Spirit of a Fighter – Chapter 893
उसकी उँगलियाँ मिट्टी में धँसीं। मैंने भी हाथ बढ़ाया।
दोनों खोदने लगे। मिट्टी उड़ रही थी। और भीड़ की साँसें रुकी हुई थीं।
जग्गा की उँगली किसी चीज़ से टकराई। लोहे जैसी आवाज़ आई — टन।
वो रुका।
"कुछ है," उसने कहा।
मैंने और गहरा खोदा। मेरी उँगलियों में एक धातु का कोना फँसा। मैंने उसे खींचा।
एक छोटी लोहे की डिबिया निकली। जंग लगी। ऊपर से मिट्टी से भरी। और उसके ढक्कन पर एक निशान खुदा था — एक शीशी का निशान।
मेरे पेट में ठंडी गाँठ बनी।
मैंने डिबिया खोली। अंदर काग़ज़ थे। मुड़े हुए। और उनके ऊपर एक छोटी पीली शीशी — खाली।
मैंने काग़ज़ निकाले। खोले।
और भीड़ में से एक आवाज़ आई — सुक्खी बुआ की, जो हमेशा सबसे पहले सब कुछ देख लेती है।
"अरे! वो तो हरनाम ठेकेदार की लिखाई है!"
मैंने काग़ज़ पलटा। ऊपर तारीख़ थी। कोई बीस साल पुरानी। और नीचे लिखा था — "आज का पानी। पहला गिलास। जगदीश।"
मेरे हाथ काँपे।
मैंने अगला काग़ज़ खोला। "दूसरा गिलास। लुट्टन का चाचा। तीसरा दिन।"
फिर अगला। "पाँचवाँ दिन। भवानी सिंह।"
मेरी आँखों के सामने अक्षर धुँधले हो गए।
जग्गा मेरे पास खड़ा था। उसने भी देखा। उसने धीरे से कहा, "ये… ये मेरे पिता का नाम है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तेरे पिता जगदीश?" मैंने पूछा।
जग्गा ने सिर हिलाया। उसकी आँखें सूखी थीं, पर उनमें वो खालीपन था जो आँसुओं के बाद आता है।
"वो मरे," जग्गा ने कहा। "मैं दस साल का था। कहा गया कि कमज़ोरी से मरे। दम नहीं रहा उनमें।"
मैंने काग़ज़ उठाया। जग्गा को दिया।
"अब भी कहता है कि कमज़ोरी से मरे?"
जग्गा ने काग़ज़ पढ़ा। उसके होंठ हिले — बिना आवाज़। फिर उसके हाथ काँपने लगे। फिर उसने काग़ज़ मेरे हाथ से छीन लिया। उसे चीरने लगा।
"झूठ!" वो चिल्लाया। "ये सब झूठ है!"
पर उसकी आवाज़ टूट रही थी।
मैंने उसका हाथ पकड़ा। "जग्गा। रुक।"
वो रुका। उसकी साँस फूल रही थी। और उसकी आँखों से पानी आ गया — पहली बार। पूरी भीड़ के सामने।
"मेरे पिता," वो फुसफुसाया। "मेरे पिता ने ये पिया था।"
मैंने सिर हिलाया।
"और तू भी पी रहा है," मैंने कहा।
जग्गा ने अपनी जेब में हाथ डाला। एक शीशी निकाली। वही पीली शीशी। आधी भरी। उसने उसे देखा। ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रहा हो।
फिर उसने शीशी उठाई और मिट्टी में पटक दी।
शीशी टूटी। पानी बिखरा। और वो पानी मिट्टी में चू गया।
भीड़ में से एक आवाज़ आई — भैरव की। "जग्गा! तू पागल हो गया है!"
पर जग्गा ने पलटकर उसकी तरफ़ नहीं देखा।
वो मेरी तरफ़ देख रहा था।
"तू जानता था?" उसने पूछा। "कब से?"
"आज सुबह," मैंने कहा। "तेरी साँस से।"
जग्गा ने अपनी आँखें बंद कीं। फिर खोलीं। और उसने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने उसे पकड़ा।
उसकी पकड़ कसी हुई थी। मजबूत। ऐसी पकड़ जो हारने वाले की नहीं होती।
भैरव मंच पर खड़ा हो गया। उसकी कुर्सी पीछे गिर गई — धड़ाम। "ये मुकाबला है! तुम दोनों लड़ो! मैं मैनेजर हूँ! मेरे अखाड़े में—"
"तेरे अखाड़े में?" रणवीर सिंह की आवाज़ आई।
भीड़ चुप हुई।
रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर आगे बढ़ाई। धीरे-धीरे। और उनका चेहरा वो नहीं था जो अब तक था। उनकी आँखों में वो आग जल रही थी जो बीस साल से बुझी हुई थी।
"ये अखाड़ा तेरा कब से हो गया, भैरव?" उन्होंने पूछा। "ये अखाड़ा मेरे पिता ने बनाया था। फिर मैंने सँभाला। और मैंने तुझे यहाँ नौकरी पर रखा था — नौकरी पर। मालिक नहीं बनाया था।"
भैरव ने माइक पकड़ा। उसका हाथ काँप रहा था।
"रणवीर जी, आप बीमार हैं। आपको आराम—"
"मैं बीमार नहीं हूँ," रणवीर सिंह ने कहा। "मैं बीस साल से ज़हर खा रहा हूँ। और तू मुझे हर सुबह वो गिलास खुद पकड़ाता था। याद है?"
