The Mysterious Bell – Chapter 1008
"और तू?" मीरा ने कहा।
"मैं इस वक़्त क्या हूँ, तू खुद सोच," बबलू ने कहा। "मैं तुम्हारे साथ अंदर नहीं जाऊँगा। मैं बाहर रहूँगा। तुम लौट आए तो मैं तुम्हें गली तक छोड़ दूँगा। और अगर तुम नहीं लौटे—" वो रुका।
"तो?" मैंने कहा।
"तो मैं भी फँसा हुआ मान लूँगा," बबलू ने कहा। "क्योंकि साहब को पता चल जाएगा कि रास्ता किसने बताया। और साहब उस नल पर पानी पीने नहीं जाता।"
मीरा ने अपनी कलम रख दी और सीधी होकर बैठ गई।
"मुझे एक बात साफ़ करनी है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सपाटपन था जो मैं अब पहचान गया हूँ — वो सपाटपन जो तब आता है जब मीरा अपनी ही बात को खुद मानने को तैयार नहीं होती। "बबलू, तू बाईस साल उस आदमी के साथ रहा है। तूने अपने हाथ से उसके काग़ज़ बाँटे हैं। तूने मेरी दुकान वाली बाई का अंगूठा लिया है, तूने भोला भाई को कोरा काग़ज़ थमाया है, तूने उसे बारह हज़ार रुपये दिए हैं। तूने मेरी गली के चार लोगों से बिना पढ़े अंगूठा लिया है।" वो रुकी। "और अब तू आकर कहता है कि तेरी जान खतरे में है और तू हमारी मदद करना चाहता है। तू मुझे एक वजह दे कि मैं तुझ पर भरोसा क्यों करूँ।"
बबलू ने कुछ नहीं कहा।
"कोई वजह है?" मीरा ने पूछा।
"नहीं," बबलू ने कहा।
"तो फिर—"
"तो फिर मेरे पास कोई वजह नहीं है," बबलू ने कहा। "पर तेरे पास एक रास्ता है, जो मैंने दिया। और तेरे पास एक गली है, जो बचानी है। तू इन दोनों में से कोई वजह पसंद कर ले।"
शबनम आपा ने चिमटी उठाई और कुछ कहने ही वाली थीं कि मैंने हाथ उठाया।
"रुको," मैंने कहा।
सब मेरी तरफ़ देखने लगे।
मैंने घंटी को अपनी हथेली में लिया। वो ठंडी थी, पर इतनी नहीं जितनी कल रात थी। फिर मैंने बबलू की आँखों में देखा, और मुझे वो चीज़ दिखी जो मैंने पहले किसी की आँखों में नहीं देखी थी। आदमी डर रहा था, और डरते वक़्त उसकी आँखें बचने का रास्ता ढूँढ रही थीं। पर उसकी आँखों में बचने का रास्ता नहीं था। उसकी आँखों में सिर्फ़ मुझे रास्ता देना था।
"अंकुश," मीरा ने कहा, "तू सोच समझकर बोल।"
"मैं सोच ही रहा हूँ," मैंने कहा।
"ये वही आदमी है जिसने तेरी दुकान की जगह पर ठेका लिया—"
"नहीं," मैंने कहा। "ये वही आदमी है जिसने तेरी दुकान पर कभी ताला नहीं लगवाया, जब लगवा सकता था।"
मीरा चुप हो गई।
मैंने बबलू की तरफ़ देखा।
"बबलू," मैंने कहा, "आज मुझे तुझ पर भरोसा करना है।"
बबलू का चेहरा बदला।
"पर ये भरोसा मुफ़्त नहीं है," मैंने कहा। "अगर तूने हमें गलत रास्ता दिया, तो जो कुछ होगा, उसका हिसाब भगवान नहीं, ये गली माँगेगी। और ये गली तेरे साहब से ज़्यादा देर तक याद रखती है।"
बबलू ने एक लंबी साँस ली, जैसे बहुत दिनों बाद मुँह से पान निकाला हो।
"समझ गया," उसने कहा।
फिर उसने अपनी कमीज़ की अंदरूनी जेब से एक चीज़ निकाली और मेज़ पर रख दी।
वो एक पुराना पहचान कार्ड था।
प्लास्टिक की परत किनारों से उखड़ी हुई थी, और उसके भीतर काग़ज़ पीला हो चुका था। कार्ड पर एक फोटो थी — बबलू, कम से कम बाईस साल छोटा, दुबला, बिना सोने की चेन, किसी दफ़्तर की सफ़ेद कमीज़ में। नीचे नाम लिखा था — बबलू पांडे। और उसके नीचे कंपनी का नाम — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।
टिंकू ने कार्ड उठाकर उलटकर देखा।
"इसके पीछे कुछ लिखा है," उसने कहा।
बबलू ने हाथ बढ़ाया और कार्ड उससे ले लिया।
"ये रहने दो," उसने कहा। "ये तुम्हारे काम का नहीं।"
"तो फिर मेज़ पर क्यों रखा?" टिंकू ने कहा।
बबलू कुछ देर उसे देखता रहा। फिर उसने कार्ड उठाया और अपनी कमीज़ की जेब में रख लिया।
"ज़रूरत पड़ेगी," उसने कहा।
"कब?"
"जब गार्ड तुम्हें रोके," बबलू ने कहा, "तो एक ही चीज़ काम आएगी। वो कार्ड। उस पर पुरानी कंपनी का नाम है और मेरा चेहरा है। तुम उसे दिखा देना और कह देना कि तुम कपड़ों का डिब्बा उतारने आए हो।"
"और तू खुद क्यों नहीं दिखाता?" मीरा ने कहा।
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा।
"क्योंकि मैं चेहरे से पहचाना जाता हूँ," उसने कहा। "और ये कार्ड मेरा पुराना चेहरा है। जो मुझे आज नहीं पहचानेगा।"
फिर वो उठा। बेंच से उठते वक़्त उसका हाथ मेज़ पर टिका और मेज़ हिल गई। उसने चाय का पूरा कटोरा खत्म किया और थैली अपनी जेब में ठूँसी।
"नौ बजे," उसने कहा। "आठ बजकर पचास मिनट पर तुम लोग पिछली गली में होना। सात मिनट बाद लौट आना।"
"अगर हम नहीं लौटे?" मैंने कहा।
"तो मैं भी फँस जाऊँगा," बबलू ने कहा, और चल दिया।
वो गली के मोड़ पर मुड़ा, एक बार रुका, जैसे कुछ कहने की सोच रहा हो, फिर चला गया।
और उसके जाते ही मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।
इतनी ठंडी कि मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी जेब में बर्फ का टुकड़ा रख दिया हो। मैंने हाथ जेब में डाला और घंटी निकाली। वो मेरी हथेली पर रखी थी, और उसका पीतल पहले से गहरा दिख रहा था, जैसे वो कोई बात पी रही हो।
मीरा ने देखा।
"क्या हुआ?"
"घंटी," मैंने कहा।
टिंकू ने मेरे हाथ के पास आकर देखा।
"बजी नहीं," उसने कहा।
"नहीं बजी," मैंने कहा। "पर बोलेगी।"
और तभी वो बोली।
पहले बहुत हल्की, जैसे किसी बूढ़े आदमी ने नींद में कुछ कहा हो। फिर साफ़, छोटे-छोटे शब्दों में, पहले जैसी रूखी आवाज़ में — न कोई नरमी, न कोई हमदर्दी।
"सात मिनट नहीं," घंटी ने कहा।
मैंने घंटी को कसकर पकड़ा।
"फिर क्या?" मैंने कहा।
"सात साल पुराना हिसाब।"
शबनम आपा ने चिमटी नीचे रख दी।
टिंकू ने अपना माइक धीरे से बेंच पर रख दिया, जैसे उसकी आवाज़ कहीं घंटी को न छू जाए।
मीरा ने अपनी कलम उठाई और डायरी में कुछ लिखा, पर उसकी कलम की नोक काग़ज़ पर रुक-रुककर चल रही थी।
"अंकुश," उसने कहा, "बबलू ने कहा कि वो बाईस साल से उसके साथ है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो सात साल कहाँ से आए?"
मैंने घंटी को रोशनी में उठाया। सुबह की धूप उस पर पड़ी और उसका पीतल चमका, और मुझे उस चमक में बहुत दूर का कोई चेहरा दिखा — न किसी का नाम, न किसी की आँखें, बस एक आदमी जो किसी दरवाज़े पर खड़ा है और अपनी जेब टटोल रहा है।
मैंने घंटी नीचे की और शबनम आपा की तरफ़ देखा।
"आपा," मैंने कहा, "सात साल पहले इस गली में क्या हुआ था?"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो तब आता है जब कोई पुरानी चीज़ अचानक सामने आ जाए और उसने उसे तीन साल से न देखा हो।
"सात साल पहले?" उन्होंने कहा।
"हाँ।"
उन्होंने गुमटी के भीतर देखा, जैसे वहाँ किसी से पूछ रही हों। फिर उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया और बेंच के किनारे बैठ गईं।
"सात साल पहले," उन्होंने कहा, "इस गली में एक आदमी रहता था जिसका नाम मुझे याद नहीं। वो चश्मे वाला था और साइकिलों के पुर्ज़े बेचता था। एक दिन वो अपनी दुकान बंद करके चला गया। लोगों ने कहा कि कर्ज़ था। लोगों ने यह भी कहा कि वो रणवीर भारद्वाज के यहाँ कुछ काग़ज़ लेकर गया था और लौटा नहीं।"
"और उसके बाद?"
"उसके बाद," शबनम आपा ने कहा, "उसकी दुकान पर ताला लगा और ताला आज तक लगा है।"
टिंकू ने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ उठाकर रोक दिया।
"वो दुकान कहाँ है?" मैंने पूछा।
शबनम आपा ने अपनी उँगली उठाई और गली की तरफ़ इशारा किया — उस तरफ़ नहीं जहाँ मेरी दुकान थी, बल्कि उसके उलटी तरफ़, जहाँ कभी मैंने गौर नहीं किया था।
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