना कि हमारे पास बारह बजे से पहले तीसरी मंज़िल तक पहुँचना है, और उसके बाद कल सात बजे मशीन आनी है, और कल ग्यारह बजे दुकान सील होनी है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"पता है," मैंने कहा।
"तो फिर एक और चीज़ क्यों जोड़ रहे हो?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "घंटी सात साल पहले वाली बात कह रही है, और घंटी कभी बेकार बात नहीं करती। अगर वो कह रही है कि हिसाब सात साल पुराना है, तो इसका मतलब ये है कि रणवीर सिर्फ़ हमारी गली की ज़मीन नहीं ले रहा। वो उस आदमी का पूरा हिसाब मिटा रहा है — उसकी दुकान, उसका नाम, उसका सबूत। और जो उसने सात साल पहले शुरू किया था, वो आज हमारे सामने खत्म कर रहा है।"
शबनम आपा ने चिमटी उठाई और थाली पर रखी। ठक।
"तो फिर देर मत कर," उन्होंने कहा। "मैं तुम्हारे लिए रोटी रख देती हूँ। जो आदमी पुराना हिसाब खोलने जाए, वो भूखा नहीं जाता।"
मैंने घंटी को जेब में रखा और गली के उस मोड़ की तरफ़ देखा, जिधर मैंने कभी मुड़कर नहीं देखा था।
सुबह की धूप उस मोड़ पर पड़ रही थी, और वहाँ सच में तीन बंद दुकानें खड़ी थीं — सबके शटर गिरे हुए, सबके बोर्ड धूल से ढके, और बीच वाली दुकान के शटर पर एक काग़ज़ चिपका था जो हवा में हिल रहा था, जैसे कोई बहुत दिनों से हाथ हिला रहा हो और कोई देखने वाला न मिला हो।
॥
उस काग़ज़ तक पहुँचने में हमें बस चालीस कदम लगे। पर चालीस कदम में मेरी ज़िंदगी का वो हिस्सा बदल गया जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं था।
तीन दुकानें, एक के बगल में एक, सबके शटर गिरे हुए। बाईं तरफ़ वाली की चादर पर ज़ंग ने ऐसा रंग बना दिया था जैसे कोई पुराना नक्शा दीवार पर चिपका हो। दाईं तरफ़ वाली के ऊपर लोहे का टुकड़ा लटक रहा था, जिस पर कभी नाम लिखा होगा, अब सिर्फ़ चार छेद बचे थे। और बीच वाली — बीच वाली के शटर पर वो काग़ज़ चिपका था, जो हवा में हिल रहा था, जैसे कोई बहुत दिनों से हाथ हिला रहा हो और कोई देखने वाला न मिला हो।
मैंने काग़ज़ को उँगली से दबाया। काग़ज़ सूखा था, पर उसके नीचे का गोंद अब भी चिपचिपा था।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "इसे कोई हफ़्ते में चिपकाया है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि गोंद सूखकर पीला नहीं हुआ, अभी भी सफ़ेद है। गली में काग़ज़ चिपकाने वाले पहले उँगली से पोंछते हैं, फिर दबाते हैं। इसमें दबाने का निशान एक ही तरफ़ है — जल्दी में लगाया है।"
मीरा ने टिंकू को देखा, फिर मुझे।
"ये लड़का," उसने कहा, "अगर पढ़ाई में भी ऐसा होता तो…" और फिर वो खुद चुप हो गई, क्योंकि उसे याद आ गया कि टिंकू स्कूल छोड़ चुका है और यह बात किसी को भूलनी नहीं चाहिए।
काग़ज़ पर कुछ लिखा था। मैंने पढ़ा।
"दुकान खाली है। सामान के लिए संपर्क करें।"
नीचे एक फ़ोन नंबर था, उँगली जितना मोटा, जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो। और उसके नीचे — मैंने अपनी आँखें सिकोड़ीं — उसके नीचे एक छोटा निशान था, जिसका रंग औरों से अलग था। गाढ़ा नीला। दो लकीरें। और बीच में एक बिंदु।
मेरे हाथ में कुछ ठंडा हुआ।
"मीरा," मैंने कहा, "ये देखो।"
उसने झुककर देखा और सीधी होकर मेरी तरफ़ देखने लगी। उसके चेहरे पर वो भाव था जो तब आता है जब कोई काग़ज़ का टुकड़ा आपको बता दे कि आप जिस चीज़ को पुरानी मान रहे थे, वो उतनी पुरानी है ही नहीं।
