Spirit of a Fighter – Chapter 922
उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं। वो कुछ कहना चाहता था — मैं उसके होंठों के काँपने से समझ सकता था। पर वो कुछ नहीं बोला। पुलिस के आदमियों ने उसे पीछे खींच लिया और वो बैठ गया।
मीरा भीड़ में से आगे आई। उसने कालू काका के सामने खड़े होकर उनका हाथ थामा। उसकी आवाज़ नरम थी, पर उसमें वो सवाल था जो सबके मन में था।
"कालू काका, आपने ये बात बीस साल क्यों छुपाई?"
कालू काका ने उसकी तरफ़ देखा। और मैंने देखा कि उनकी आँखें कैसे भर आईं — पहले एक कोर में पानी जमा, फिर वो पूरी आँख में फैल गया, और उन्होंने अपनी झुर्रीदार पलकों को कसकर झपका लिया। एक आँसू उनके गाल पर बहकर दाढ़ी में खो गया।
"डर के मारे, बेटी," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ टूट रही थी, और वो टूटी आवाज़ मेरे सीने में कहीं लगी। "उस रात के बाद मेरे घर के बाहर एक मुर्दा कुत्ता पड़ा मिला था। मेरे दरवाज़े पर, सुबह-सुबह। उसका गला घुटा हुआ था। और उसके पास एक काग़ज़ रखा था जिस पर लिखा था — 'अगली बार तेरा बेटा।'"
उनका हाथ काँप रहा था। मीरा ने उनका हाथ और मज़बूती से पकड़ लिया।
"मेरा बेटा चंदन," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ फूट पड़ी। "वो उस समय दस साल का था। मैंने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया और पूरी रात बैठा रहा। अगली सुबह मैंने अपने आँगन में मिट्टी डाल दी ताकि उन पैरों के निशान मिट जाएँ। और फिर मैं चुप हो गया। बीस साल तक चुप।"
वो रुक गए। उनके होंठ काँप रहे थे।
"हर बार जब कुआँ देखता, मुझे वो लालटेन याद आती। हर बार जब कोई पहलवान बीमार पड़ता, मेरा दिल कहता — कालू, बोल दे। पर मैं बोलता तो मेरा चंदन? मेरा चंदन…"
उनकी आवाज़ रुक गई। मैंने उन्हें देखा — कुबड़ा, छोटा, सफ़ेद दाढ़ी, हाथों में मिट्टी। बीस साल से वो इसी मिट्टी को सींच रहे थे और इसी मिट्टी के नीचे उनका डर दबा हुआ था।
मैं उनके पास गया। मेरे पैर अपने आप चले। मैंने उनका दूसरा हाथ थामा — वो हाथ जिसमें मिट्टी लगा कपड़ा था। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं और उनमें काँप था, असली काँप, जो रोने से आता है।
"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भारी थी, "अब डरने की ज़रूरत नहीं।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
"तुम्हारा चंदन ज़िंदा है," मैंने कहा। "मैंने उसे देखा है। वो जला है, पर ज़िंदा है। और उसने मुझे तुम्हारा नाम बताया था। वो बोल नहीं सकता, काका। पर उसने उँगली से मिट्टी पर तुम्हारा नाम लिखा था। वो तुम्हें ढूँढ रहा है।"
कालू काका की आँखें फैल गईं। उनके होंठ हिले पर आवाज़ नहीं निकली। और फिर उन्होंने वो किया जो मैंने कभी नहीं सोचा था — वो मेरे सामने झुक गए, मेरे हाथ पर अपना माथा रख दिया, और रोने लगे। बूढ़े आदमी का रोना — वो सूखा रोना होता है, जिसमें आवाज़ कम और कंधे ज़्यादा हिलते हैं।
मैंने उनका माथा सहलाया। मैंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि कहने को कुछ था भी नहीं। कुछ पल ऐसे होते हैं जिनमें चुप्पी ही सबसे बड़ी बात होती है।
भीड़ चुप थी। सुक्खी बुआ ने अपने आँचल से आँखें पोंछीं। रणवीर सिंह कुर्सी पर बैठे अपनी ऊँगली से कुर्सी की बाहें दबा रहे थे, और उनके होंठ कसकर बंद थे।
कालू काका ने सिर उठाया। उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं — कपड़े से नहीं, अपनी उँगली से, जैसे बच्चे पोंछते हैं।
"पर एक बात है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी। उसमें कुछ बदल गया था। "उस रात मैंने कुएँ के पास एक और चीज़ देखी थी। वो बाहरी आदमी — जिसके हाथ में शीशियाँ थीं — उसने विक्रम से कुछ कहा था। मैंने सुना था।"
पूरी पंचायत आगे झुक गई।
"उसने कहा था — 'तेरे हाथ से अखाड़ा निकल गया तो कोई बात नहीं। पर अगर तू मेरा नाम किसी को बताया, तो तेरा नाम भी मिट जाएगा।' और विक्रम ने कहा था — 'मेरा नाम मिट गया तो क्या? भवानी का नाम मिट जाएगा।'"
कालू काका ने भैरव की तरफ़ देखा।
"वो बाहरी आदमी तुम्हारे पास आज भी आता है, विक्रम," उन्होंने कहा। "मैं जानता हूँ। मैंने तुम्हारे कमरे के पीछे उसके पैरों के निशान देखे हैं। वो तुम्हें अब भी डराता है।"
भैरव ने अपना सिर नीचे कर लिया। उसकी तरफ़ से एक भी आवाज़ नहीं आई।
सरपंच माधव सिंह ने आगे बढ़कर कहा, "ये सब बातें हैं। पंचायत सबूत माँगती है। एक बूढ़े की याददाश्त और एक मज़दूर के काग़ज़ से कोई आदमी नहीं फाँसी पर चढ़ता।"
"तो मेरा सबूत देखिए," मैंने कहा।
मैंने अपनी कमर से भवानी की हड्डियों वाली डिबिया निकाली। मैंने उसे खोला — उसमें सूखी हल्दी, टूटा कंगन, और ज़हर के काले दाने थे। मैंने वो दाने एक कपड़े पर रख दिए।
"ये ज़हर के दाने हैं," मैंने कहा। "मैं इन्हें सूंघकर पहचानता हूँ। ये वही ज़हर है जो पीली शीशियों में है। और इन दानों पर लुट्टन के पसीने की गंध है। लुट्टन — जो भैरव का चेला था और जो इसी ज़हर से बीमार पड़ा।"
"लुट्टन कहाँ है?" किसी ने पूछा।
"लुट्टन की लाश हवेली के पिछले कुएँ से मिली थी," मैंने कहा। "उसे भी कोई चुप करा गया। और वो कोई भैरव नहीं था — भैरव तो उस वक़्त पुलिस के साथ था।"
पंचायत में हलचल मच गई। माधव सिंह का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
और तभी भैरव उठा।
वो पुलिस के आदमियों के बीच से उठा, और उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें ऊपर कीं। उसका चेहरा अब वैसा नहीं था जैसा पंचायत की शुरुआत में था। उस पर अब शर्म थी — और शर्म कभी-कभी आदमी को सच बोलने पर मजबूर कर देती है।
"वो बाहरी आदमी," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ रूखी थी, "वो… वो मेरे पास बीस साल पहले आया था। उसने मुझे पानी दिया और कहा — 'इससे तू शेर बन जाएगा।' मैंने पिया। मैं शेर बना। और फिर वो मुझसे कुछ माँगने लगा। पहले पैसे, फिर अखाड़ा, फिर…"
वो रुका।
"फिर लोग," उसने कहा।
भीड़ खौल उठी। किसी ने पत्थर उठाया, किसी ने चप्पल। पुलिस के आदमियों को भैरव को घेरकर खड़ा होना पड़ा।
"वो कौन है?" रणवीर सिंह ने कुर्सी से चिल्लाया। और उनकी आवाज़ में वो आग थी जो बीस साल से दबी थी। "नाम बता! कौन है वो बाहरी आदमी?"
भैरव ने अपना सिर ऊपर किया। उसकी आँखें मुंशीजी की तरफ़ उठीं, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो कह रहा था — मैं अकेला नहीं हूँ।
"वो…" भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई। "वो हमारे बीच है। वो हर रोज़ हमारे साथ—"
तभी मुंशीजी की फ़ाइल ज़मीन पर गिरी। काग़ज़ बिखर गए। उन्होंने झुककर उन्हें उठाना चाहा, पर उनके हाथ काँप रहे थे और काग़ज़ उनकी उँगलियों से फिसल रहे थे।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
और मैंने उनके चेहरे पर वो देखा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — वो डर, वो असली डर। जो बीस साल पहले कालू काका के घर के बाहर मुर्दा कुत्ता पड़ा था, वो डर शायद आज मुंशीजी के चेहरे पर था।
भैरव ने उनकी तरफ़ झुककर, बहुत धीरे से, इतना धीरे कि सिर्फ़ वो और मैं सुन सके, कहा, "बोल दे कालू, सब बोल दे — पर याद रख, तेरे बेटे चंदन का चेहरा आज भी जलता है ना?"
कालू काका का पूरा शरीर एक झटके में सख़्त हो गया। उनकी आँखें फैल गईं, और उनके होंठ खुले रह गए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — जैसे मदद माँग रहे हों — और फिर उनकी आँखें भैरव की तरफ़ उठीं। उनकी साँस रुक गई थी।
मैंने भैरव की तरफ़ घूमकर देखा, और मेरी मुट्ठी अपने आप बंध गई।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno