Spirit of a Fighter – Chapter 898
मेरा हाथ अपनी जेब की तरफ़ गया। मैंने अंगूठी निकाली। उसे कालू काका की लालटेन की रोशनी में देखा।
अंगूठी पर वो निशान था — जो मैंने पहले देखा था। एक छोटा-सा निशान। जो किसी पहाड़ी की तरह दिखता था। या किसी पेड़ की जड़ की तरह।
"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी।
"ये निशान क्या है?"
कालू काका ने अंगूठी को अपनी उँगली पर रखा, लालटेन की रोशनी में। उनकी उँगली काँप रही थी।
"ये पहाड़ी नहीं है, बेटा," उन्होंने कहा। "ये पेड़ की जड़ है। बरगद की जड़। और ये निशान उस जगह का है जहाँ तेरे पिता ने आख़िरी बार साँस ली थी।"
रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर आगे बढ़ाई। उनका चेहरा सख़्त हो गया था।
"कालू," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक चेतावनी थी। "अभी नहीं।"
"अभी ही," कालू काका ने कहा, और पहली बार मैंने उनकी आवाज़ में रणवीर की बात काटने की हिम्मत देखी।
पर तभी मैदान के दूसरी तरफ़ से एक आवाज़ आई।
जग्गा।
वो अपने कोने से उठ रहा था। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो शेर के पिंजरे में चाबी डालने पर दिखती है। भैरव को पकड़ते वक़्त वो पीछे खड़ा था, पर अब भैरव नहीं था। और जग्गा को लगता था कि पूरा अखाड़ा उसका है।
वो झपटा।
मैंने उसके कदम की आवाज़ सुनी — दायाँ कदम भारी, बायाँ हल्का। उसका बायाँ पैर लड़खड़ाया, और मैंने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे सहारा दे दिया — न जाने क्यों, उसे गिरने से बचाने के लिए। वो मेरी पकड़ से छूटा और पीछे हटा।
भीड़ चिल्लाई। "मार!" "डरपोक!" टिंकू की आवाज़ सबसे ऊपर थी — "भाई, मार!"
पर मैंने अपने हाथ नीचे किए। और उसके चारों तरफ़ घूमने लगा।
उसके पसीने की गंध आ रही थी — नमक, थकान, और कुछ और। जग्गा का दायाँ कंधा गर्म था, बायाँ ठंडा। उसकी साँस तेज़ थी, पर गहरी नहीं। वो ताकत दिखा रहा था, और अंदर से खाली जा रहा था।
और फिर मैं वो गंध पहचान गया।
कड़वाहट। वही कड़वाहट जो लुट्टन के पसीने में थी। वही जो उस पानी में थी।
मेरा पेट कस गया। मेरी आँखें जलने लगीं, और अखाड़े की मिट्टी का रंग धुँधला हो गया। ये आदमी भी मरा हुआ है। बस अभी चल रहा है। जग्गा मेरे सामने खड़ा था, मुँह से झाग निकालता, और अंदर से वो सड़ रहा था।
मैं उसके पास गया, और भीड़ को लगा मैं भाग रहा हूँ। मैंने उसके कान के पास अपना मुँह रखा और धीरे से कहा।
"तूने वो पानी पिया है ना?"
जग्गा रुक गया।
उसके दाँव बीच में ही रुक गए। उसकी छाती फूली, फिर थमी। उसने मेरी तरफ़ देखा, और एक पल के लिए उसकी आँखों में जो था, वो दुश्मनी नहीं थी। वो डर था।
"तुझे क्या पता," वो फुसफुसाया।
"तेरे पसीने से पता चलता है," मैंने कहा। "लुट्टन भी वैसा ही सूँघता था। मरने से पहले।"
जग्गा का चेहरा बदल गया। कुछ पल के लिए उसकी मुट्ठियाँ खुल गईं।
मैं मंच की तरफ़ देखे बिना नहीं रह सका। भैरव की कुर्सी खाली थी। पर रणवीर सिंह व्हीलचेयर से उठकर खड़े थे — पूरे कद के — और उनकी मुट्ठी कसी हुई थी। मीरा ने उनके पास जाकर धीरे से कुछ कहा, बस एक-दो शब्द। और रणवीर सिंह पहली बार मुस्कुराए। मुश्किल से, दाँत दिखे बिना, पर मुस्कुराए।
मैं पलटा।
जग्गा की आँखों में वो डर अभी भी था। पर उसके पीछे कुछ और आ गया था — वो शर्म जो कोई अपनी बीमारी छुपाता है। और मैंने उसके होंठ हिलते देखे — "मत बताना"।
मैंने सिर हिलाया। धीरे से।
जग्गा ने आँखें बंद कीं।
और फिर वो खुलीं और उनमें सिर्फ़ गुस्सा था। वो पूरी ताकत से मुझ पर टूट पड़ा। मैंने अपना वज़न एक तरफ़ किया, पर उसकी गर्दन मेरी छाती में लगी, और हम दोनों उड़ गए।
