Spirit of a Fighter927 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 927

7 min read November 5, 2026

"रस्सी की फ़िक्र बाद में," मैंने कहा। "पहले देखें, रास्ता खुला है या नहीं।"

पर रास्ता खुला नहीं था। हम जैसे ही पुराने कुएँ के पास पहुँचे, वैसे ही मेरे पैर ठिठक गए।

कुएँ का मुँह खुला था। और उसके चारों तरफ़ मिट्टी ताज़ी बिखरी थी — जैसे किसी ने अभी-अभी कुछ ऊपर खींचा हो। कुएँ के किनारे पर एक रस्सी लटक रही थी, और रस्सी के सिरे पर बँधी थी एक टोकरी। टोकरी खाली थी, पर उसके तले में कुछ चमक रहा था।

मैंने झुककर देखा। हल्दी का एक टुकड़ा। और उसके साथ एक छोटा-सा पीतल का कंगन — वही कंगन जो मेरी माँ कभी नहीं उतारती थी।

मेरे हाथ टोकरी पर जम गए। मीरा ने मेरा कंधा छुआ। "वीर, साँस लो।"

"वो यहाँ से गुज़री है," मैंने कहा। "अभी थोड़ी देर पहले।"

रणवीर सिंह आगे आए और उन्होंने टोकरी को देखा। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस अपनी छड़ी कुएँ के किनारे पर रख दी और घुटनों के बल बैठ गए — जैसे कोई पुराना पहलवान दंगल से पहले माथा टेकता है।

"जग्गा," उन्होंने कहा, "तू पीछे वाले रास्ते पर दो आदमी खड़े कर दे। अगर भैरव का कोई आदमी आए, तो पहले बोलना, मारना बाद में।"

"जी गुरुजी।"

मैंने रस्सी पकड़ी और नीचे झाँका। अंधेरा था, पर हल्की-सी रोशनी दिख रही थी — जैसे नीचे कोई दीया जल रहा हो। और हवा में एक गंध आ रही थी। हल्दी की। पर उसके साथ कुछ और भी — जला हुआ तेल, और… और गीली मिट्टी पर पड़ी किसी बूढ़ी औरत की साँस।

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

"माँ," मैंने धीरे से कहा। अपनी आवाज़ भी मुझे सुनाई नहीं दी।

"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।

"नीचे कोई है। और वो ज़िंदा है।"

मैं रस्सी पर चढ़ने ही वाला था कि मेरे कानों में एक आवाज़ आई — दूर से, पीछे से, अखाड़े की तरफ़ से। एक चीख। फिर दौड़ने की आवाज़। फिर इंस्पेक्टर शर्मा की गरज।

मैं पलटा। अखाड़े के पीछे वाले रास्ते से एक आदमी भाग रहा था — मोटा, लुंजा-लुंजा, और उसके हाथ में एक लालटेन। भैरव का आदमी। वही जिसने टिंकू को धक्का दिया था।

मैंने एक पल सोचा — क्या करूँ, कुएँ में उतरूँ या उसके पीछे भागूँ? और उसी पल जग्गा ने रास्ता रोक लिया। उसने अपना पैर बढ़ाया, और वो मोटा आदमी लड़खड़ाकर गिरा। लालटेन दूर जाकर गिरी और बुझ गई।

पर तभी पीछे से एक और आवाज़ आई। मैंने देखा — भैरव खुद भाग रहा था। अखाड़े की दीवार के पास से, झाड़ियों को चीरता हुआ। उसके एक हाथ में लाठी थी और वो दूसरे हाथ से अपनी धोती सँभाल रहा था। उसका चेहरा पसीने से चमक रहा था, और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — जानवर का डर, जब उसे पता चले कि शिकारी अब उसके पीछे है।

वो भाग रहा था। भैरव। जिसकी आवाज़ सुनकर आधा गाँव काँपता था।

मैं उसकी तरफ़ दौड़ा। मेरे पैर मिट्टी में धँसते गए, पर मैं रुका नहीं। दस कदम, बीस कदम। वो मेरे सामने था, बस थोड़ी दूर। मैंने अपनी पूरी ताकत से दौड़ लगाई।

और तभी उसका पैर कीचड़ में फँसा। जूता उतर गया, और वो आगे गिरा — घुटनों के बल। एक पल के लिए वो रुका, मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।

फिर वो उठा। बिना जूते का, एक पैर नंगा, और भाग गया — झाड़ियों में, अंधेरे में।

मैं उसके पीछे भागा ही था कि पीछे से आवाज़ आई।

"वीर!"