"ये वही निशान है," उसने कहा।
"हाँ।"
"अंकुश, ये निशान दुकान खाली होने के काग़ज़ पर नहीं होना चाहिए।"
"मुझे पता है।"
टिंकू ने शटर के नीचे झाँका। शटर और ज़मीन के बीच उँगली भर की दरार थी, और उस दरार से अंदर धूल जमी चौकी दिख रही थी। चौकी के पीछे कुछ लकड़ी का था, जिस पर कपड़ा ढका था। और उस कपड़े के ऊपर — मुझे लगा — एक किताब पड़ी थी।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "अगर हम इस दरार को थोड़ा और बड़ा करें—"
"नहीं।"
"पर—"
"टिंकू, आज रात हमें उस भवन में जाना है, और अगर हम अभी इस शटर को छेड़ेंगे और किसी ने देख लिया, तो आज रात हम घर में बैठे होंगे और रजिस्टर उस तीसरी मंज़िल पर पड़ा हुआ होगा।"
वो चुप हो गया, पर उसकी आँखें शटर पर से हटी नहीं।
शबनम आपा पीछे खड़ी थीं। उन्होंने अपना हाथ दुपट्टे में पोंछा और धीरे से बोलीं, "सात साल पहले मैंने इस शटर को गिरते देखा था। उस दिन इस आदमी ने मुझसे उधार एक कटोरी चाय की भी वसूली कर ली थी। मैंने सोचा था बुरा आदमी है। अब लगता है, जल्दी में जाने वाला आदमी था।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो आदमी जानता है कि वो लौटकर नहीं आएगा," उन्होंने कहा, "वो अपना हिसाब साफ़ कर जाता है।"
मैंने आख़िरी बार काग़ज़ को देखा और मुड़ गया।
"चलो," मैंने कहा। "शाम को घर चलना है। आज रात के लिए तैयारी करनी है।"
टिंकू ने पूछा, "तैयारी कैसी?"
"ऐसी," मैंने कहा, "जैसी आज तक नहीं की।"
और यह सच था। क्योंकि अब तक जो भी काम मैंने किया था, वो गली में हुआ था, गली के लोगों के बीच, गली के नाम पर। आज पहली बार मुझे किसी के घर में घुसकर उसका हिसाब उठाना था। और उस काम के लिए घंटी काफ़ी नहीं थी। मुझे लोग चाहिए थे।
शाम छह बजे घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी थीं और काजल मेज़ पर किताब खोले बैठी थी, पर आँखें किताब में नहीं थीं।
मैंने जूते उतारे और पानी का गिलास उठाया।
"हाथ मुँह धो ले," माँ ने पीछे से कहा, बिना मुड़े।
"धो रहा हूँ।"
"नहीं धो रहा। मैं सुन रही हूँ, तेरी साँस अभी भी सड़क की है।"
मैंने नल खोला और सच में हाथ धोए। माँ की सुनने की ताक़त अजीब थी — वो चूल्हे के पास बैठकर भी जान जाती थीं कि मैंने नाक साफ़ की या जेब में हाथ डाला। बाईस साल से उन्होंने इस घर में सिर्फ़ आवाज़ें सुनी थीं, इसलिए उनकी सुनने की समझ किसी मशीन से ज़्यादा तेज़ हो गई थी।
मेज़ पर टिफ़िन रखा था। वही पुराना स्टील का टिफ़िन, जो मैं स्कूल के ज़माने में ले जाता था, जिसका ढक्कन ठीक से नहीं बैठता था और जिसे खोलने के लिए हर बार कोने पर चोट मारनी पड़ती थी।
"ये किसके लिए है?" मैंने पूछा।
माँ उठीं, कपड़े से हाथ पोंछे और मेरी तरफ़ आईं।
"तेरे लिए," उन्होंने कहा। "रोटी रखी है, दो सब्ज़ी वाली, दो सूखी। सूखी ऊपर रखी हैं, नीचे वाली जल्दी खराब नहीं होंगी। और अचार की पुड़िया उस छोटी जेब में है, उसी में चम्मच भी है।"
काजल ने किताब से सिर उठाया।
"अम्मी," उसने कहा, "ये स्कूल नहीं जा रहा।"
"मुझे पता है," माँ ने कहा। "पर जो बाहर जाता है, उसके हाथ में कुछ होना चाहिए। खाली हाथ निकलने वाले आदमी को रास्ता भी खाली मिलता है।"
मैंने टिफ़िन उठाया। वो भारी था। माँ ने पाँच रोटियाँ रखी थीं, और मैंने कभी नहीं सोचा था कि पाँच रोटियों का वज़न इतना लग सकता है।
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