हवा मेरे फेफड़ों से निकल गई। मेरी पीठ मिट्टी से टकराई, और ऊपर आसमान घूम गया। फिर मेरी कोहनी पत्थर से रगड़ी, और मैंने खून की गंध सूँघी — अपनी। उसकी लोहे जैसी गंध अखाड़े की मिट्टी से मिल गई।
मैंने जग्गा को अपने ऊपर देखा। उसकी आँखों में डर अभी भी था, और उसके हाथ मेरे गले की तरफ़ बढ़ रहे थे।
और भीड़, जो अभी तक चिल्ला रही थी, अचानक चुप हो गई।
॥
जग्गा के हाथ मेरे गले पर थे, और उसकी हथेली की गर्मी मेरी खाल पर जल रही थी। उसकी साँस मेरे चेहरे पर पड़ रही थी — कड़वी, बासी, जैसे कोई पुराना पानी का घड़ा जिसमें काई लग गई हो।
मेरी पीठ की मिट्टी गीली थी, और मेरी कोहनी से जो खून बह रहा था, वो मिट्टी में मिलकर उसकी गंध बदल रहा था। लोहे जैसी वो बू, अखाड़े की लाल मिट्टी में घुल रही थी।
भीड़ चुप थी। पूरी तरह चुप।
और उसी चुप्पी में सुक्खी बुआ की आवाज़ फूटी।
"अरे राम! अरे राम!" वो अपनी साड़ी का पल्ला मुँह पर रखकर रोने लगी, और उसका रोना असली था, बनावटी नहीं। "मैंने तो सुना था कि इस जग्गा को अखाड़े में कोई नहीं हरा सकता। साल भर से कोई नहीं हरा सका इसे।"
फिर उसने सुबकते हुए एक और बात कही, और वो बात ऐसे निकली जैसे उसे खुद भी पता नहीं था कि वो क्या बोल रही है।
"पर ये बात भी सुनी है, अरे भगवान, कि इसका बाप भी कभी इसी मिट्टी में हारा था। बाईस साल पहले। किसी लंबे-चौड़े नौजवान के हाथों।"
जग्गा के हाथ मेरे गले पर थे, और अचानक उनमें ज़ोर कम हो गया।
मुझे लगा मेरी साँस रुक गई है। पर नहीं, मेरी साँस चल रही थी। बस मेरे कानों में एक आवाज़ गूँज रही थी — "इसका बाप भी इसी मिट्टी में हारा था।"
जग्गा का पूरा शरीर मेरे ऊपर था, पर उसका ध्यान भीड़ की तरफ़ चला गया था। एक पल के लिए। बस एक पल।
और मैंने उस पल को पकड़ा।
मेरा दायाँ हाथ उसकी बाँह के नीचे से फिसला और उसके बाएँ घुटने पर जा टिका। मैंने उस घुटने को पहले छुआ, फिर उँगलियों से उसकी हड्डी का कोना ढूँढ़ा। वहाँ जो गाँठ थी, वो ठंडी थी, और उसके चारों तरफ़ की मांसपेशी काँप रही थी। ये घुटना उसका कमज़ोर हिस्सा था। यही वो जगह थी जहाँ से उसकी पूरी ताकत टूट सकती थी।
मैंने अपनी पूरी हथेली उस घुटने पर जमाई और धक्का दिया।
जग्गा चीखा।
वो चीख किसी जानवर की नहीं थी। वो एक आदमी की चीख थी जिसे अपने ही शरीर ने धोखा दिया हो। उसकी पकड़ मेरे गले से छूटी और वो मेरे ऊपर से लुढ़ककर एक तरफ़ गिरा। उसके दोनों हाथ अपने बाएँ घुटने पर चले गए, और वो मिट्टी में बैठ गया।
पूरा अखाड़ा सन्न रह गया।
मैं उठा। मेरी कोहनी से खून टपक रहा था, और मेरी पीठ में एक जगह ऐसी थी जहाँ छूने पर आँखों के आगे अंधेरा छा जाता था। पर मैं उठा। मैंने अपनी धोती से कोहनी पोंछी और सीधा खड़ा हो गया।
तभी मंच से आवाज़ आई।
"जग्गा! उठ!"
भैरव की आवाज़ थी। वो अपनी कुर्सी से आधा उठकर खड़ा था, और उसका चेहरा लाल था। उसकी मूँछों का तेल पसीने में घुल गया था। "उठ, कमीने! उठ! ये तेरा ही अखाड़ा है!"
जग्गा ने उठने की कोशिश की। उसके घुटने ने साथ नहीं दिया। उसके हाथ मिट्टी में धँसे और वो फिर बैठ गया। उसकी साँस ऐसी चल रही थी जैसे सीने में कहीं छेद हो गया हो।
और उसके हाथ काँप रहे थे।
मैंने देखा — उसके हाथ। वो हाथ जो अभी मेरा गला दबा रहे थे। अब वो मिट्टी को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे, और मिट्टी उनके बीच से फिसल रही थी।
मंच से फिर आवाज़ आई। "लुट्टन! हरनाम! कोई इसे पानी दे! अरे कोई तो—"
"बस।"
मेरी आवाज़ मेरे कानों में भी अजीब लगी। छोटी। सपाट। पर वो पूरे अखाड़े में फैल गई। भैरव की आवाज़ रुक गई।
मैं जग्गा के पास गया। मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया। अखाड़े की मिट्टी मेरी धोती पर लग गई, और मेरी कोहनी का खून उस मिट्टी में गिर रहा था।
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