Spirit of a Fighter – Chapter 924
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मैंने उस पानी को पीया," भैरव ने कहा। "और उसने देख लिया कि मेरी आँखें बदल रही हैं। उसने मुझे रोका, पर मैं नहीं रुका। तू क्या समझेगा? तू तो भूखा था, वीर। तेरे पास कुछ नहीं था। जब तेरे पास कुछ नहीं होता, तो ताकत का नशा ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया तेरे पैरों में हो।"
"मेरे पापा ने तुझे निकाला नहीं," मैंने कहा। "तूने खुद अपने आप को निकाला। उसने तुझे रोका था। तू रुका नहीं।"
भैरव ने मेरी बात सुनी और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
तभी मीरा आगे आई। वो मेरे पास खड़ी थी, उसका बैग कंधे पर था और उसकी आँखें लाल थीं। उसने अपना हाथ मेरी बाँह पर रखा और उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये सब सुनकर भी तू उसके लिए बुरा महसूस कर रहा है। मुझे पता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मैं नहीं कर रहा," मैंने कहा, पर मेरी आवाज़ में वो झूठ था जो मीरा सुन सकती थी।
"तू कर रहा है," उसने कहा। "तेरी आँखें बता रही हैं। पर वीर, याद रख — बीस साल में उसने कितने घर उजाड़े, कितनी माँओं को रुलाया। उसके पास भी एक कहानी है, पर उसकी कहानी उसके गुनाहों को माफ़ नहीं करती।"
मैंने सिर हिलाया। वो सही थी, और शायद इसीलिए मुझे उसके हाथ की ठंडक अच्छी लगी।
पुलिस के आदमी आगे आए और भैरव को उठाने लगे। उसने अपने हाथ आगे बढ़ा दिए, कोई विरोध नहीं किया।
पर जब वो उठा, तो उसने एक आख़िरी बार मेरी तरफ़ देखा।
"वीर," उसने कहा, "एक बात पूछूँ?"
मैं रुका।
"तूने मुझे कब पहचाना? कि मैं विक्रम हूँ?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मुझे याद आया — कैसे वो हमेशा मुझसे दूर रहता था, कैसे जब मैं अखाड़े में आता तो वो मुँह फेर लेता, कैसे उसकी आवाज़ में कभी-कभी वो लहजा आ जाता जो जाना-पहचाना लगता।
"मैंने तुझे पहचाना नहीं," मैंने कहा। "मैंने तेरी गंध पहचानी। जब तू मेरे पास आता, तेरी गंध में दो चीज़ें थीं — एक तो वो पानी, और दूसरी चीज़। दूसरी चीज़ तेरे पापा की थी। तू अपने पापा की गंध लिए घूम रहा था।"
भैरव की आँखें फैल गईं। वो कुछ कहने को हुआ, पर पुलिस ने उसे आगे बढ़ा दिया।
वो जाते-जाते एक बार पलटा। उसकी आँखें कमला देवी पर थीं, और उसके होंठ हिले। मुझे नहीं सुनाई दिया कि उसने क्या कहा, पर कमला देवी ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया और वहीं बैठ गईं।
मैंने कालू काका की तरफ़ मुड़कर देखा। वो अब उठ खड़े थे। उन्होंने अपने आँसू पोंछे और मेरे पास आए।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मेरे पास एक बात है। मैं बोलूँ?"
