Spirit of a Fighter880 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 880

7 min read November 5, 2026

बिसरा दास दरवाज़े के पास खड़े थे। उन्होंने अपनी जेब से वो जली किताब निकाली और उसे धीरे से खोला। पन्ने जलकर भूरे हो चुके थे, किनारे मुड़े हुए, और बीच में कुछ जगह ऐसी थी जहाँ स्याही पिघल गई थी।

"ये आख़िरी पन्ना है," बिसरा दास ने कहा। "बाकी सब जल गया। पर ये बच गया क्योंकि भवानी सिंह ने इसे लोहे की डिबिया में बंद करके मिट्टी में गाड़ दिया था।"

उन्होंने पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा। अक्षर काँपते हुए थे, जैसे लिखते वक़्त हाथ काँप रहा हो। मैंने पढ़ा —

"हड्डियाँ उसी कुएँ की तलहटी में हैं जहाँ चंदन सिंह को गिराया गया था। पर उनके ऊपर चूना डाला गया है ताकि गंध न आए। जो ढूँढेगा, उसे चूने के नीचे जाना होगा।"

मैंने पन्ना नीचे किया और आँखें बंद कर लीं। और तभी मुझे याद आया। उस रात, जब मैं पहली बार कुएँ में उतरा था, रामदीन को ढूँढ़ने — मुझे एक गंध आई थी जो मैंने पहचानी नहीं थी। मैंने सोचा था वो सीलन है। पर वो चूना था। जला हुआ चूना।

"मुझे याद है," मैंने धीरे से कहा। "उस रात कुएँ में चूने की गंध आई थी। मैंने सोचा दीवारों से आ रही है।"

"वो दीवारों से नहीं आ रही थी," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ दरवाज़े से आई। "वो तलहटी से आ रही थी। मैंने भी सोचा था चूना है। पर उस दिन मुझे लगा कि कुआँ कुछ कह रहा है।"

टिंकू ने अपना सिर खुजाया। उसके हाथ में बर्फ़ी का डिब्बा अब भी था, और उसने एक टुकड़ा मुँह में डाल लिया था, जैसे डर को मीठा करके निगलना हो।

"भाई, एक बात कहूँ?" वो बोला। "कुआँ, चूना, हड्डियाँ… ये सब सुनकर मेरे पेट में जो हो रहा है, वो बर्फ़ी से ठीक नहीं हो रहा।"

"तो मत आ," मैंने कहा।

"मैं नहीं आऊँगा तो तू अकेला जाएगा," टिंकू ने कहा, "और अकेले जाने से तू मर जाएगा, और फिर मैं तेरी माँ को क्या बताऊँगा? कि तेरा दोस्त बर्फ़ी खा रहा था जब तू कुएँ में मर रहा था?"

मीरा ने टिंकू की तरफ़ देखा और उसके होंठ हिले — पहली बार उस रात में उसके चेहरे पर कुछ नरम आया।

"पहले माँ और गुड़िया," मीरा ने कहा। "वो अभी भी हवेली में हैं। जब तक हम कुएँ में जाएँगे, नंदकिशोर उन्हें कहीं और नहीं भेज देगा, इसकी कोई गारंटी नहीं।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो ठीक कह रही थी। मेरा दिल कुएँ की तरफ़ खींच रहा था, पिता की हड्डियों की तरफ़, पर मेरा दिमाग़ कह रहा था कि अगर माँ और गुड़िया खो गईं तो हड्डियाँ उठाकर भी क्या करूँगा?

"टिंकू," मैंने कहा। "तू मीरा के साथ हवेली जा। माँ और गुड़िया को लेकर अखाड़े पहुँच। कालू काका, तू भी उनके साथ।"

टिंकू ने बर्फ़ी का डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "एक टुकड़ा खा ले। कुएँ में जाने से पहले।"

मैंने एक टुकड़ा लिया। मीठा था, और उसमें केसर की गंध थी। जब मैंने उसे मुँह में रखा, तो मुझे अपनी बहन की याद आई — गुड़िया, जो हर जीत के बाद पूछती थी "भैया, आज क्या जीता?"

"अगर तू कुएँ में गया और नहीं लौटा," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ अब हल्की नहीं थी, "तो मैं तेरी माँ को क्या बताऊँगा?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। मेरे मुँह में अब भी बर्फ़ी थी। "बता देना कि मैं खीर खाने आ रहा हूँ।"

टिंकू हँसा — एक छोटी, टूटी हुई हँसी — और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोला, "तो जल्दी आइयो। खीर ठंडी न हो जाए।"

वो मुड़ा और मीरा और कालू काका के साथ दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मीरा ने जाते वक़्त मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो बात थी जो वो कभी ज़ोर से नहीं बोलती — कि मैं लौटूँ।

मैं चंदन के साथ अकेला रह गया। गंगा देवी दरवाज़े पर खड़ी थीं, बाहर देख रही थीं, जैसे किसी और के आने का इंतज़ार कर रही हों।

"कुएँ में उतरने का रास्ता तुम्हें पता है?" चंदन ने पूछा।

"हाँ। सीढ़ियाँ हैं।"

"वो सीढ़ियाँ तलहटी तक जाती हैं," उसने कहा। "पर जहाँ हड्डियाँ हैं, वो सीढ़ियों से नहीं मिलेंगी। उस जगह तक रेंगकर जाना पड़ेगा। एक सुराख है, जो पानी के नीचे जाता है। मैंने बीस साल पहले उसे देखा था, जब मैं उसी कुएँ में गिरा था।"

"और तुम उस सुराख से निकले कैसे?"