भीड़ में से आवाज़ें आने लगीं। किसी ने कहा "क्या?", किसी ने कहा "हे भगवान।"
भैरव ने एक कदम पीछे लिया। उसका चेहरा पहली बार बदल रहा था। मीठी आवाज़ गई। ठंडी आँखें गईं। अब सिर्फ़ डर था।
"मेरे पास सबूत हैं," रणवीर सिंह ने कहा। "बीस साल के। हर गिलास का हिसाब। हर मौत का। हरनाम ने सब लिखकर रखा है। उसने सोचा कि उसकी कॉपी सुरक्षित है। पर आज ये मिट्टी वो सब बाहर ले आई जो तूने गाड़ा था।"
मैंने अपना हाथ ऊपर उठाया। काग़ज़ों की गड्डी भीड़ की तरफ़ उठाई।
"ये सबूत हैं!" मैंने चिल्लाया। "हरनाम के लिखे हुए। हर पहलवान का नाम। हर गिलास का दिन। और उनका अंजाम।"
भीड़ में से एक आदमी आगे आया। बूढ़ा। सफ़ेद दाढ़ी। उसने काग़ज़ देखा और उसकी आँखें भर आईं।
"मेरा बेटा," उसने कहा। "मेरा बेटा भी इसी लिस्ट में है। उसने भी ये पानी पिया था।"
फिर दूसरा आदमी आया। फिर तीसरा।
और भैरव — भैरव मंच से नीचे उतरने लगा।
"रुक!" मैंने चिल्लाया।
पर वो नहीं रुका।
वो भीड़ की तरफ़ भागा। लोगों को धक्के देता हुआ। कोई उसे रोक नहीं रहा था — सब हैरान थे।
मैं उसकी तरफ़ भागा।
पर जग्गा पहले पहुँच गया।
उसने भैरव का रास्ता रोक लिया। अपने दोनों हाथ फैलाए। उसकी साँस फूल रही थी, उसका घुटका दर्द कर रहा था, पर वो खड़ा था।
"तूने मेरे पिता को मारा," जग्गा ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी पर साफ़। "तूने मुझे उनका ज़हर पिलाया। और मैं तेरे लिए लड़ता रहा। बीस साल। मैं तेरा कुत्ता बना रहा।"
भैरव ने उसे धक्का दिया। जग्गा लड़खड़ाया पर गिरा नहीं।
"हट जा," भैरव ने कहा। "हट जा, जग्गा। तेरे पास कुछ नहीं है। न सबूत, न गवाह।"
"मेरे पास मैं हूँ," जग्गा ने कहा।
और उसने भैरव का हाथ पकड़ लिया।
भैरव ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की। पर जग्गा की पकड़ मज़बूत थी — फिर भी, ज़हर से टूटी हुई थी।
अब तक मैं भी पहुँच गया। मैंने भैरव के दूसरे हाथ को पकड़ा।
कालू काका दौड़कर आए। उन्होंने भैरव की कमर से चाबियों का गुच्छा खींच लिया — वो गुच्छा जो हमेशा वहीं बंधा रहता था।
"अब इनका इस्तेमाल होगा," कालू काका ने कहा।
भैरव ने एक चीख निकाली — गुस्से की, डर की, हार की। और वो अपने घुटनों पर गिर गया।
उसकी सोने की चेन मिट्टी में गिरी। उसकी लाल धोती मिट्टी से भीग गई। और उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें, जिन पर तेल लगा रहता था, अब धूल से भरी थीं।
भीड़ ने एक साथ साँस ली — ऐसी आवाज़ जैसे कोई बहुत देर से रुका हुआ दरवाज़ा खुल गया हो।
मैंने भैरव को घुटनों के बल मिट्टी में देखा। और मुझे राहत नहीं मिली। कुछ और मिला — एक अजीब सा खालीपन। जिस आदमी से मैंने बीस साल की कहानी सुनी थी, उसके बेटे ने मुझे धमकाया था, वो अब मिट्टी में था। और मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ।
फिर मैंने भीड़ में देखा। उस आदमी को ढूँढ़ा। जले होंठ वाला। काला कपड़ा।
वो कहीं नहीं था।
भीड़ सब तरफ़ थी। पर वो आदमी नहीं।
मेरी नाक ने खोजा। नीम का तेल, तंबाकू, मिट्टी, पसीना — पर वो शीशी वाली मीठी गंध नहीं थी।
वो गया। अपनी शीशी दिखाकर गया। और मैंने उसे जाने दिया।
मैंने जग्गा की तरफ़ देखा। वो अभी भी भैरव का हाथ पकड़े खड़ा था। उसके हाथ काँप रहे थे। उसका चेहरा पसीने से भीगा था। पर वो छोड़ नहीं रहा था।
"जग्गा," मैंने कहा। "छोड़ दे। अब पुलिस—"
"नहीं," जग्गा ने कहा। उसकी आवाज़ में अब भी वो कड़वाहट थी, पर अब वो गुस्से की नहीं, दर्द की थी। "ये मेरा है। ये आदमी मेरे पिता का हत्यारा है।"
"और मेरे पिता का भी," मैंने कहा।
जग्गा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरे पिता?" उसने पूछा।
"भवानी सिंह," मैंने कहा। "और मेरे पालक पिता शेर सिंह। दोनों इसी लिस्ट में हैं।"
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