Spirit of a Fighter – Chapter 925
और फिर दीवार का एक हिस्सा — पूरा हिस्सा — धीरे-धीरे अंदर की तरफ़ खिसक गया, जैसे कोई दरवाज़ा।
अंदर से गंध की एक लहर आई।
मैं पीछे हटा।
वो गंध मैं जानता था। वो गंध मुझे पहचानी थी।
नीम का तेल। तंबाकू। और… और मिट्टी। वो मिट्टी जो तहखाने में थी।
"अंदर कुछ है," मैंने कहा। "कोई नहीं। कुछ है।"
मीरा ने मेरा हाथ थामा। "वीर, सोच समझकर।"
"मैं सोच रहा हूँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरे कानों में भी अजीब लगी। "पर मुझे अंदर जाना है। क्योंकि जो कुछ इस दीवार में छुपा है, उसने मेरे पापा को मारा है।"
मैंने दीपक टिंकू के हाथ से लिया और अंदर क़दम रखा।
अलमारी छोटी थी — बस इतनी जगह कि एक आदमी खड़ा हो सके। और उसमें रखा था — काग़ज़ों का ढेर। पीले पड़े काग़ज़, जिन पर लिखाई मिट रही थी।
मैंने सबसे ऊपर वाला काग़ज़ उठाया।
उस पर एक नाम था — और वो नाम मेरे पापा का था।
"भवानी सिंह," मैंने पढ़ा।
नीचे लिखा था — "पहला पहलवान जो मेरे पानी से बच गया। इसलिए वो मेरा पहला दुश्मन था।"
मेरे हाथ काँप गए।
मैंने अगला काग़ज़ उठाया। उस पर लिखा था — "विक्रम का पहला पाप। बीस साल पहले।"
मैंने पीछे पलटकर कालू काका की तरफ़ देखा।
उनकी आँखें भर आई थीं।
"ये सब… ये सब भैरव ने खुद लिखा है," कालू काका ने फुसफुसाया। "अपने हाथ से। अपनी कहानी।"
मैंने काग़ज़ों का ढेर देखा। सैकड़ों काग़ज़। हर काग़ज़ पर एक नाम, एक तारीख़, एक जुर्म।
और सबसे नीचे, एक छोटी सी कॉपी थी — जिस पर लिखा था, "मेरी आख़िरी इच्छा।"
मैंने उसे खोला।
पहला पन्ना पलटा। दूसरा। तीसरा।
और फिर मेरी आँखें रुक गईं।
उस पन्ने पर लिखा था — "अगर मैं मरूँ, तो मेरी लाश को उसी तहखाने में दफ़ना देना जहाँ मैंने पहला ज़हर छुपाया था। वहाँ जो मिट्टी है, वो मेरी है। और मेरे साथ जो काग़ज़ दफ़्न होंगे, वो मेरे बेटे को मिलेंगे।"
मैंने कॉपी बंद कर दी।
"इसका बेटा?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सख़्त थी। "भैरव का बेटा कौन है?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"कालू काका!"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "मैंने कभी नहीं सुना। बीस साल में कभी नहीं सुना कि भैरव का कोई बेटा है।"
मीरा ने कॉपी मेरे हाथ से ली और उसे खोला। उसने पन्ने पलटे और फिर उसकी आँखें रुकीं।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "यहाँ आख़िरी पन्ने पर कुछ लिखा है।"
मैंने देखा।
आख़िरी पन्ने पर, बड़े अक्षरों में, लिखा था —
"मेरा बेटा वो है जो मेरे जैसा दिखता है। और वो तुम सबके बीच घूम रहा है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
मैंने कमरे में चारों तरफ़ देखा। टिंकू दीवार के पास खड़ा था। कालू काका दरवाज़े पर। मीरा मेरे पास।
"बाहर निकलो," मैंने कहा। "अभी।"
हम बाहर निकले और दरवाज़ा बंद किया।
तभी मुझे फिर वो गंध आई — नीम का तेल। और मैंने पीछे देखा।
सामने, नीम के पेड़ के नीचे, एक आदमी खड़ा था।
लंबा, भारी शरीर, बड़ी मूँछें। उसकी आँखें मुझ पर थीं और उसके हाथ में कुछ था — एक पीली शीशी।
"वीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो मैं जानता था। "तूने मेरे पापा को जेल भेज दिया। अब मैं तुझे कहाँ भेजूँ?"
॥
वो आवाज़ मेरे कानों में रेंगती रही, और मैं वहीं जम गया। नीम के पेड़ के नीचे खड़ा वो आदमी मुझे देख रहा था — और उसके हाथ में पीली शीशी थी। उसकी मूँछें भैरव जैसी थीं। उसका शरीर भैरव जैसा था। पर आँखें… आँखें भैरव से भी ज़्यादा ठंडी थीं।
"तू कौन है?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ मुझे अपनी ही लगी — जैसे किसी और का गला बोल रहा हो।
वो मुस्कुराया। मुस्कान में वो मिठास थी जो भैरव के मुँह पर रहती थी। और वो मिठास मुझे अंदर तक चुभ गई।
"मैंने कहा ना," उसने कहा, "भैरव सिंह का बेटा। और तूने मेरे पापा को पुलिस के हवाले कर दिया।"
"भैरव का बेटा तो यहाँ कोई नहीं," टिंकू ने पीछे से कहा, और उसकी आवाज़ में वो घबराहट थी जो वो छुपाने की कोशिश कर रहा था। "भैरव की तो शादी ही नहीं हुई थी। मैंने सुना है।"
"शादी नहीं हुई थी," उसने कहा, "पर बेटा था। उसकी माँ को भैरव ने अखाड़े से निकाल दिया था। बीस साल पहले। जब मैं पेट में था।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था, पर आँखें मुझ पर टिकी थीं — जैसे कह रही हो, "अभी कुछ मत करो।"
"तू जो चिट्ठियाँ लिख रहा था," मैंने कहा, "वो तेरी थीं? 'तेरी माँ झूठ बोल रही है' वाली?"
"मेरी थीं," उसने कहा। "और पापा की अलमारी में जो काग़ज़ मिले, वो भी मेरे ही सजाए हुए थे। उन्हें लगा कि वो अपने जुर्म छुपा रहे हैं। असल में मैं छुपा रहा था।"
"और तेरा नाम क्या है?"
उसने शीशी हवा में उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई। "पहले ये ले। ये तेरे पापा की है। मेरे पापा ने तेरे पापा को इसी से मारा था। और अब ये तेरी है।"
वीर सिंह ने जगह नहीं छोड़ी। मैंने देखा कि उसके आस-पास कुछ लोग खड़े होने लगे — गाँव वाले, जो पंचायत से लौट रहे थे। मशालें फिर जल उठीं।
"अरे ये कौन है?" सुक्खी बुआ की आवाज़ आई, और उन्होंने अपना पान का बीड़ा हिलाया। "अरे मैंने तो सुना है कि भैरव की एक बहन थी…"
"बुआ, चुप रहो," किसी ने कहा।
"क्यों चुप रहूँ?" सुक्खी बुआ भीड़ में घुस आईं। "अरे, ये तो वही है! वो औरत जो अखाड़े के पीछे रहती थी — कमला की बहन! बीस साल पहले भैरव ने उसे भगा दिया था। हाँ, मुझे याद है।"
वो आदमी — भैरव का बेटा — सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा, और उसका चेहरा पहली बार बदला। उसकी आँखों में कुछ टूटा।
"तो तू कमला देवी का भांजा है?" कालू काका ने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ में एक सालों पुरानी थकान थी। "तू कमला के पास ही पला। और मैंने तुझे कभी नहीं पहचाना।"
"तूने पहचाना क्यों नहीं," उसने कहा, "तूने तो मेरे पापा को भी नहीं पहचाना। तूने बीस साल देखा और चुप रहा।"
कालू काका का सिर झुक गया।
उसने शीशी ज़मीन पर पटकी। काँच टूटा और उसमें से वो पीला पानी रेंगने लगा। मुझे उसकी गंध आई — कड़वी, जली हुई, और उसमें नीम के तेल की बू।
"ये पानी किसी काम का नहीं," उसने कहा। "पापा ने इसे बनाने का तरीका मुझे सिखाया था। पर साँचा तो तेरे पापा ने तोड़ दिया था। इसलिए ये पानी अब सिर्फ़ ज़हर है। ताकत नहीं।"
"तो तू मुझे क्या दे रहा है?" मैंने कहा।
"मैं तुझे याद दिला रहा हूँ," उसने कहा, "कि तेरे पापा ने मेरे पापा को मिट्टी में मिला दिया। और आज से मैं तेरे पीछे पड़ा हूँ।"
इतना कहकर वो पीछे मुड़ा।
और भागने लगा।
मैंने छलाँग लगाई, पर रणवीर सिंह की आवाज़ पीछे से आई — "रुक!"
वो आवाज़ इतनी ज़ोर की थी कि मैं ठिठक गया। रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर नहीं थे — वो खड़े थे, एक लाठी के सहारे, और उनका चेहरा लाल था।
"उसे जाने दे," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी साँस फूल रही थी। "वो भागेगा ज़रूर। पर उसकी गंध तेरे नाक में है। और मेरी मिट्टी में भी। वो कहीं नहीं जाएगा।"
"पर वो…" मैंने कहा।
"वो अपने पापा की तरह कायर है," रणवीर सिंह ने कहा। "कायर भागते हैं। और भागते हुए गिरते हैं। और गिरते हुए कुछ छोड़ जाते हैं।"
मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया। वो नीम के पेड़ के पीछे से निकलकर भाग रहा था — उसके चार आदमी भी उसके पीछे-पीछे। और फिर मैंने देखा — भागते हुए उसका पाया कीचड़ में फँसा। वो आगे गिरा। उसके घुटने ज़मीन से टकराए।
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