Spirit of a Fighter – Chapter 998
वो हमें देखकर मुस्कुराई। और उसकी मुस्कान में वो मिठास थी जो भैरव की आवाज़ में थी — पर उससे कहीं ज़्यादा पुरानी।
"आ गए," उसने कहा। "मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी, वीर सिंह।"
मैं रुका। मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी ठंडी थी। "तुम कौन हो?"
उसने शीशी खोली और उसे सूँघा। "मैं वो हूँ जिसका नाम भवानी अपनी डायरी में नहीं लिख सका। मैं तीसरी हूँ। और तुम्हारे पापा ने मुझे ये शीशी दी थी — उस रात, जब वो मरने वाले थे।"
मीरा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा।
"और उस शीशी में क्या है?" मैंने पूछा।
तीसरी बहन ने शीशी उठाई और उसे सूरज की रोशनी में दिखाया। शीशी के अंदर कुछ नहीं था। बिलकुल खाली।
"इसमें कुछ नहीं है," उसने कहा। "क्योंकि असली चीज़ शीशी में नहीं, उस आदमी के दिल में है जो इसे खोलता है। और वो आदमी तुम हो, वीर सिंह। तुम्हारे पापा ने कहा था — 'जिस दिन मेरा बेटा इस खाली शीशी को देखकर भी सच बोलेगा, उस दिन ठाकुर का राज़ खत्म हो जाएगा।'"
मैंने शीशी ली। वो ठंडी थी, और उसके काँच पर उँगलियों के निशान थे — पुराने, बहुत पुराने।
"तो अब," तीसरी बहन ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कोई कड़वाहट आई, "अंदर चलो। ठाकुर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। और वो तुम्हें वो देना चाहता है जो तुमने कभी माँगा नहीं — तुम्हारे पापा की असली मौत का सच।"
वो उठी और हवेली का दरवाज़ा खोल दिया। अंदर अंधेरा था, और उस अंधेरे में से एक जानी-पहचानी गंध आई — बादाम का तेल और कोयला।
हरनाम ने मेरे कान में धीरे से कहा, "वीर सिंह, ये फ़ाइल मेरे पास है। अगर अंदर कुछ हो जाए, तो ये फ़ाइल किसी को दे देना। पर…"
"पर क्या?"
हरनाम का हाथ काँप रहा था। "पर अगर ये काग़ज़ अंदर गया, तो पहले मेरा बेटा मरेगा। ठाकुर ने कहा है — अंदर आने वाले हर आदमी के साथ एक शर्त है। और मेरी शर्त मेरा गोलू है।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "तो हम अंदर जाएँगे, पर शर्तों के साथ नहीं। अपनी शर्तों के साथ।"
और हम हवेली के अंधेरे में घुसे। सामने, दूर एक कुर्सी पर, एक आदमी बैठा था। उसके हाथ में एक गिलास था जिसमें हल्दी घुली थी। और उसने हमें देखकर धीरे से कहा —
"आ जाओ, भवानी के बेटे। मैं तुम्हारी माँ के हाथ की चाय बनवा रखी है। पर एक बात है — इस चाय में ज़हर नहीं है। क्योंकि ज़हर अब तुम्हारे हाथ में है, मेरी खाली शीशी में। और मैं देखना चाहता हूँ कि तुम उसे कैसे इस्तेमाल करते हो।"
॥
वो चाय की भाप मेरे चेहरे पर पड़ रही थी, और उसमें हल्दी की महक के साथ-साथ एक और गंध थी — पुरानी लकड़ी की, बंद कमरे की, बीस साल से खुली न मिली हवा की।
"बैठो," ठाकुर ने कहा, और उसकी उँगली गिलास के किनारे पर धीरे-धीरे घूम रही थी। "सबको बैठाओ। हरनाम को भी। ख़ासकर हरनाम को।"
हरनाम मेरे पीछे खड़ा था और उसका हाथ मेरे कंधे पर था। मैंने उसका हाथ महसूस किया — ठंडा, पसीने से भीगा। उसकी साँस रुक-रुक कर चल रही थी।
"नहीं," मैंने कहा। "पहले बात।"
ठाकुर मुस्कुराया। उसकी मूँछों के सिरे सफ़ेद थे, पर आँखों में वो ठंडक थी जो मैंने भैरव की आँखों में देखी थी। लालटेन की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी और उसका एक आधा चेहरा अंधेरे में था। बगिया की हवेली की छत ऊँची थी और कमरे में धूल की परत जमी थी — जैसे यहाँ कोई दस-बारह साल से नहीं आया।
"बात?" उसने गिलास नीचे रखा। "मैंने तुम्हें बात करने के लिए बुलाया ही नहीं था, वीर सिंह। मैंने तुम्हें सौदा करने बुलाया था।"
"मुझे सौदा नहीं चाहिए।"
"तो फिर तुम्हारी माँ की लाश का इंतज़ाम कर लो।"
टिंकू ने मेरे बगल में एक कदम आगे रखा। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
ठाकुर ने कुर्सी पर पीछे झुककर हम सबको देखा। उसकी नज़र हरनाम पर अटकी और फिर वो बोला, "हरनाम, तू आज बहुत हिम्मत वाला हो गया है। ये काग़ज़ लेकर चलता फिरता है। मैंने तुझे बोला था न — तेरा गोलू कहाँ है, याद है न?"
हरनाम का हाथ मेरे कंधे से खिसक गया। वो नीचे बैठ गया — सीधा ज़मीन पर, जैसे उसके पैरों ने साथ छोड़ दिया हो।
"मेरा बेटा," वो बोला, और उसकी आवाज़ फट गई। "मेरा बेटा स्कूल में है। तुमने उसे बंधक बना रखा है। वो अभी बच्चा है, ठाकुर साहब। वो क्या जानता है?"
"वो अपने बाप से ज़्यादा सयाना है," ठाकुर ने कहा। "मेरे आदमी ने बोला — गोलू ने उसे देखते ही पहचान लिया था। बोला था, 'मेरे पापा तुम्हें हरा देंगे।' बड़ी हिम्मत है तेरे बेटे में।"
हरनाम की आँखें भर आईं। वो घुटनों के बल मेरी तरफ़ घूमा और उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।
"वीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी की जान जा रही हो। "मैं जानता हूँ तू मेरे ऊपर भरोसा नहीं करता। मैंने तेरे पापा के साथ बीस साल तक काग़ज़ों में झूठ लिखा। मैंने हर मौत को बीमारी बनाकर किताब में डाला। मैं जानता हूँ मैं गुनहगार हूँ। पर मेरा गोलू — वो मेरे गुनाहों का हिस्सेदार नहीं है।"
"उठो," मैंने कहा।
"नहीं उठूँगा।" उसने हाथ और ऊँचे कर लिए, और उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। "जब तक तू कह न दे कि तू मेरे बेटे को बचाएगा, मैं नहीं उठूँगा।"
कमरे में चुप्पी छा गई। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। टिंकू ने अपनी डिब्बी अपने सीने से चिपका ली, जैसे उसमें उसकी जान रखी हो।
"तू मेरे पैरों पर मत आ," मैंने धीरे से कहा। "मेरे पापा मरे, तब तेरे हाथ पर उनका ख़ून नहीं था। तेरे हाथ पर सिर्फ़ स्याही थी। और स्याही का हिसाब ख़ून से नहीं चुकाया जाता — कलम से चुकाया जाता है। तेरे पास वो फ़ाइल है। उस फ़ाइल से तू अपना हिसाब चुका।"
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों से पानी बह रहा था और उसकी नाक लाल थी।
"उठ," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो कोर्ट में बहस करते वक़्त आती है। "उठो और बताओ — गोलू कहाँ है? स्कूल में किस कमरे में? कितने आदमी हैं? हथियार हैं? कुछ तो बताओ, वरना वीर सिंह क्या करेगा — आँख बंद करके स्कूल की दीवार चढ़ जाएगा?"
हरनाम उठा। उसने आँचल से मुँह पोंछा और फिर बोला, "स्कूल के पीछे जो पुराना हॉस्टल है — जहाँ गोलू पहले था — उसके नीचे एक कोठरी है। वहाँ भंडार रखा जाता था। वहाँ कोई नहीं जाता। ठाकुर के दो आदमी हैं वहाँ — एक मोटा, जिसकी उँगली कटी है, और एक लंगड़ा।"
"लंगड़ा शेराज़?" मैंने पूछा।
"नहीं। शेराज़ तो कल पकड़ा गया। दूसरा है — बड़ा काला, जिसके दाँत टूटे हैं। वो लंगड़ाता है, पर शेराज़ नहीं है। ठाकुर का पुराना नौकर है।"
मैंने हवा में सूँघा। हरनाम के कपड़ों से गंध आ रही थी — उसकी पुरानी स्याही और मसाले की गंध तो थी ही, पर उसके कंधे पर एक और गंध चिपकी थी। कपूर। हल्का-सा, पुराना कपूर। और उसके कॉलर पर बादाम के तेल का ज़रा-सा दाग था, जो सूखकर पीला हो गया था।
"तू कल रात सिर्फ़ हवेली में नहीं था," मैंने कहा।
हरनाम चौंका। "क्या?"
"तेरे कपड़ों पर कपूर है। और बादाम का तेल। ये गंध उसी आदमी की है जो तेरे घर आया था। पिछली रात। सोने से पहले।"
हरनाम का चेहरा उतर गया। उसने अपने कॉलर को उँगली से पकड़कर देखा, जैसे वो पहली बार उसे देख रहा हो।
"वो… वो मेरे घर आया था," उसने धीरे से कहा। "रात को, जब मैं सोने जा रहा था। दरवाज़े पर खड़ा था। बोला — 'ठाकुर साहब ने सलाम कहा है।' और एक पुड़िया दी — कहा, इसे अपनी अलमारी में रखना, और कल अखाड़े में होशियार रहना।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno