Spirit of a Fighter – Chapter 944
"भैया," वो रोई। "उसने माँ को बहुत मारा। उसने कहा कि अगर तू आया तो माँ को ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।"
"अब कुछ नहीं होगा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ खुद काँप रही थी, पर मैंने उसे सख़्त रखा। "देख, मैं आ गया। माँ ठीक है।"
तभी मुझे कुछ याद आया। मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा।
"तेरी चप्पल?"
उसने आँखें बड़ी कीं। "कहाँ?"
मैंने अपनी धोती की जेब में हाथ डाला और वो गुलाबी धागे का फूलदार टूटी चप्पल निकाली, जो मुझे टीले पर मिली थी।
गुड़िया ने उसे झपट लिया, और पहली बार उसके चेहरे पर हँसी आई। वो हँसी, रोने के बीच से निकली।
"भैया! तुमने मेरी चप्पल रख ली!"
"तो क्या समझी थी," मैंने कहा, "तू अकेले चलोगी?"
गुड़िया ने चप्पल पहनकर मेरी तरफ़ देखा और फिर मेरे गले लग गई। इस बार वो नहीं रोई। बस मेरी गर्दन में अपना चेहरा दबाकर खड़ी रही।
तभी टिंकू आगे आया। उसके हाथ में मिठाई की एक पुरानी डिब्बी थी जो उसने कहीं से निकाली थी, और उसने उसे खोलकर सबके सामने रख दिया।
"आज के दिन ऐसा है," उसने कहा, "कि मिठाई बाँटनी ही पड़ेगी।"
उसने पहला लड्डू माँ के हाथ में रखा। माँ ने उसे देखा और उनकी आँखों में पानी आ गया। उन्होंने लड्डू मुँह में रखा, और उनके होंठ हिले — "तूने खीर में नमक कम डाला था।"
टिंकू हँसा, पर उसकी हँसी में रुलाई थी। "काकी, आज शक्कर भी डाली है।"
सब हँसे। उस हँसी में वो सारी रात घुल गई जो हमने काटी थी।
पर मेरी नज़र रघुवीर पर थी। वो अभी भी वहीं खड़ा था, अपनी लाठी पर झुका हुआ, और वो चुपचाप सब देख रहा था। मैंने उसकी तरफ़ देखा, और वो मेरी आँखों से नज़रें चुरा ले गया।
मैं उसके पास गया।
"तुमने कहा था कि तुम्हें माफ़ी नहीं मिली," मैंने कहा। "आज माँ ज़िंदा हैं। तेरे काग़ज़ों की वजह से।"
उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस उसकी बिना पलकों वाली आँखों से आँसू गिरे, और उसके जले चेहरे पर वो आँसू और भी चमकदार लगे।
इंस्पेक्टर शर्मा आगे आए। उन्होंने कटोरी में अब भी पड़ी वो काली गोली देखी, और अपनी आँखें मलीं।
"ये… ये क्या है?" उन्होंने पूछा।
"ये भैरव का कबूलनामा है," मैंने कहा। "आवाज़ में। साहब, ये पानी में डालते ही बोलता है। आप इसे अपने थाने में ले जाइए, और सबके सामने पानी में डालकर सुनाइए।"
इंस्पेक्टर ने कटोरी उठाई और उसे कपड़े में लपेटकर अपने साथ रख लिया। "ये अदालत में जाएगा," वो बोले। "पर वीर — अभी भैरव कहाँ है?"
"वो भाग रहा है," रघुवीर ने कहा। "मेरी झोपड़ी जलाने आने वाला था, पर उसके आदमी पहले आ गए। वो पीछे होगा।"
मैंने रघुवीर की तरफ़ देखा। "तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि उसने यही सोचा होगा कि मैं टेप वाली बात पर उसे यहाँ लाऊँगा," रघुवीर ने कहा। "पर वीर — वो टेप असल में यहीं है। पीपल के नीचे, उस पत्थर के नीचे जिस पर 'जय राम' लिखा है। ये डिब्बा उसने ऊपर रखवाया था, धोखा देने के लिए।"
मेरा दिल धक से रह गया। "तो टेप बचा है?"
