Spirit of a Fighter – Chapter 98
रास्ते में टिंकू ने धीरे से कहा, "भाई, अगर कॉपी मिल गई, तो कल पंचायत में…"
"तो कल भैरव को खुद अपने सच का सामना करना पड़ेगा," मैंने कहा।
"और अगर नहीं मिली?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो हमेशा वाली मुस्कान नहीं थी। आज डर था।
"तो भी हम जाएँगे," मैंने कहा। "क्योंकि माँ को अकेले नहीं जाने दूँगा।"
टिंकू ने सिर हिलाया। फिर उसने अपनी टोपी पहनी, जो कल फटी थी, और आगे बढ़ गया।
हरनाम का दफ़्तार अखाड़े से सटा था, छोटा सा कमरा जिसमें फ़ाइलों की ऊँची ढेरियाँ थीं। हम पीछे से गए। चंदन ने ईंट उठाई। नीचे चाबी थी — ज़ंग लगी, पर चल रही थी।
दरवाज़ा खुला।
अंदर अंधेरा था। मैंने अपनी लालटेन जलाई, जो मैंने रास्ते में उठाई थी। रोशनी में फ़ाइलें दिखीं, काग़ज़, और एक लोहे का संदूक।
चंदन ने संदूक की तरफ़ इशारा किया।
"वही है।"
मैंने चाबी डाली और घुमाई। संदूक खुला। अंदर सिर्फ़ एक चीज़ थी — हरी कवर वाली कॉपी।
मैंने उसे उठाया। उसका वज़न भारी था। जैसे बीस साल का सच भारी होता है।
मैंने पन्ने पलटे। पहला पन्ना। दूसरा। तीसरा।
हर पन्ने पर नाम थे। तारीख़ें थीं। पैसे का हिसाब था। और नीचे, एक लाइन में, हर नाम के आगे एक आदमी का नाम लिखा था — भैरव सिंह।
और फिर मैं एक पन्ने पर रुका।
उस पन्ने पर मेरे पापा का नाम था — रघुवीर।
और उसके नीचे लिखा था — "बीस हज़ार। दिया गया।"
मेरी आँखें जलीं। मैंने पन्ना पलटा।
अगले पन्ने पर एक और नाम था — जगदीश। मेरे गोद लेने वाले पापा।
और उसके नीचे — "पंद्रह हज़ार। दिया गया।"
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने कॉपी बंद की और उसे सीने से लगाया।
"भाई," टिंकू ने कहा, "ये तो पूरा सबूत है।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर ये पूरा नहीं है।"
मैंने आख़िरी पन्ना पलटा।
और वहाँ, सबसे नीचे, एक अलग हाथ से लिखा हुआ, एक नाम था — वो नाम जिसने भैरव को बनाया था।
मेरी आँखें उस नाम पर टिक गईं।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या है?"
मैंने उनकी तरफ़ कॉपी बढ़ाई। मेरी आवाज़ निकल नहीं रही थी।
"वो नाम," मैंने कहा, "हमारे गाँव का नहीं है। वो शहर का है।"
टिंकू ने झुककर देखा। "कौन?"
मैंने उसका नाम पढ़ा।
और फिर मैंने कॉपी बंद कर दी, और मेरी आँखों के सामने पूरा रामपुर घूम गया — माँ, गुड़िया, मीरा, मैदान, मिट्टी, सब।
"कल पंचायत में," मैंने कहा, "भैरव सिर्फ़ एक आदमी नहीं होगा। उसके पीछे कोई और है।"
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। "कौन?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मेरी आवाज़ में वो ठंडक आई जो अब तक नहीं थी।
"हरनाम का बाप। वो आदमी जिसने भैरव को पाला। और जिसने बीस साल पहले रघुवीर से ये अखाड़ा छीना था।"
चंदन ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पहचान थी।
"वो ज़िंदा है?" वो बोले, और उनकी आवाज़ में डर था।
"हाँ," मैंने कहा। "और वो कल पंचायत में आ रहा है।"
हम चारों दफ़्तर में खड़े थे। बाहर अंधेरा था, और सुबह होने में अभी देर थी। पर मेरे हाथ में अब वो था जो बीस साल से किसी के पास नहीं था।
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा।
"काका, तुमने कहा था — मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
"हाँ, बेटा।"
"तो कल मिट्टी बोलेगी। और हम सब सुनेंगे।"
कालू काका ने मेरा कंधा थपथपाया। उनके हाथ में वो ताकत लौट आई थी जो बीस साल से सोई थी।
और जब हम बाहर निकले, तो आसमान के किनारे पर हल्की लाली दिख रही थी। सुबह हो रही थी।
मैंने कॉपी को अपनी धोती में लपेटा, कसकर। और सड़क की तरफ़ चला।
पर तभी मेरी नाक में कुछ आया — तेज़, जला हुआ, पहचाना हुआ।
मैं रुका।
सड़क के दूसरे छोर पर, अंधेरे में, एक लालटेन जल रही थी। और उसके नीचे एक आदमी खड़ा था।
बड़ा शरीर। बड़ी मूँछें। सोने की चेन।
भैरव सिंह।
वो हँसा। और उसकी आवाज़ सुबह की हवा में फैल गई।
"लो," उसने कहा, "पंचायत से पहले ही मुलाक़ात हो गई।"
और उसने अपना हाथ उठाया। उसकी मुट्ठी में एक और चीज़ थी — छोटी, लाल, जली हुई।
मेरी माँ की चूड़ी।
॥
उसकी मुट्ठी में लाल चूड़ी थी।
मेरी माँ की चूड़ी। वही जली हुई, टूटी हुई लाल चूड़ी जो मैंने सुबह ही माँ की कलाई पर देखी थी।
मेरे पैर जम गए। धोती में लिपटी कॉपी मेरी छाती से चिपक गई, जैसे उसका वज़न अचानक दुगना हो गया हो।
"क्यों, वीर सिंह?" भैरव ने चूड़ी को हवा में लहराया। "कुछ कहना है? या बस यूँ ही खड़े हो?"
मेरे गले से आवाज़ नहीं निकली।
टिंकू ने मेरा हाथ कसकर दबाया। उसका हाथ ठंडा था, काँप रहा था, पर हटा नहीं।
"ये… ये तूने कहाँ से ली?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लगी।
"तेरी माँ से।" भैरव ने चूड़ी जेब में डाली। "वो अभी अखाड़े में है। मैंने उसे बुलाया था — पंचायत से पहले थोड़ी बात करनी थी। बूढ़ी औरत है, कमज़ोर है। डर गई। रोई। हाथ जोड़े। बोली — मेरे बेटे को छोड़ दे।"
मेरे कानों में खून की आवाज़ आने लगी।
"और मैंने उसे छोड़ दिया," भैरव हँसा। "मैं तो दिल का बड़ा आदमी हूँ, वीर। मैंने उससे कहा — जा, अपने बेटे को समझा। कल पंचायत में मेरे सामने झुक जाए, तो सब ठीक। वरना…"
उसने बात अधूरी छोड़ दी। और अधूरी बात ही सबसे ज़्यादा डराती है।
"वरना क्या?" मैंने कदम बढ़ाया।
कालू काका ने पीछे से मेरी कमर पकड़ी। "बेटा, रुक। अभी नहीं।"
चंदन आगे आया। उसकी लंगड़ाती चाल में एक अजीब-सी हिम्मत थी। "भैरव," उसने कहा, "तू तो अब भी वही है। बीस साल पहले भी तू औरतों और बूढ़ों के पीछे छिपता था।"
भैरव की आँखें चंदन पर टिकीं। पहचानने में उसे एक पल लगा। फिर उसका चेहरा बदला — जैसे किसी ने उसके सामने भूत खड़ा कर दिया हो।
"तू?" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "तू ज़िंदा है?"
"हाँ," चंदन बोला। "और अब मैं तेरे सामने खड़ा हूँ। दोनों हाथों से। भाई को छुड़ाकर।"
भैरव ने कालू काका की तरफ़ देखा, फिर वीर की तरफ़। उसकी मुट्ठी भिंच गई। वो समझ गया कि आज उसके जाल में कोई बड़ी चीज़ फँसी है, और वो चीज़ उसके हाथ से निकल रही है।
उसने कुछ नहीं कहा। बस लालटेन उठाई, पलटा और अंधेरे में घुल गया।
हम चारों वहीं खड़े रहे। सुबह की पहली किरण आसमान पर फैल रही थी, पर मेरे अंदर अंधेरा था।
"माँ," मैंने फुसफुसाया।
कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा। "तेरी माँ को कुछ नहीं होगा। वो औरत है जिसने बीस साल में एक बार नहीं रोई किसी के सामने। वो डरने का नाटक करती है, पर उसका दिल लोहे का है।"
"तू नहीं जानता उसे, काका।"
"मैं तेरे पापा को जानता था," कालू काका ने कहा। "और मैं जानता हूँ कि रघुवीर ने किस औरत से शादी की थी। सरस्वती को भैरव नहीं तोड़ सकता। वो उसे बस डरा सकता है।"
घर पहुँचा तो सूरज निकल चुका था।
आँगन का दरवाज़ा खुला था। मैं दौड़ा। मेरा दिल धक-धक कर रहा था।
माँ चक्की के पास बैठी थीं। चक्की टूटी पड़ी थी, पर वो उसी के सामने बैठी थीं, जैसे किसी पुराने दोस्त का इंतज़ार कर रही हों। उनके हाथ में एक कटोरी थी — दाल भीग रही थी।
उनके बाएँ हाथ की कलाई खाली थी। चूड़ी नहीं थी।
"माँ!"
वो उठीं। मेरी तरफ़ देखा। और फिर मुस्कुराईं।
वो मुस्कान मुझे चाकू जैसी लगी।
"आ गया?" उन्होंने कहा। आवाज़ सामान्य थी। बिलकुल सामान्य। जैसे कल कोई घटा ही न हो। "दाल रख दी है। ज़रा आग जला दे, रोटी बनाऊँ। गुड़िया स्कूल जाने की ज़िद कर रही है।"
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