Spirit of a Fighter – Chapter 910
पर मैं बीच में आ गया। मेरा कंधा उसकी छाती से टकराया और मैंने उसे रोक लिया। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मेरी आवाज़ नहीं।
"अगर जाली है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ पूरे अखाड़े में गूँजी, "तो तेरी कमर में जो अलमारी की चाबी है, वो किसकी है? वो अलमारी जो तेरे कमरे में है। जिसे तू रातों को खोलता है। जिसमें उन ग्यारह पहलवानों के नाम हैं जो यहाँ से गए और लौटकर वैसे नहीं रहे।"
भैरव का हाथ अपनी कमर पर गया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
भीड़ में से किसी ने कहा, "खोलो उसकी अलमारी!"
और तभी कालू काका ने सिर उठाया। उनकी आँखों में पानी था, पर उनकी आवाज़ में आग। "मैं गवाह हूँ," वो बोले। "मैंने वो अलमारी खुद सजाई थी। बीस साल पहले। उस रात जब विक्रम ने अपना नाम बदला था।"
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"मैं गवाह हूँ," कालू काका ने कहा। "मैंने वो अलमारी खुद सजाई थी। बीस साल पहले। उस रात जब विक्रम ने अपना नाम बदला था।"
भैरव की आँखें कालू काका पर पड़ीं और उसका चेहरा पल भर में ऐसा बदला जैसे किसी ने उसके सामने रखी मिट्टी का घड़ा पटक दिया हो। उसके होंठ खुले रह गए, और मैंने पहली बार देखा कि उस आदमी की भी एक सीमा है। वो सीमा कालू काका थे।
"तू?" भैरव की आवाज़ फट गई। "तू मेरे साथ… तू बीस साल से…"
"बीस साल से तेरी रोटी खा रहा हूँ," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर हर शब्द साफ़। "और बीस साल से ये सोच रहा हूँ कि एक दिन तेरे मुँह पर थूक दूँगा। आज वो दिन है।"
भीड़ में से आवाज़ें आने लगीं। पहले धीमी, फिर तेज़।
"अलमारी खोलो!"
"चाबी दो!"
"देखें उसमें क्या है!"
भैरव का हाथ अपनी कमर पर गया। उसकी उँगलियाँ चाबी के ऊपर बंद हो गईं और उसने उसे जकड़ लिया। मैंने देखा कि उसकी गर्दन की नसें उभर आई हैं। वो साँस लेने की कोशिश कर रहा था, पर उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी जैसे कोई बोझा उठा रहा हो।
रणवीर सिंह अभी भी खड़े थे। उनके पैर काँप रहे थे, मीरा उनका हाथ पकड़े खड़ी थी, पर वो अपने ही पैरों पर खड़े थे। उन्होंने पंचायत के चबूतरे की तरफ़ देखा जहाँ पाँच बुज़ुर्ग बैठे थे, चारों तरफ़ मशालों की रोशनी में उनके चेहरे पीले पड़ रहे थे।
"सुनो," रणवीर ने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी जो अब तक सिर्फ़ सुनी हुई कहानियों में थी। "आज अगर ये अलमारी नहीं खुली, तो मैं यहीं बैठ जाऊँगा। मैं भूखा रहूँगा, पानी नहीं पीऊँगा। ये बीमार आदमी, जो बीस साल बाद खड़ा हुआ है, वो यहीं बैठ जाएगा और तुम सब उसे देखते रहना।"
चबूतरे पर माधव सिंह हिले। उनकी चमकीली साड़ी… नहीं, उनका चमकीला कुर्ता था, और वो उठकर खड़े हो गए। उनकी आवाज़ में वो मिठास घुली हुई थी जो बात टालने के लिए ज़रूरी होती है।
"रणवीर भाई, ये सब क्या हो रहा है? अलमारी, चाबी, बीस साल… इतनी जल्दी में क्यों? पहले आरोप साबित होने तो दो। अखाड़े की इज़्ज़त…"
"इज़्ज़त?" रणवीर ने कहा, और उन्होंने पहली बार माधव सिंह की तरफ़ सीधा देखा। "माधव, तू बीस साल से इसी इज़्ज़त के पीछे छुपा बैठा है। आज ये इज़्ज़त नहीं, सच है। और सच को चबूतरे पर नहीं बैठाया जाता। सच को खड़ा होना पड़ता है।"
भीड़ में से कोई चिल्लाया, "सरपंच जी, अलमारी खोलो!"
और फिर सबने साथ चिल्लाया, ऐसे चिल्लाया कि अखाड़े की मिट्टी काँपने लगी। आवाज़ें एक हो गईं और वो एक ही लय में चलने लगीं — अलमारी खोलो, अलमारी खोलो।
माधव सिंह का रंग उड़ गया। उन्होंने भैरव की तरफ़ देखा। वो नज़र मैंने पकड़ी — उसमें एक इशारा था। कोई ख़ास इशारा नहीं, बस आँखों की एक हरकत — होंठ सिकोड़ना, पलक झपकना। भैरव ने वो इशारा पढ़ा और मैंने पाया कि भैरव के चेहरे पर कुछ टूटा। जैसे उसे आज पहली बार समझ आया कि ये आदमी उसे बचाने के लिए नहीं खड़ा, ये आदमी खुद को बचाने के लिए उसे आगे धकेल रहा है।
भैरव पीछे हटा। एक कदम, दो कदम। उसकी एड़ी मिट्टी में धँसी और वो लड़खड़ाया।
तभी कालू काका आगे आए।
उनकी कुबड़ी कमर आज और झुकी हुई लगी, और उनके सफ़ेद बाल मशाल की रोशनी में चाँदी जैसे चमक रहे थे। वो भैरव के रास्ते में खड़े हो गए — सीधे, टेढ़े, पर खड़े। उनका शरीर भैरव के आधे से भी नहीं था, पर उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला दिए जैसे कोई दरवाज़ा रोक रहा हो।
"बीस साल से मैं तेरा रास्ता देख रहा था," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर साफ़ थी। "हर सुबह जब तू अखाड़े में आता था, मैं सोचता था — आज पूछ लूँगा। आज हिम्मत कर लूँगा। और हर शाम मैं चुपचाप मिट्टी सींचकर सो जाता था। मेरा बेटा चंदन जल गया, और मैंने तेरे लिए चूल्हा जलाया। मुझे पता था, और मैं चुप रहा। वो मेरा गुनाह है। पर आज…"
उनकी आवाज़ रुकी। उन्होंने आँखें बंद कीं, फिर खोलीं।
"आज मत जा।"
भैरव ने उन्हें धक्का देना चाहा। उसका हाथ उठा — बड़ा, भारी, सोने की चेन वाला हाथ — और मैं दौड़ा। पर धक्का नहीं लगा। भैरव का हाथ हवा में ही रुक गया और नीचे गिर गया। उसकी आँखों में कुछ और था। कालू काका को देखकर उसके हाथ नहीं उठे। कोई डर नहीं था उसमें। कुछ और था। शायद शर्म।
मैं उसके पास पहुँचा। मेरी साँस तेज़ थी, मेरे हाथों की हथेलियाँ पसीने से भरी थीं, पर मैंने उसे पकड़ा नहीं। मैं सिर्फ़ उसके सामने खड़ा हो गया।
"चाबी दे," मैंने कहा।
वो मुझे देखने लगा। उसकी आँखें लाल थीं और उनमें वो ठंडक पिघल रही थी जो बीस साल से जमी थी।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कब्ज़ चरमराई हो। "तू समझता नहीं। जो इस अलमारी में है, वो सिर्फ़ मेरा नहीं है। उसमें कई नाम हैं। कई बड़े नाम। अगर ये खुली, तो सिर्फ़ भैरव नहीं गिरेगा। पूरा रामपुर गिरेगा। तेरी माँ…"
"मेरी माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मुझे भी अजीब लगी — कड़ी, सूखी, "मेरी माँ ने मुझे इसी मिट्टी में खड़ा होना सिखाया है। वो मरे या जिए, वो मेरी माँ है, और वो मुझसे ये नहीं कहेगी कि सच छुपा।"
भैरव ने एक लंबी साँस ली। उसकी छाती उतरी और फिर उसने अपना हाथ अपनी कमर से हटा लिया।
मैंने चाबी निकाली। लोहे की छोटी चाबी, जिसके सिरे पर ज़ंग लगा था और जो उसकी कमर से बंधी रस्सी में अटकी हुई थी। मैंने रस्सी खोली। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं और मुझे ये कमबख़्त काँपना अच्छा नहीं लग रहा था। चाबी मेरी हथेली में गर्म थी — उसके शरीर की गर्मी।
और तभी भैरव आगे झुका।
उसका मुँह मेरे कान के पास आया। इतना पास कि उसकी साँस मेरी गर्दन पर लगी — गुड़ और पान की बू, और उसके नीचे वो कड़वाहट जो मैंने पहली बार तब सूंघी थी जब मैं बच्चा था और वो मेरे आँगन में आया था।
"तेरी माँ और बहन मेरे आदमियों के पास हैं," उसने फुसफुसाया। इतना धीमा कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ। "शेराज़ और उसके दस आदमी। एक इशारा और वो मर जाएँगी। चाबी रख ले। अलमारी बंद रहने दे। और मैं तुझे बता दूँगा कि वो कहाँ हैं। सब कुछ बता दूँगा। सब कुछ।"
मेरा हाथ रुक गया। चाबी मेरी हथेली में थी और मेरी उँगलियाँ उसके ऊपर बंद हो गईं। मेरे पैर जम गए। मेरी साँस रुक गई।
मेरी माँ। गुड़िया।
गुड़िया, जो हर रोज़ मेरी जेब में लाल मिट्टी भर देती है। जो कहती है "भैया तुम उन सबको पछाड़ दोगे।" जो अभी बारह साल की है और जिसने ज़िंदगी में सिर्फ़ एक बार मिठाई की डिब्बी खुली देखी है — टिंकू की दुकान पर, जब टिंकू ने उसे चुपके से एक लड्डू दिया था और कहा था "किसी को मत बताना।"
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