"बचा है," रघुवीर ने कहा। "और उस टेप पर सिर्फ़ भैरव की आवाज़ नहीं है। उस टेप पर वो आवाज़ भी है जिसने भैरव को ज़हर बेचा था — बाहरी पानी वाले आदमी की।"
कालू काका ने लाठी उठाई। "तो फिर देर क्यों? चलो वो टेप निकालते हैं।"
हम पीपल की तरफ़ बढ़े, पर पहले मैंने माँ को गुड़िया और टिंकू के साथ छोड़ा, और कहा, "किसी को भी माँ के पास भैरव का आदमी नहीं आने देना।"
जग्गा ने सिर हिलाया। "मेरी जान चली जाए, पर माँ को कुछ नहीं होगा।"
जग्गा — जो कल तक भैरव का पहलवान था, जिसने मुझे अखाड़े में पछाड़ा था, जिसके शरीर में ज़हर भरा था — आज माँ के सामने खड़ा था, अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाए।
मैंने उसकी तरफ़ देखा, और वो नज़रें नीची कर गया।
"जग्गा," मैंने कहा। "कल तक तू मेरा दुश्मन था। आज तू मेरे साथ खड़ा है।"
वो कुछ नहीं बोला। बस उसने अपनी मुट्ठी भींची और अपनी आँखों में वो सारी शर्म लेकर खड़ा रहा जो उसने बीस साल में कमाई थी।
पीपल के नीचे पत्थर था, और उस पर 'जय राम' खुदा था। कालू काका और रघुवीर ने मिलकर पत्थर को सरकाया। नीचे गीली मिट्टी थी, और मिट्टी में एक सूती कपड़े की पोटली।
रघुवीर ने उसे खोला। अंदर एक छोटा, गोल टेप — पुराना, फ़िल्म वाला, टूटा हुआ, पर साबुत। और साथ में एक काग़ज़ — जिस पर लिखा था, "ये वो आवाज़ है। अगर मैं मर जाऊँ, तो इसे पंचायत में सुनाना।"
मैंने पोटली अपनी छाती से लगा ली।
"अब," मैंने कहा, "भैरव को ढूँढना है।"
और तभी — दूर, पीपल के पीछे, झाड़ियों में एक परछाई हिली। मैंने उसे पकड़ा — वो भाग रहा था, एक आदमी, झुका हुआ, काली शाल ओढ़े।
"वहाँ!" मैंने कहा। "रुको!"
मैं भागा। मीरा, टिंकू और जग्गा मेरे पीछे भागे। पर वो आदमी तेज़ था, बहुत तेज़। वो पीपल के पीछे से निकलकर तालाब के किनारे की तरफ़ गया।
पर वो भूल गया कि मैं गंध से भागते आदमी को भी पकड़ सकता हूँ।
हवा ने उसकी गंध मेरी नाक तक पहुँचाई — तेल, पसीना, और… पीली शीशी की कड़वाहट।
"वो भैरव है," मैं चिल्लाया। "तालाब की तरफ़ जा रहा है!"
हम भागे। तालाब का पानी काला था, और उसके किनारे घास गीली थी। वो आदमी दौड़ते हुए लड़खड़ाया, गिरा, फिर उठा। उसकी शाल गिर गई, और उसके चेहरे पर चाँद की रोशनी पड़ी।
भैरव नहीं था।
वो हरनाम ठेकेदार था।
वो घुटनों के बल गिर पड़ा, हाँफते हुए, और उसके हाथ में एक छोटा लाल बस्ता था।
"मत मारो!" वो चिल्लाया। "मत मारो! मैं भैरव नहीं हूँ! मैं तो सिर्फ़ हिसाब रखता हूँ!"
मैंने उसका कॉलर पकड़कर उसे उठाया।
"कहाँ है भैरव?"
"वो भाग गया," हरनाम ने हाँफते हुए कहा। "जब उसने सुना कि रघुवीर ज़िंदा है, तो वो मुझे ये बस्ता देकर भाग गया। उसने कहा — इसे जला देना, और अगर न जला सको, तो इसे किसी के हाथ में मत आने देना।"
"बस्ते में क्या है?" मैंने पूछा।
हरनाम ने काँपते हाथों से बस्ता खोला। अंदर काग़ज़ों की गड्डियाँ थीं — बीस साल के काग़ज़, हर मौत का हिसाब, हर जीत का पैसा।
और सबसे ऊपर एक लिफ़ाफ़ा था, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था — "वीर सिंह के लिए।"
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। उसे खोला।
अंदर एक तस्वीर थी — पुरानी, फटी, सफ़ेद-काली। उसमें तीन आदमी खड़े थे, अखाड़े की मिट्टी में। बीच में पापा — भवानी सिंह, मुस्कुराते हुए। उनके दाएँ रणवीर सिंह, जवान, मज़बूत। और उनके बाएँ… एक और आदमी, जिसका चेहरा तस्वीर में मिटाया हुआ था, सिर्फ़ उसका शरीर दिख रहा था।
और तस्वीर के पीछे, पापा की लिखाई में, एक लाइन लिखी थी — "तीनों भाई। एक ने दूसरे को मारा। तीसरा चुप रहा।"
मेरे हाथ काँप गए।
तभी अंधेरे में, तालाब के उस पार से, एक आवाज़ आई — धीमी, मीठी, और वो हँस रही थी।
"अब समझ आया, वीर?" भैरव की आवाज़ थी। "तीसरा कौन था?"
हम सब पलटे। तालाब के उस पार, अंधेरे में, एक मशाल जल रही थी। और मशाल के नीचे खड़ा था — भैरव। पर वो अकेला नहीं था। उसके हाथ में एक रस्सी थी, और उस रस्सी के दूसरे सिरे पर, पानी में गर्दन तक डूबा हुआ, कोई बंधा था।
मैंने पलक झपकाई। पानी में डूबा हुआ चेहरा मेरी तरफ़ उठा।
ये रणवीर सिंह थे।
"तुम्हारे पिता के तीसरे भाई," भैरव ने कहा, और उसकी हँसी तालाब के पानी में गूँज गई। "या कहूँ — तुम्हारे असली पिता?"
और वो रस्सी खींचने लगा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno