Spirit of a Fighter – Chapter 913
"शेराज़ बाग के पीछे उस पुरानी हवेली में रहता है," उसने कहा। "जो खंडहर है, जिसकी छत गिरी हुई है। वहीं वो आदमियों को रखता है। पर वीर—" उसने मेरी आँखों में देखा, "—वहाँ जाने का मतलब है कि तू वापस नहीं आएगा। वो तेरा इंतज़ार कर रहा है। तू उसका जाल है, तेरी माँ सिर्फ़ चारा है।"
"तो चारे को छुड़ाने कौन जाएगा?" मैंने कहा।
भैरव चुप रहा।
मैंने चाबियाँ कालू काका को दीं और उनकी झुर्रियों भरी उँगलियों ने उन्हें ऐसे पकड़ा जैसे कोई पुराना ज़ख़्म सहेज रहे हों।
"तू मेरे साथ चलेगा," मैंने भैरव से कहा। "रास्ता दिखाएगा। और अगर एक बार भी तूने मेरी माँ का नाम लेकर मुझे उलझाने की कोशिश की, तो मैं तुझे उसी हवेली में छोड़ आऊँगा।"
भैरव ने धीरे से सिर हिलाया। एक झटके में नहीं, जैसे हार मान रहा हो। उसकी कमर पर लटकी चाबियों का गुच्छा धीरे से हिला।
"मेरी कमर से चाबी निकाल," उसने कहा। "उस हवेली के पिछले दरवाज़े की। तुझे काम आएगी।"
मैं उसके पास गया। उसकी कमर पर झुका और पुरानी लोहे की चाबियों में से एक को पकड़ा। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं और मैं उसे छिपाने की कोशिश कर रहा था।
तभी भैरव का सिर मेरे कान के पास झुका। उसकी साँस में गुड़ और पान की गंध थी, और उसके नीचे कुछ और — डर की बदबू।
"तेरी माँ और बहन मेरे आदमियों के पास हैं," उसने फुसफुसाया। "एक इशारा और वो मर जाएँगी। चाबी वापस रख दे। अभी।"
मेरा हाथ रुक गया।
एक पल के लिए मेरे कान में सिर्फ़ उसकी साँस बची थी और मेरी माँ का चेहरा — चूल्हे की रोशनी में, माथे पर पसीना, मुझे देखकर मुस्कुराती हुई।
फिर मैंने भैरव की आँखों में देखा। उसकी आँखों में वो डर अब भी था। पर उसके नीचे कुछ और भी था — एक चालाकी, एक बाज़ी।
"मेरी माँ को मारने वाले का रास्ता मिट्टी नहीं छोड़ती," मैंने कहा। "मैंने तेरे पैरों के निशान पहचाने हैं, भैरव। तेरे आदमियों के भी। कोई मेरी माँ को छुएगा, तो उसकी गंध ज़मीन पर रह जाएगी। और मैं उसे सूँघकर ढूँढ लूँगा।"
भैरव का चेहरा बदला। पहले बार उसकी मूँछों के नीचे का होंठ काँपा।
मैंने चाबी खींच ली।
चाबी निकलते ही भैरव की कमर से एक और चीज़ नीचे गिरी। एक छोटी सी थैली। लाल कपड़े की। मैंने उसे उठाया। उसमें कुछ भारी था। मैंने खोला।
अंदर मिट्टी थी। लाल मिट्टी। और उसमें मिला हुआ सूखा गुड़।
मेरी साँस रुक गई। मेरी बहन गुड़िया बचपन से मेरी जेब में लाल मिट्टी भरकर रखती है। ये उसकी आदत है। सिर्फ़ उसकी।
"ये कहाँ से आया?" मैंने भैरव का कॉलर पकड़कर कहा।
"मुझे नहीं पता," भैरव ने हाँफते हुए कहा। "आज सुबह मेरी जेब में रखा मिला। कोई मेरे पास आया। कोई मेरे कमरे में आया, वीर। मेरे सोते हुए।"
मैंने थैली अपनी जेब में रखी और उससे मुँह फेर लिया। मेरे पीछे भीड़ की फुसफुसाहट बढ़ रही थी। मीरा ने गुड़िया को अपनी गोद में उठाया हुआ था और गुड़िया मेरी तरफ़ देख रही थी। उसकी आँखों में वो डर था जो बच्चों की आँखों में सबसे ज़्यादा चुभता है।
मैं भैरव के कमरे की तरफ़ बढ़ा — उसकी चाबी, उसका रास्ता। मुझे उसके कमरे से वो पुराना नक्शा चाहिए था जो कालू काका ने एक बार फुसफुसाते हुए बताया था।
दो कदम चला था कि अखाड़े के फाटक पर एक बैलगाड़ी आकर रुकी। बैल हाँफ रहे थे। गाड़ी का पर्दा हिला और उसमें से गुड़िया कूद पड़ी।
वो भागी। सीधी मेरी तरफ़। उसके पैर नंगे थे और धूल में उसके निशान बन रहे थे।
"भैया!" वो चिल्लाई। उसकी आवाज़ फटी हुई थी, जैसे बहुत देर रोती रही हो। "भैया, माँ को ले गए!"
मेरे हाथ से चाबी फिसल गई और लोहे की आवाज़ के साथ ज़मीन पर गिरी।
॥
चाबी ज़मीन पर गिरी और उछलकर मेरे पैर के पास रुकी। पर मैं उसे उठाने के लिए नहीं झुका। मेरी नज़र गुड़िया पर थी।
उसके पैर नंगे थे। धूल में उसके निशान बन रहे थे और उसकी आँखों से पानी लगातार बह रहा था, पर वो रो नहीं रही थी। बच्चे ऐसे रोते हैं जब डर उनकी आवाज़ को खा जाता है।
"भैया, दो आदमी आए," वो हाँफते हुए बोली। "एक लंगड़ा था, बड़ा मोटा। दूसरा दुबला। माँ चक्की पर बैठी थीं। उन्होंने माँ का हाथ पकड़ा और खींच लिया। माँ ने मुझे देखा और बस इतना कहा — 'गुड़िया, दौड़।'"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। नाखून हथेली की खाल में धँस गए।
"तू भागी कैसे?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ सख़्त थी, पर उसने गुड़िया का कंधा थाम रखा था।
"मैं छुप गई थी," गुड़िया ने नाक सुड़कते हुए कहा। "चक्की के पीछे। वो बैलगाड़ी में माँ को डालकर चले। मैं पीछे-पीछे चली आई। धूल बहुत उड़ रही थी, इसलिए उन्होंने मुझे देखा नहीं।"
"कहाँ?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी। "किधर ले गए?"
गुड़िया ने पीछे की तरफ़ इशारा किया। "नहर के उस पार। जहाँ पुरानी ईंट का भट्ठा है।"
भीड़ में हलचल हुई। और तभी एक आवाज़ फूटी — पान से भरी, चमकीली साड़ी वाली आवाज़।
"अरे मैंने तो देखा था!" सुक्खी बुआ अपना बीड़ा हिलाती हुई आगे आईं। "मैं उसी वक़्त चक्की के पास से गुज़र रही थी। अरे वो तो लंगड़ा था! वही शेराज़! मैंने उसकी लाठी की आवाज़ पहचानी!"
मेरे अंदर कुछ टूटा। एक साफ़ आवाज़ के साथ, जैसे सूखी लकड़ी चूल्हे में चटकती है।
मैं मुड़ा। भैरव अभी भी वहीं खड़ा था, हाथ बँधे, और उसके चेहरे पर वो पुरानी मीठी मुस्कान लौट आई थी। वो मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था।
"तू जानता था," मैंने कहा।
"मैंने तुझे बताया था," भैरव ने धीरे से कहा। "शेराज़ मेरा आदमी नहीं है। मैंने कहा था न — नंदकिशोर का।"
मेरी आँखों के आगे लाल घेरा घूम गया। मैं उसकी तरफ़ बढ़ा। एक कदम, दो कदम।
तभी एक हाथ ने मेरी कलाई पकड़ी।
मीरा।
उसकी पकड़ मज़बूत थी। उसकी उँगलियाँ मेरी नसों पर थीं और मैं उन्हें महसूस कर सकता था — ठंडी, पर काँपती नहीं।
"रुक," उसने कहा। बस एक शब्द। पर उस शब्द में वो सब था जो वीर सिंह को सुनना था।
"मेरी माँ—" मैंने कहना शुरू किया।
"मुझे पता है," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मुझे पता है, वीर। और मैं तुझे रोक नहीं रही। मैं बस इतना कह रही हूँ — अगर तू अभी भागा, तो ये भैरव की अलमारी बंद रह जाएगी। और वो अलमारी खुली तो उसके आदमी ही नहीं, उसका पूरा जाल खुलेगा।"
उसने मेरी कलाई नहीं छोड़ी।
"पहले अलमारी। फिर माँ। वरना सबूत हाथ से निकल जाएगा। और हमेशा के लिए।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। उनमें पानी था — पतला, हल्का, पर था। और उस पानी के नीचे एक बात थी जो मुझे अब तक किसी ने नहीं कही थी। वो मुझ पर भरोसा कर रही थी। माँ पर भी नहीं, मुझ पर।
मेरी साँस धीरे-धीरे लौटी।
मैंने सिर हिलाया। एक छोटा-सा हिलाया, पर काफ़ी।
"टिंकू," मैंने कहा।
कोई जवाब नहीं आया।
मैं पलटा। टिंकू वहाँ नहीं था। भीड़ में जगह खाली थी, बस धूल के बादल में उसके टूटे चप्पल का निशान।
तभी अखाड़े के अंदर से एक ज़ोरदार आवाज़ आई — लोहे के दरवाज़े के टूटने की। चटाक। फिर कुछ भारी गिरा।
"मैं सोच रहा था," टिंकू की आवाज़ दरवाज़े के अंदर से आई, "कि मुझे कब मौका मिलेगा।"
हम सब दौड़े।
भैरव का कमरा अखाड़े के कोने में था — छोटा, अंधेरा, जिसकी दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लटकी थी और जिसकी खिड़की हमेशा बंद रहती थी। टिंकू ने दरवाज़े को कंधे से मारकर खोला था और अब वो बीच में खड़ा था, हाँफते हुए, और उसके हाथ में एक लोहे की रॉड थी।
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