"बोलिए।"
"जब भैरव को पुलिस ले जाए, तो मैं चंदन के पास जाऊँगा। मैं उससे पूछूँगा कि वो गवाही देगा या नहीं। अगर वो हाँ कहे, तो मैं खुद उसे अदालत तक ले जाऊँगा।"
मैंने उनका हाथ थामा। उनका हाथ पतला था, हड्डियाँ उभरी हुईं, पर उसमें गर्मी थी।
"कालू काका," मैंने कहा, "आपने आज मेरे लिए बहुत कुछ किया। आप उसे अदालत तक लाइए, बाकी मैं देख लूँगा।"
वो मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में वो सब था जो सत्तर साल की मिट्टी में बचा रह गया था।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"अरे मैंने तो सुना है—"
सब पलटे।
सुक्खी बुआ आ रही थीं, साड़ी का पल्लू कंधे पर, हाथ में पान का बीड़ा नया। वो सीधी हमारे बीच आईं और रुकीं।
"अरे मैंने तो सुना है," उन्होंने दोहराया, और उनकी आँखें चमक रही थीं, "कि भैरव के कमरे में एक और अलमारी है। वो वाली जो दीवार में बनी है। जो कोई देख नहीं सकता।"
भीड़ में फुसफुसाहट फैल गई।
मैंने सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो मासूम शरारत थी जो बीस साल से गाँव की हर बात को पहले जानने की भूख से आती है।
"कैसे सुना, बुआ?" मैंने पूछा।
"अरे कैसे सुना क्या," उन्होंने कहा, "मैं तो भैरव के घर के पीछे से गुज़र रही थी, तो देखा कि उसकी औरत रो रही थी और कह रही थी — 'अब तो वो अलमारी खोल देगा, जो तूने दीवार में छुपा रखी है।'"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
मीरा की आँखें बड़ी हो गईं।
"वीर," उसने कहा, "अगर वो सच है, तो हमें वो अलमारी ढूँढनी होगी। आज रात, इससे पहले कि भैरव के आदमी उसे खाली कर दें।"
मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। वो अब भी खड़े थे, पर उनका चेहरा थका हुआ था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया।
"जा," उन्होंने कहा। "पर अकेला नहीं।"
"मैं साथ हूँ," टिंकू ने कहा, और उसने अपनी जेब से चाबियों का गुच्छा निकाला। "और मेरे पास ताले खोलने का सामान है।"
"और मैं," मीरा ने कहा। "मुझे उस औरत से बात करनी है।"
कालू काका आगे आए। "मैं जानता हूँ भैरव का घर। मैं रास्ता दिखाऊँगा।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। भीड़ धीरे-धीरे छँट रही थी। पुलिस की गाड़ी दूर जा रही थी और उसकी धूल हवा में उड़ रही थी। कमला देवी वहीं बैठी थीं, और सुक्खी बुआ उनके पास बैठकर उनका सिर सहला रही थीं।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। सोने की चेन वहीं थी, ठंडी और भारी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"चल," मैंने कहा।
हम चले।
रास्ते में टिंकू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा, "वीर, एक बात कहूँ?"
"कह।"
"वो चेन जो तूने उठाई — वो तूने क्यों उठाई? तू उसे वहीं छोड़ सकता था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्योंकि अगर वो चेन मिट्टी में पड़ी रहती," मैंने कहा, "तो कल कोई और उसे उठा लेता, और फिर वही कहानी शुरू हो जाती। हर बार कोई न कोई उसे उठाता है, टिंकू। मैं चाहता हूँ कि ये चेन अदालत के सामने रखी जाए, ताकि सब देखें कि इस धागे पर कितना खून लगा है।"
टिंकू ने कुछ सोचा, फिर बोला, "और तेरे पास एक चीज़ और है ना? वो चाँदी की अँगूठी जो कालू काका ने दी थी?"
"हाँ।"
"तो फिर तेरे पास दो चीज़ें हैं। और दोनों को साथ रखना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया — पहली बार उस दिन, पूरे दिन में।
भैरव का घर अखाड़े से दूर था, गाँव के किनारे पर, जहाँ नीम के पेड़ों की कतार थी। हम पहुँचे तो आसमान में धूल भरी शाम उतर रही थी।
घर का दरवाज़ा बंद था।
कालू काका आगे आए और उन्होंने दरवाज़े पर हाथ रखकर धक्का दिया।
दरवाज़ा खुला।
अंदर अंधेरा था, पर मुझे एक गंध आई — सूखी हल्दी, ठंडी राख, और कुछ और। कुछ ऐसा जो मैंने पहले भी सूंघा था, पर कहाँ, याद नहीं आ रहा था।
"दीया जलाओ," कालू काका ने कहा।
टिंकू ने अपनी जेब से माचिस निकाली और दीवार पर टँगे दीये को जलाया।
दीये की रोशनी में कमरा दिखा — बिखरा हुआ। कोई जल्दी में गया था। कपड़े ज़मीन पर, एक कुर्सी उलटी पड़ी थी।
"औरत?" मीरा ने कहा। "जहाँ भी हो, उसे ढूँढना होगा।"
"पहले अलमारी," मैंने कहा।
मैंने दीवार पर हाथ फेरा। ईंटें ठंडी थीं, पर एक जगह पर मुझे हवा की लकीर महसूस हुई — बहुत हल्की, जैसे किसी दरार से साँस आ रही हो।
"यहाँ," मैंने कहा। "यहाँ से हवा आ रही है।"
टिंकू दौड़कर आया और उसने अपना कान दीवार पर रख दिया।
"भीतर खोखला है," उसने कहा।
कालू काका ने अपनी लाठी उठाई। "हटो," उन्होंने कहा। "मैं जानता हूँ इसे कैसे खोलना है।"
उन्होंने लाठी के नीचे वाला सिरा दीवार की एक ईंट पर रखा और ज़ोर से धक्का दिया।
ईंट अंदर गई।
फिर दूसरी। फिर तीसरी।
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