Spirit of a Fighter – Chapter 894
जग्गा ने काग़ज़ों की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तो हम दोनों," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "हम दोनों।"
उसने भैरव का हाथ छोड़ दिया। और मैंने उसे पकड़ा।
तभी मंच से रणवीर सिंह की आवाज़ आई —
"रामपुर के लोगो! आज यहाँ जो हुआ, वो सिर्फ़ एक मुकाबला नहीं था। ये एक सच था जो बीस साल से मिट्टी में गड़ा था। और आज मिट्टी ने उसे बाहर निकाल दिया।"
भीड़ चुप थी।
"मैं तुम सबके सामने कहता हूँ," रणवीर ने कहा, "कि मैं बीस साल से जानता था कि मेरी टाँगें कैसे गईं। पर मैं बोल नहीं सका। डर से। अपनी बेटी के डर से। अपने अखाड़े के डर से। और आज मेरी बेटी यहाँ खड़ी है — और मुझसे कह रही है, 'बाबा, अब बोलो।'"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
वो मंच के पास खड़ी थी। उसकी आँखें भरी हुई थीं। उसके हाथ जुड़े हुए थे। और वो अपने पिता को देख रही थी — ऐसे जैसे पहली बार देख रही हो।
रणवीर सिंह ने अपना हाथ उठाया। अपनी बेटी की तरफ़। और मीरा दौड़कर मंच पर गई।
वो अपने पिता के पास बैठी। उनका हाथ पकड़ा। और व्हीलचेयर की बाँह पर सिर रख दिया।
भीड़ में कई लोग रो रहे थे।
और मैं — मैं मिट्टी में खड़ा था, भैरव का हाथ पकड़े हुए, और मेरी नज़र माँ पर थी।
वो भीड़ के कोने में खड़ी थीं। उनके हाथ जुड़े हुए थे। उनके होंठ हिल रहे थे। और उनकी आँखों में पानी था — पर वो पानी दुख का नहीं था।
गुड़िया उनके पास खड़ी थी। वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रही थी। और उसकी आँखों में वो चमक थी जो मैंने चक्की की खिड़की से सूरज निकलते वक़्त देखी थी।
टिंकू ने अपनी टोपी सीधी की। और उसने अपना हाथ ऊपर उठाया — मुट्ठी बनाकर।
"वीर भाई!" वो चिल्लाया।
और फिर भीड़ ने भी चिल्लाना शुरू किया।
पहले धीरे। फिर तेज़। "वीर! वीर! वीर!"
मेरे हाथ में भैरव का हाथ था। मेरे कपड़ों पर मिट्टी थी। मेरी पीठ में दर्द था, मेरी गर्दन में दर्द था, और मेरे हाथ काँप रहे थे — थकान से, और कुछ और से भी।
मगर मैं खड़ा था।
भीड़ चिल्ला रही थी। और मेरे कान में एक आवाज़ थी — अपनी ही आवाज़, बचपन की — जब मैं पहली बार अखाड़े की दीवार के बाहर खड़ा हुआ था, टूटी चप्पल में, और अंदर से मिट्टी की गंध आ रही थी।
तभी मेरी नाक में वो गंध आई फिर।
मीठी। भारी। शीशी वाली।
मैंने सिर घुमाया।
भीड़ के सबसे पीछे, नीम के पेड़ के नीचे, वो आदमी खड़ा था। काला कपड़ा। और उसके हाथ में अब शीशी नहीं थी — एक काग़ज़ था।
उसने काग़ज़ हवा में उठाया। और मुझे दिखाया।
उस पर लिखा था — बड़े अक्षरों में — "तेरे पिता की हड्डियाँ अभी भी मेरे पास हैं।"
मेरा हाथ भैरव के हाथ से ढीला पड़ा।
आदमी ने काग़ज़ जेब में रखा। उसने अपना काला कपड़ा थोड़ा और ऊपर खींचा — और इस बार मैंने उसका पूरा चेहरा देखा।
जला हुआ। आधा चेहरा जला हुआ। और उसके निचले होंठ पर वो निशान — जो अब मुझे पहचाना हुआ लगा।
क्योंकि वो निशान मैंने पहले देखा था। चंदन सिंह के चेहरे पर। श्मशान की कुटिया में।
और वो आदमी — वो चंदन नहीं था। पर उसका चेहरा चंदन जैसा था।
उसने मेरी तरफ़ देखा। और मुस्कुराया। और उसकी मुस्कान में वो सब था जो मैं समझ नहीं पाया।
फिर वो पेड़ के पीछे गया। और गायब हो गया।
मैंने भैरव का हाथ छोड़ा। मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
"वीर?" मीरा की आवाज़ आई। "क्या हुआ?"
मैं रुका।
"वो आदमी," मैंने कहा। "वो फिर आया था।"
"कौन?"
मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा घबराया हुआ था।
"जिसके पास मेरे पिता की हड्डियाँ हैं," मैंने कहा।
और मेरी आवाज़ जैसे किसी और की थी — दूर से आती हुई, थकी हुई, और अंदर से काँपती हुई।
भीड़ अभी भी मेरा नाम चिल्ला रही थी। भैरव मिट्टी में घुटनों के बल था। रणवीर सिंह अपनी बेटी का हाथ पकड़े बैठे थे। माँ और गुड़िया मेरी तरफ़ देख रही थीं। कालू काका चाबियों का गुच्छा पकड़े खड़े थे।
और मैं — मैं अखाड़े के बीच में खड़ा था, जीत के ठीक बीच में, और मेरे हाथ खाली थे।
क्योंकि वो आदमी जो अभी गया था, वो कोई नहीं था। वो एक सवाल था। एक ऐसा सवाल जिसका जवाब मेरे पास नहीं था।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। भवानी की पीली शीशी निकाली। उसे देखा।
और मुझे लगा — जैसे वो शीशी अब पहले जैसी नहीं है। जैसे उसका वज़न बढ़ गया है।
क्योंकि अब मुझे पता था — वो शीशी सिर्फ़ ज़हर नहीं थी। वो एक कुंजी थी।
और वो आदमी — वो उस कुंजी का ताला था।
मैंने शीशी वापस जेब में रखी।
तभी मेरी नज़र मिट्टी पर पड़ी। जहाँ वो आदमी खड़ा था। नीम के पेड़ के नीचे।
वहाँ मिट्टी पर कुछ लिखा था। पैर के निशान से।
मैं वहाँ गया। झुका। और पढ़ा।
"श्मशान। आज रात। अकेला।"
मेरे पीछे मीरा आई। उसने भी पढ़ा।
"मत जाना," उसने कहा।
मैंने पलटकर उसे देखा।
"मेरे पिता की हड्डियाँ उसके पास हैं," मैंने कहा।
"तो हम सब चलेंगे," उसने कहा। "पुलिस को बताएँगे।"
"वो कहेगा अकेला।"
"तो वो कहे," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मुझे पहली बार अखाड़े में सुनाई थी — जब उसने मुझे मिट्टी से बाहर धकेला था। "तू अकेला नहीं जाएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे। उसके हाथ में दवा की शीशी थी — वही जो उसने कल रात दी थी।
"मीरा—"
"मैंने कहा," उसने मेरी बात काटी, "तू अकेला नहीं जाएगा।"
और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर ठंडी थीं। मगर पकड़ सख़्त। जैसे किसी ने रस्सी बाँध दी हो।
"अगर तुझे कुछ हो गया," मैंने धीरे कहा, "तो मैं खुद को माफ़ नहीं करूँगा।"
"तो मत होने दे," उसने कहा। सीधा। बिना रुके। "मुझे बचाने की सोच मत। खुद को बचाने की सोच।"
मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। भीड़ अभी भी मेरा नाम चिल्ला रही थी, पर वो आवाज़ें अब दूर लग रही थीं — जैसे किसी और गाँव की हों।
तभी मंच से आवाज़ आई — ऊँची, तेज़, गुस्से में काँपती।
"अखाड़ा बीच में नहीं रुकता!"
भैरव सिंह खड़ा था। उसकी लाल धोती पर धूल थी। सोने की चेन उसके सीने पर उछल रही थी। उसका चेहरा लाल था — गुस्से से नहीं, शर्म से। क्योंकि पूरा गाँव देख रहा था कि वीर ने उसे दो बार मिट्टी में गिराया था।
"अगला दाँव!" उसने चिल्लाकर कहा। "दोनों पहलवान मिट्टी में!"
मीरा ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा।"वीर," उसने फुसफुसाया। "तू थक गया है। तेरी साँस देख।"
मैंने अपनी साँस सुनी। वो फूल रही थी। मेरी पिंडली में एक झटका अभी भी धड़क रहा था, जहाँ जग्गा ने पहले गिराया था।
"एक दाँव," मैंने कहा। "बस एक।"
"वीर—"
"अगर मैं हार गया," मैंने उसकी आँखों में देखा, "तो वो आदमी मेरे पिता की हड्डियाँ कभी नहीं देगा। वो कहेगा — तेरे बाप का बेटा हार गया। और मैं वो सुन नहीं सकता।"
उसने मेरा हाथ छोड़ा। धीरे से। जैसे किसी चीज़ को उसकी जगह पर रख रही हो।
"तो जीत," उसने कहा।
मैं मिट्टी में लौटा।
जग्गा मेरे सामने खड़ा था। उसका सीना फूल रहा था। उसके माथे पर पसीना था और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले नहीं देखी थी — शक। वो अब तक मुझे सिर्फ़ एक ईंट ढोने वाला समझ रहा था। अब वो नहीं समझ रहा था।
मैं उसके पास गया। इतना पास कि मेरी साँस उसके कंधे को छूने लगी। भीड़ को लगा मैं कुछ कह रहा हूँ। पर मैंने धीरे से, सिर्फ़ उसके कान में कहा।
"तेरा बायाँ घुटका तेरे साथ धोखा कर रहा है।"
जग्गा रुका।
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