रणवीर सिंह की आवाज़। वो मुझे बुला रहे थे। और उनकी आवाज़ में वो बात थी जो किसी भी पहलवान को रोक देती है — हुक्म, पर प्यार वाला।

मैं रुक गया। मेरी साँस फूल रही थी। मैंने पलटकर देखा। रणवीर सिंह कुएँ के पास खड़े थे, और उनका चेहरा कह रहा था — अभी नहीं। पहले माँ।

मैंने झाड़ियों की तरफ़ आख़िरी बार देखा। अंधेरा था। भैरव गया।

मैंने मिट्टी में धँसे उसके जूते को देखा। कीचड़ में आधा धँसा, एड़ी टूटी हुई। मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया। भाग जा, मैंने मन में कहा। भाग जा, पर मेरी मिट्टी तुझे कहीं नहीं जाने देगी। ये मिट्टी उन सबकी है जिन्होंने इसमें पसीना डाला — लुट्टन की, मेरे पिता की, रणवीर सिंह की। तू इसमें भागकर भी कहीं नहीं पहुँचेगा। ये मिट्टी तेरे पैर पकड़ लेगी।

मैं कुएँ की तरफ़ लौटा।

तब तक इंस्पेक्टर शर्मा अपने आदमियों के साथ आ पहुँचे थे। उन्होंने भैरव के भागने की जगह देखी, फिर मेरी तरफ़ देखा।

"कितने आदमी थे?" उन्होंने पूछा।

मैंने मुँह खोला, पर टिंकू पहले बोल पड़ा।

"चार, पाँच, छह…" वो अपनी उँगलियाँ गिनने लगा। "अरे, सात थे! एक तो बहुत मोटा था, सर, जैसे हलवाई की दुकान का बड़ा कड़ाही। और एक के हाथ में लालटेन थी, और एक के सिर पर पगड़ी थी, और एक…"

"टिंकू," मीरा ने उसे टोका, "ये हिसाब नहीं, गवाही है। गिनती में सिर्फ़ वही बोलो जो तुमने अपनी आँखों से देखा।"

टिंकू ने गला खँखारा, जैसे कोई पक्का गवाह हो। "जी मैडम। तो सर, सात आदमी थे। और सबके हाथ में लाठी थी। और भैरव के हाथ में एक पीली शीशी थी, जो उसने ज़मीन पर पटक दी।"

इंस्पेक्टर शर्मा ने अपनी डायरी निकाली और कुछ लिखा। फिर उन्होंने एक सिपाही को बुलाया। "कुएँ की जाँच करो। रस्सी से उतरो। और तुम," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, "तुम अपनी माँ के बारे में जो बताओगे, वो सब लिखा जाएगा।"

मैंने सिर हिलाया। मेरी आवाज़ लौट रही थी, धीरे-धीरे। "सर, मेरी माँ का नाम कमला देवी है। वो आज सुबह से नहीं मिली। और ये काग़ज़…"

मैंने जेब से काग़ज़ निकाला ही था कि इंस्पेक्टर शर्मा ने हाथ उठाया। "रुको। पहले मैं ये देख लूँ।"

उन्होंने काग़ज़ पढ़ा। उनका चेहरा गंभीर हो गया। उन्होंने दोबारा पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ देखा और कुछ कहने ही वाले थे कि मैंने कहा —

"सर, रुकिए।"

वो रुके।

मैंने उस कीचड़ में धँसे जूते की तरफ़ इशारा किया। "भैरव का जूता यहाँ पड़ा है। और जूते के अंदर से एक चिट्ठी निकल रही है।"

इंस्पेक्टर शर्मा ने पलटकर देखा। मैं जूते के पास गया, झुका, और उसे उठाया। एड़ी खुली थी — जैसे किसी ने उसे चाकू से काटकर फिर धागे से सी दिया हो। मैंने उँगली डाली और अंदर से एक तह किया हुआ काग़ज़ निकाला। पीला, पुराना, पर स्याही अभी गीली — और उस पर वही लिखाई जो अलमारी के काग़ज़ों पर थी।

मैंने उसे खोला। मेरे हाथ काँप रहे थे।

उस पर एक ही लाइन थी।

"वीर सिंह — तेरी माँ अभी भी मेरे पास है।

॥

वो लाइन मेरी आँखों के सामने काँप रही थी। और मेरे हाथ भी काँप रहे थे। इंस्पेक्टर शर्मा ने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया, दोबारा पढ़ा, और उनकी मूँछें सख़्त हो गईं।

"कितने आदमी थे, ये तो तुम बता चुके," उन्होंने धीरे से कहा, "पर ये चिट्ठी जूते में कैसे आई?"

मैंने उन्हें देखा। मेरे भीतर से आवाज़ निकली, पर सपाट। "वो इसीलिए भागा, सर। जूता छोड़ गया, क्योंकि जूते में ये चीज़ छिपी थी और उसे लगा कोई इसे नहीं ढूँढेगा।"

टिंकू ने पास आकर चिट्ठी पर झाँका। "पर भाई, इसमें तो सिर्फ़ नाम लिखे हैं। कोई पूरा हिसाब नहीं।"

मैंने काग़ज़ को टिंकू की तरफ़ घुमाया। उस पर तीन लाइनें थीं। तीन नाम। पहला — भवानी सिंह। दूसरा — रणवीर सिंह। और तीसरा — कुछ ऐसा जो स्याही से मिटाया गया था। जैसे किसी ने कलम उठाई हो, फिर बदल दिया हो, फिर उस नाम के ऊपर स्याही की मोटी लकीर फेर दी हो। और मिटाने में जल्दबाज़ी की थी, क्योंकि अक्षरों के नीचे की स्याही काग़ज़ में फैलकर एक छोटी-सी स्याह-भरी धब्बा बन गई थी।

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