चंदन ने अपनी सिकुड़ी उँगलियों को देखा। "मैं उसमें से नहीं निकला। मुझे रामदीन ने निकाला। उसने मुझे पानी के नीचे से खींचा, तहखाने की सीढ़ियों तक ले गया, और वहाँ छोड़कर खुद वापस चला गया। वो कुएँ के नीचे रहता था। बीस साल। तब भी वो मुझे जानता था, और मैं उसे नहीं जानता था।"

मुझे रामदीन की याद आई — वो बूढ़ा, जो तहखाने में बीस साल बंद था और चिमनी से हवा लेता था। जिसने मुझे भवानी सिंह की कहानी बताई थी।

"रामदीन ने तुम्हें सुराख के बारे में बताया?"

"उसने मुझे बताया कि वहाँ कुछ है," चंदन ने कहा। "पर उसने ये नहीं बताया कि क्या है। उसने बस इतना कहा — 'जो नीचे गया, वो ऊपर नहीं आया।' उसके बाद मैंने वहाँ जाने की हिम्मत नहीं की। बीस साल तक नहीं की। और आज…"

उसकी आवाज़ रुक गई। उसने अपना जला हुआ हाथ उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"आज मैं तुझे रास्ता दिखाऊँगा, पर नीचे तू अकेला जाएगा। क्योंकि मेरा शरीर अब उतना नहीं सह सकता। पर एक बात याद रखना — जब तू नीचे पहुँचे, तो पहले अपनी आँखें बंद करके साँस लेना। क्योंकि वहाँ की हवा में चूना है, और अगर तू सीधे आँखें खोलकर जाएगा, तो तेरी आँखें जल जाएँगी।"

"और अगर मैं साँस लेता हूँ तो?" मैंने पूछा।

"तो तेरे फेफड़ों में भी चूना जाएगा," उसने कहा। "इसलिए कपड़ा भिगोकर मुँह पर बाँधना। मीरा के पास दवा है?"

"पास थी। वो हवेली गई है।"

चंदन ने अपनी कमर से एक मैला कपड़ा निकाला। "ये ले। इसे पानी में भिगोकर मुँह पर बाँध लेना। बीस साल से मैं इसे अपने पास रखे हुए हूँ। इसी से मैं उस रात बचा था।"

मैंने कपड़ा लिया। वो सख़्त था, और उसमें वही गंध थी — चूना और धुआँ।

बाहर निकले तो हवा और ठंडी हो गई थी। श्मशान की कुटिया से लेकर नहर तक का रास्ता अब और भी अंधेरा लग रहा था। गंगा देवी मेरे साथ चलीं, चंदन मेरे पीछे-पीछे, और बिसरा दास सबसे पीछे, अपनी छड़ी के सहारे।

"चंदन," मैंने चलते-चलते पूछा, "तुमने मुझे तीन काग़ज़ दिए। पहला आँगन में, दूसरा जेब में। तीसरा?"

"तीसरा मैंने तेरी माँ के आँचल में रखा था," उसने कहा।

मेरे पैर रुक गए। "क्या कहा?"

"उस दिन जब भैरव तेरे आँगन में आया था, तब। मैं दीवार के पीछे था। तेरी माँ ने मुझे देख लिया था। उसने कुछ नहीं कहा, बस अपनी आँखों से इशारा किया — कि जो रखना है रख दे। मैंने काग़ज़ उसके आँचल में रख दिया।"

"उस काग़ज़ पर क्या लिखा था?"

चंदन ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "लिखा था — 'तेरे बेटे को बचाने का एक ही रास्ता है। उसे भवानी की शीशी मत देना।'"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। "माँ ने वो काग़ज़ कभी मुझे नहीं दिखाया।"

"क्योंकि उसने उसे जला दिया था," चंदन ने कहा। "मैंने उसे जलते देखा था। उस रात, चूल्हे में। और जब वो जल रहा था, तब तेरी माँ रो रही थी। पर वो तुझे बताने नहीं आई, क्योंकि अगर तू जानता कि मैं ज़िंदा हूँ, तो तू मुझे ढूँढ़ने निकल पड़ता, और ठाकुर तुझे पकड़ लेता।"

मैंने आँखें बंद कर लीं। माँ ने बीस साल तक ये सब अकेले सहा था। ये सब — भवानी की मौत, शेर सिंह का ज़हर, मेरा जन्म, चंदन का जिंदा होना — और मैंने उस पर चिल्लाया था। नहर के किनारे, मीरा के सामने, मैंने उस पर चिल्लाया था।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho