The Mysterious Bell100 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 100

7 min read November 5, 2026

चिंटू सबसे नीचे। उसके ऊपर रफ़ीक़। उसके ऊपर गुड्डू। और सबसे ऊपर सानिया, जिसकी लाल कवर कॉपी उसके हाथ में थी और आँखों में ऐसी चमक कि लगा किसी ने उसे ताज पहना दिया हो।

"उस्ताद!" सानिया ने कहा। "शबनम आपा ने बुलाया है। कह रही हैं चाय ठंडी हो रही है और आपका चेहरा देखना है।"

उस्ताद ने बच्चों को देखा। फिर मुझे देखा।

"जा," उन्होंने कहा। "चाय पी। और बच्चों को अपने साथ रख। आज के बाद ये तेरे हाथ हैं।"

मैं बाहर निकला।

गली में दोपहर अब भी तेज़ थी। पीपल की छाया उस वक़्त थोड़ी दूर चली गई थी, जैसे कोई चादर समेट रहा हो।

शबनम आपा की गुमटी पर भाप उठ रही थी।

और शबनम आपा खुद चिमटी हाथ में लिए खड़ी थीं, आँखें सिकुड़ी हुईं — वो चेहरा, जो कहता है कि हालत ठीक नहीं है लेकिन मैं अभी पूछने वाली नहीं।

"आ," उन्होंने कहा। "बैठ। चारों को भी बैठा।"

मैं बैठा। बच्चे मेरे आसपास। चिंटू ने मेरा घुटना छुआ और फिर हाथ खींच लिया, जैसे माफ़ी माँग रहा हो।

"अंकुश," शबनम आपा ने कहा, "काजल आज सुबह यहाँ से गुज़री थी। उसकी आँखें लाल थीं। रोई हुई। मुझसे बोली कुछ नहीं, पर मैं अंधी नहीं हूँ।"

मैंने चाय का गिलास उठाया। एक घूँट लिया। जल गया, पर कुछ नहीं बोला।

"माँ का सच है," मैंने कहा। "घर में।"

शबनम आपा के हाथ में चिमटी रुकी।

"तो तुम सब चबूतरी पर क्या कर रहे थे? मंज़ूर और बसंत का झगड़ा? उस बुड्ढे कटोरे का?"

"कटोरा अब जुड़ गया।"

"हूँ।"

"आपा," मैंने कहा, "आपने कभी सोचा कि ये गली इतनी जल्दी क्यों भर जाती है? जब कुछ होता है, तो सब पहले से वहाँ क्यों होते हैं?"

"क्योंकि कोई काम नहीं है," उन्होंने कहा। "जब कोई काम नहीं होता, तो आदमी की सबसे बड़ी नौकरी पड़ोसी की खबर हो जाती है।"

"तो अब काम है," मैंने कहा।

मैंने सानिया की लाल कवर कॉपी उठाई। उसमें छह ट्रक, पीली पट्टी, अस्पताल की दीवार के पास गड्ढा, रात आठ बजे की सफ़ेद गाड़ी — सब लिखा था। सानिया की लिखाई टेढ़ी थी, पर साफ़। जैसे उसने हर अक्षर सोच-सोचकर लिखा हो।

"चारों," मैंने कहा।

चारों सीधे हो गए।

"आज मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। पहली बार। सच में।"

सानिया की आँखें भड़कीं।

"क्या करना है?"

"मुझे पीपल के नीचे देखना है। नबी चाचा और श्यामलाल काका। दोनों आज सुबह से वहाँ हैं। दोनों ने एक-दूसरे को नहीं देखा। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ पीठ करके चबूतरी पर जगह ली है। और मुझे लगता है, ये बात पचास साल पुरानी है।"

शबनम आपा ने चिमटी नीचे रखी।

"नबी और श्यामलाल?" उन्होंने कहा। "मैंने उन्हें बीस साल से ऐसे ही देखा है। मुझे लगा हमेशा से ऐसे ही रहे होंगे।"

"नहीं, आपा," सानिया ने कहा। "मेरी दादी कहती थीं। वो दोनों कभी एक साथ ठेला चलाते थे। सुबह से रात तक। एक ही ठेले पर चाय और बिस्किट। और फिर एक दिन ठेला बंद हो गया। दादी कहती थीं — उस दिन के बाद दोनों ने एक-दूसरे को देखना बंद कर दिया।"

"क्यों?" मैंने पूछा।

"दादी को भी नहीं पता था," सानिया ने कहा। "बस इतना कहती थीं कि एक डिब्बा गायब हो गया था।"

"डिब्बा?"

"पैसों का डिब्बा।"

मैं थोड़ा आगे झुका।

तुम सोच रहे होगे कि एक डिब्बे का क्या है — औरत दादी के ज़ुबान से निकली बात, साठ साल पुरानी। पर सुनो, गली में डिब्बे सिर्फ़ पैसे नहीं रखते। डिब्बे झगड़े भी रखते हैं। और जो डिब्बा चोरी हो, वो ताउम्र चोरी नहीं रहता, वो ताउम्र एक सवाल बन जाता है। और सवाल जिसके सिर पर टिक जाए, उसका जीना मुश्किल हो जाता है।

"गुड्डू," मैंने कहा।

गुड्डू सीधा बैठ गया, जैसे स्कूल में उस्ताद ने नाम पुकारा हो।

"तू उनके सबसे नज़दीक बैठता है। कल क्या हुआ था?"

"कल कुछ नहीं," गुड्डू ने कहा। "आज सुबह हुआ। श्यामलाल काका आए और बैठते हुए बोले — ये चबूतरी ठंडी है। और नबी चाचा ने कहा — ठंडी नहीं है, तुम्हारी नज़र में ठंडी है।"

"फिर?"

"फिर दोनों चुप हो गए। दो घंटे। मैंने गिना।"

"रफ़ीक़?"

"बाद में नबी चाचा ने अपनी तस्बीह उठाई और तस्बीह की एक गोली चबूतरी पर गिर गई, वो मेरे पास आई। मैंने उन्हें देने के लिए उठाया, तो श्यामलाल काका ने कहा — रख दे वहीं, वो अपनी चीज़ें खुद उठाते हैं। और नबी चाचा ने सुना और कुछ नहीं बोले।"

"चिंटू?"

चिंटू सबसे छोटा है। उसने उत्साह से कहा, "मैंने एक बात देखी!"

"बता।"

"श्यामलाल काका की छड़ी का नीचे वाला रबर घिसा हुआ है। और जब वो उठे, तो उन्होंने छड़ी नबी चाचा की तरफ़ रखी — नहीं, मतलब, ज़मीन पर। और नबी चाचा ने छड़ी उठाकर अपनी तरफ़ रख दी, जैसे कहीं गिर न जाए। दोनों ने एक-दूसरे को नहीं देखा। पर दोनों को पता था।"

मैंने चारों को देखा।

शबनम आपा ने चाय के चार और गिलास रखे। कोई नहीं बोला।

"तो सुनो," मैंने कहा। "मुझे तुम चारों से एक काम चाहिए। आज शाम तक नबी चाचा के घर के पास जाना है और पता करना है कि उनका कोई बेटा, भतीजा, कोई जो उस वक़्त का हो, क्या कहता है। पूछना ऐसे — जैसे बच्चे पूछते हैं। बड़ों की तरह मत पूछना।"

"मैं पूछता हूँ," सानिया ने कहा।

"और सुबह आठ बजे गुमटी पर मिलना। नौ नहीं। आठ। अपनी कॉपी लाना। जो कोई भी बोले, लिखना। जो कोई भी कुछ छुपाए, वो भी लिखना।"

चारों उठ गए, जैसे कोई सेना हो।

शबनम आपा ने उनके पीछे देखा और फिर मेरी तरफ़ आईं।

"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा। "ये गली का काम है। तू इसमें बच्चों को क्यों ला रहा है?"

"क्योंकि आपा," मैंने कहा, "आज सुबह मुझे पता चला कि मैं अकेले कुछ नहीं कर सकता। और मुझे इसका आदी होना पड़ेगा। जल्दी।"

शबनम आपा मेरी तरफ़ देखती रहीं।

"तू बदल रहा है," उन्होंने कहा। "पर सुन। बदलना अच्छा है, बस उतना ही बदलना जितना संभाल सके।"

मैं गुमटी से उठा और पीपल के नीचे चला।

मंज़ूर चाचा और बसंत काका जा चुके थे। अब चबूतरी पर दो लोग बैठे थे — एक सिरा, एक आदमी, सफ़ेद टोपी, पीली तस्बीह, होंठ हिलते हुए; दूसरा सिरा, दूसरा आदमी, गमछा, छड़ी, आँखें बंद।

और बीच में, दोनों के बीच, चबूतरी का वो हिस्सा खाली था जो सबसे ज़्यादा बोल रहा था।

मैं उनके बीच नहीं बैठा।

मैं पीपल के तने के पास जाकर खड़ा हो गया। हाथ जेब में। घंटी छू रहा था।

"नबी चाचा," मैंने कहा।

नबी चाचा ने तस्बीह पर अंगूठा रोका। फिर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धुँधली थीं, पर तेज़।

"बोल बेटे।"

"मुझे आपसे एक बात पूछनी है। और अगर आप बुरा मानें, तो अभी माफ़ी।"

"पूछ।"

"आपने श्यामलाल काका से आख़िरी बार कब बात की थी?"

चबूतरी पर चुप्पी पसर गई।

श्यामलाल काका की आँखें खुलीं। वो मेरी तरफ़ नहीं देखा। पीपल की जड़ की तरफ़ देखता रहा।

"बेटे," नबी चाचा ने कहा, "तू वो सवाल पूछ रहा है जो इस चबूतरी पर पचास साल से बैठा है और किसी ने नहीं पूछा।"

"तो आज पूछ लीजिए।"

"क्या पूछूँ?"

"मैं नहीं जानता। पर आप जानते हैं। और वो भी जानते हैं।" मैंने श्यामलाल काका की तरफ़ देखा। "काका?"

श्यामलाल काका ने छड़ी को हाथ में घुमाया।

"बच्चा है," उन्होंने कहा। "जाने दे।"

"मैं बच्चा नहीं हूँ, काका," मैंने कहा। "मैं चौबीस साल का हूँ। और मैं तीन दिन से उसी चीज़ पर चल रहा हूँ जिसके बारे में चबूतरी पर बैठे आदमी पचास साल से चुप हैं।"

मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।

"अब सुनिए। मैं आपको अभी कुछ बताता हूँ, और ये मेरी गवाही है। आज से तीन दिन पहले, इसी चबूतरी पर, बंसी बाबा और रहमत बाबा ने एक फ्रेम का टुकड़ा मिलाकर एक तस्वीर जोड़ी। वो तस्वीर चालीस साल पहले टूटी थी। उस दिन दोनों ने अपनी चुप्पी को पचास साल पुरानी कर दिया और अब दोनों गले मिल चुके हैं।"

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