Spirit of a Fighter – Chapter 879
मैंने उसकी आँखों में देखा। उसके चेहरे पर जो जली खाल थी, उस पर चाँद की रोशनी पड़ रही थी, और वो किसी पुराने पत्थर पर खुदे नाम जैसी लग रही थी।
“मैं क़सम खाता हूँ,” मैंने कहा। “मेरे पिता की हड्डियाँ मैं दफ़नाने के लिए नहीं उठाऊँगा। मैं उन्हें उस आदमी के सामने उठाऊँगा जिसने उन्हें जलाया।”
“और अगर उस आदमी के पास तेरी माँ हो?” बिसरा दास ने पूछा।
मेरा गला सूख गया। “मेरी माँ और बहन हवेली में बंद हैं। मैं उन्हें पहले निकालूँगा। फिर सच।”
“अगर दोनों एक साथ न हो सकें?”
मैं चुप हो गया। ये सवाल वो नहीं पूछ रहा था। ये सवाल मेरे भीतर से आ रहा था, मेरे ही डर की आवाज़ में। मैंने अपनी मुट्ठी भींची और महसूस किया कि मेरी हथेली में पसीना आ गया है।
“तो मैं वो रास्ता ढूँढूँगा जिसमें दोनों हो सकें,” मैंने कहा। “और अगर वो रास्ता न मिले, तो मैं वो रास्ता बनाऊँगा।”
बिसरा दास ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने किताब मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
“पढ़,” उसने कहा।
मैंने पन्ना पलटा। काग़ज़ भुरभुरा था, छूने से टूटने को था। उस पर किसी की लिखाई थी — पतली, झुकी हुई, जैसे बीमार हाथ से लिखी गई हो। ऊपर एक तारीख़ थी — बीस साल पुरानी। और उसके नीचे लिखा था:
“भवानी सिंह की हड्डियाँ श्मशान की उस कुटिया के नीचे गाड़ी गई हैं जहाँ दीया जलता है। कुटिया के ईंट वाले चूल्हे के नीचे, तीन हाथ गहरा। ये हड्डियाँ किसी को नहीं देना। जो इन्हें उठाएगा, वो मरेगा।”
मैंने साँस रोक ली।
“ये लिखाई,” मैंने धीरे से कहा, “ये नंदकिशोर की है।”
“हाँ,” बिसरा दास ने कहा। “उसने ये लिखा था ताकि अगर कोई किताब बची रह जाए, तो वो डरकर हड्डियाँ न उठाए।”
“और आपने इसे बचाया?”
“मैंने इसे इसलिए बचाया,” उसने कहा, “ताकि तेरे पिता की हड्डियाँ उसी जगह से निकलें जहाँ नंदकिशोर ने लिखा है। ताकि जब तू उन्हें उठाए, तो नंदकिशोर के अपने शब्द तेरे हाथ में सबूत बन जाएँ।”
मैंने किताब बंद की और उसे अपनी कमर में खोंस लिया। फिर मैंने पीछे मुड़कर देखा। मीरा, टिंकू, कालू काका और गंगा देवी — चारों खड़े थे। और उनके पीछे, कुटिया का दरवाज़ा खुला था जिसमें से हल्की पीली रोशनी आ रही थी।
“अंदर कौन है?” मैंने पूछा।
“जो तेरा इंतज़ार कर रहा है,” बिसरा दास ने कहा। “पर एक बात सुन ले। अंदर जाने से पहले अपने हाथ देख ले। क्योंकि जो अंदर है, वो तेरे हाथों से ज़्यादा तेरे सब्र को परखेगा।”
मैंने अपनी हथेलियाँ खोलीं। उन पर चक्की के छाले थे, ईंटों की रगड़ थी, और अब उन पर उस जली किताब की राख लगी थी। ये वही हाथ थे जिन्हें मेरी बहन ने मिट्टी भरकर मज़बूत किया था। ये वही हाथ थे जिन्हें मेरी माँ ने चक्की के पीछे देखकर कहा था — “तेरे पापा के हाथ भी ऐसे ही थे।”
“मीरा,” मैंने कहा। “तू मेरे पीछे। टिंकू, तू दरवाज़े पर रह। काका, लालटेन ऊँची रखो।”
“और मैं?” गंगा देवी बोलीं।
“आप मेरे साथ,” मैंने कहा। “क्योंकि जो अंदर है, वो आपको जानता है। और मुझे लगता है कि वो आपसे डरता भी है।”
गंगा देवी ने मेरी तरफ़ देखा और उनके होंठ हिले, जैसे वो कुछ कहना चाहती हों पर रुक गईं। फिर उन्होंने अपना सिर ऊँचा किया और कहा, “चल।”
कुटिया का दरवाज़ा छोटा था। मुझे झुककर अंदर जाना पड़ा। अंदर की हवा बाहर से ज़्यादा ठंडी थी, और उसमें धुआँ, घी और गीली मिट्टी की गंध थी। बीच में एक ईंट का चूल्हा था जिस पर छोटा दीया जल रहा था। दीये की लौ सीधी थी, हिल नहीं रही थी — जबकि बाहर हवा चल रही थी और दरवाज़ा खुला था।
और चूल्हे के पीछे, अंधेरे में, एक आदमी बैठा था। उसका सिर झुका हुआ था, हाथ गोद में, और वो इतना स्थिर था कि पहले मुझे लगा वो मूर्ति है। फिर उसने सिर उठाया।
उसका चेहरा आधा जला हुआ था। एक आँख की जगह सिकुड़ी हुई खाल थी। दूसरी आँख मुझमें लगी थी, और उसमें वो चीज़ थी जो मैंने कभी किसी में नहीं देखी — बीस साल का इंतज़ार।
“तू आ गया,” उसने कहा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी, जैसे बहुत दिनों से किसी ने पानी न पिया हो। “मुझे पता था तू आएगा। ख़त मिला तुझे?”
“कौन-सा ख़त?” मैंने पूछा।
उसने मुश्किल से मुस्कुराने की कोशिश की। “जो मैंने तेरी जेब में रखा था। जब तू मेरे पास से गुज़रा था। उस रात। सुरंग में। तूने मुझे देखा नहीं। पर मैंने तुझे देखा।”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “तुम थे? सुरंग में? वो परछाईं?”
“मैं बीस साल से तेरे पीछे-पीछे चल रहा हूँ, वीर सिंह,” उसने कहा। “तेरे पिता ने मुझे तेरी क़सम दी थी। मैंने निभाई। अब तेरी बारी है।”
गंगा देवी ने मेरे कंधे के पीछे से आवाज़ दी, “चंदन।”
और वो आदमी हिल गया। उसका नाम सुनकर उसकी आँख में पानी आ गया।
“मौसी,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई, “तूने मुझे पहचान लिया।”
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"मौसी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई, "तूने मुझे पहचान लिया।"
गंगा देवी आगे बढ़ीं। उनके कदम दीये की लौ के साथ-साथ हिल रहे थे। उन्होंने चंदन के जले चेहरे को देखा, फिर धीरे से उसके सिर पर हाथ रखा।
"तू ज़िंदा है," वो फुसफुसाईं। "मैंने सोचा तू भी उनके साथ जल गया।"
"जलना तो था, मौसी," चंदन ने कहा। "पर भवानी सिंह ने मुझे आग से नहीं, पानी से बचाया था। उस रात उन्होंने मुझे कुएँ में गिरा दिया। जलते हुए। और कुएँ के पानी ने आग बुझा दी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका आधा चेहरा ऐसा था जैसे मोम पिघल गया हो, और उस पर पुरानी खाल खिंची थी। एक हाथ की उँगलियाँ सिकुड़ी हुई थीं। पर उसकी आवाज़ में जो था, वो जले हुए चेहरे से बड़ा था।
"तुम मेरे जेब में काग़ज़ रखते थे?" मैंने पूछा। "दो बार?"
"तीन बार," उसने कहा। "तीसरी बार तूने उसे पानी में फेंक दिया। मैं नहर के किनारे खड़ा देख रहा था। तू रो रहा था। मैं तेरे पास नहीं आया क्योंकि उस रात तेरे पीछे ठाकुर के आदमी थे।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। "तो तू मेरे पीछे-पीछे था और आया नहीं?"
"मैं आया तो तू मर जाता," चंदन ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक थकान थी जो बीस साल से जमी हुई थी। "तेरे पिता ने मुझे तेरी जान बचाने की क़सम दी थी, अपनी नहीं। और जान बचाने का मतलब ये नहीं कि सामने खड़े हो जाओ। कभी-कभी जान बचाने का मतलब होता है — दूर रहना।"
मैंने चूल्हे के पास रखी मिट्टी को देखा। वही लाल मिट्टी, जो अखाड़े में सींची जाती है। मैंने घुटने टेके और उसे अपनी हथेली पर उठाया। मिट्टी ठंडी थी, पर उसमें एक गंध थी — घी, धुआँ और कुछ और, जो मैंने पहले महसूस किया था तहखाने में। पिता की गंध।
"मैं क़सम खाता हूँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपने कानों में भारी लगी। "इस मिट्टी की, इस दीये की, और अपने पिता की हड्डियों की — मैं उन्हें सच के लिए उठाऊँगा। बदले के लिए नहीं।"
चंदन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी एक आँख में पानी था, और दूसरी जगह सिकुड़ी खाल पर भी कुछ चमका।
"भवानी सिंह ने भी यही क़सम खाई थी," उसने कहा। "उसी चूल्हे के पास, उसी मिट्टी को हाथ में लेकर। और उस दिन के बाद उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया कि उन्हें क्या पता था। क्योंकि बताने का मतलब था — औरतें मरतीं, बच्चे मरते।"
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