Spirit of a Fighter863 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 863

7 min read November 5, 2026

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं चुप खड़ा रहा।

"उसने कहा — 'तू मेरे पिता को बचाने की बात करता है? तूने उसे इतना शर्मिंदा किया कि उसने खुद को मार डाला। अगर तूने उसे मैदान में नहीं हराया होता, तो वो ज़िंदा होता।' उसने काग़ज़ उठाया और फाड़ने लगा। मैंने उसे रोका। फिर उसने काग़ज़ जेब में डाल लिया और चला गया। और उसके बाद कभी नहीं पढ़ा। मैं जानता हूँ कि नहीं पढ़ा, क्योंकि अगर पढ़ लिया होता, तो वो बीस साल ये सब नहीं करता।"

मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।

"तो ये काग़ज़ बीस साल उसके पास था?"

"नहीं। उसने उसी रात इसे वापस मेरे पास भेज दिया। किसी के हाथ। कोई संदेशा भी नहीं। बस काग़ज़ लपेटकर मेरे दरवाज़े पर रख दिया।" रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने इसे कभी नहीं खोला। मुझे डर था कि उसमें क्या लिखा है। भवानी ने जो लिखा था, वो मैंने कभी पढ़ा नहीं। आज पहली बार पढ़ रहा हूँ, तेरे साथ।"

उनकी आवाज़ भर आई। उन्होंने काग़ज़ को अपने सीने से लगा लिया, और उनके कंधे हिलने लगे। एक बुज़ुर्ग आदमी, जो व्हीलचेयर पर बैठा है, और जिसने बीस साल एक काग़ज़ को बंद रखा, क्योंकि उसे डर था कि उसके दोस्त ने क्या लिखा होगा।

"मैंने इसे उस रात ही जला देना चाहा था," उन्होंने कहा, और रोते हुए हँसे भी। "पर मेरे हाथ नहीं उठे। मैंने सोचा — भवानी का हाथ है इस पर। कैसे जलाऊँ?"

तभी बाहर से पैरों की आवाज़ आई, और टिंकू अंदर घुसा। उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी, और उसके सिर पर टोपी टेढ़ी थी, और उसकी आँखों में वो नींद थी जो अभी पूरी नहीं खुली थी।

"भाई!" उसने चिल्लाकर कहा। "आज मुकाबले का दिन है और तू यहाँ बैठा रो रहा है? मैंने सुबह से तेरे लिए खीर बचाई थी, पर आज नहीं बचाऊँगा। आज सबको खिलाऊँगा। पूरे मैदान को।"

रणवीर सिंह ने अपनी आँखें पोंछीं और टिंकू की तरफ़ देखा।

"पूरे मैदान को?" उन्होंने पूछा।

"पूरे मैदान को," टिंकू ने कहा, और अपनी डिब्बी ऊपर उठाई। "आज मेरी मिठाई में नमक नहीं आएगा। आज मैंने तीन बार चखा है।"

मैं हँस पड़ा। पहली बार उस सुबह। और मेरी हँसी अजीब निकली, क्योंकि मेरी आँखें अभी भी गीली थीं।

"तीन बार चखा?" मैंने पूछा। "तो बचा क्या?"

"तेरे लिए बचा है," टिंकू ने कहा, और उसने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "खा। आज तू खाली पेट नहीं लड़ेगा।"

मैंने डिब्बी खोली। उसमें गरम बर्फ़ी थी, और उसकी गंध में घी था और इलायची थी। मैंने एक टुकड़ा मुँह में रखा, और मेरा गला भर आया, पर इस बार अच्छे से।

माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने अंदर आकर रणवीर सिंह को देखा। दोनों ने एक-दूसरे को देखा, और उनकी आँखों में वो बात थी जो बीस साल से अनकही थी। रणवीर सिंह ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और माँ ने उनका हाथ थाम लिया।

"सरस्वती," रणवीर सिंह ने कहा। "मैं उस रात तेरे पास नहीं आया। मुझे आना चाहिए था।"

"तुम आए थे," माँ ने कहा। "तुम दरवाज़े पर खड़े थे, और मैंने तुम्हें अंदर नहीं आने दिया। मैंने सोचा था कि तुम भवानी के दोस्त हो, इसलिए तुम्हें देखकर मुझे और दुख होगा।" उन्होंने रणवीर सिंह का हाथ दबाया। "वो मेरी गलती थी।"

रहने दो," रणवीर सिंह ने कहा। "आज बेटे का दिन है। पुरानी बातें कल करेंगे।"

मैं घर से निकला तो गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। उसके हाथ में वो थैली थी जो वो हमेशा रखती थी, और उसकी आँखें लाल थीं। वो रो रही थी, पर रोने की कोशिश छुपा रही थी, और ये मुझे पता था क्योंकि उसके होंठ काँप रहे थे और वो अपनी कॉपी को सीने से लगाए खड़ी थी।

"भैया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "आज तुम जीतोगे ना?"

मैं उसके पास गया और उसके सिर पर हाथ रखा।

"गुड़िया," मैंने कहा। "आज मैं जीतने नहीं जा रहा। आज मैं अपने पापा का नाम वापस लेने जा रहा हूँ।"

उसने थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये अखाड़े की मिट्टी है। मैंने आज सुबह लाई। बहुत सुबह। कालू काका ने देखा भी नहीं।"

मैंने थैली ली और उसे अपनी जेब में डाल लिया। फिर मैंने उसे गले लगा लिया। उसका शरीर छोटा था, और उसकी चोटियाँ मेरी छाती से चिपक गईं।

"तू जब जीतेगा," उसने मेरे कान में कहा, "तो मैं सबको मिठाई बाँटूँगी। पर एक डिब्बी अपने लिए रखूँगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने भी तेरे लिए मिट्टी लाई है," उसने कहा। "मेहनत की मिठाई मेरी।"

मैंने माँ का हाथ पकड़ा और उन्हें मैदान की तरफ़ चलने को कहा। पर पहले, एक जगह जाना था। मैंने माँ को रास्ते में रुकने को कहा और तहखाने की तरफ़ चल दिया। कुएँ की सीढ़ियाँ उतरते वक़्त मेरी साँस अंदर थी। और नीचे पहुँचकर मैंने अपना हाथ मिट्टी पर रख दिया।

मिट्टी ठंडी थी। उसमें वो गंध थी जो सिर्फ़ यहाँ होती है — गीली, भारी, और कुछ पुरानी। मैंने अपनी हथेली मिट्टी में दबाई और आँखें बंद कर लीं।

"पिताजी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ तहखाने में गूँजी। "आज तुम्हारा नाम वापस लाना है। और मैं तुम्हारी तरह किसी को बचाने के लिए नहीं, सच को सामने लाने के लिए लड़ूँगा।"

मिट्टी से कोई जवाब नहीं आया। पर मेरे हाथ के नीचे वो सख़्त थी, और मुझे लगा कि वो मेरा हाथ पकड़ रही है।

मैंने मिट्टी से हाथ भरकर अपने माथे पर लगाया। माथे पर ठंडक उतरी, और मेरी आँखें खुल गईं।

मैं सीढ़ियाँ चढ़कर बाहर आया, और तभी मेरी नज़र दरवाज़े पर पड़ी। कुएँ के दरवाज़े पर। वहाँ एक चिट्ठी रखी थी, ज़मीन पर, पत्थर से दबी हुई।

मैंने उसे उठाया। काग़ज़ ताज़ा था। स्याही अभी गीली नहीं थी, पर काग़ज़ पर अभी भी उँगलियों की गर्मी बची थी। और उस पर लिखा था, बड़े अक्षरों में, मोटी लिखाई में।

"तेरी माँ की जान आज मुकाबले के मैदान में दाँव पर है। अगर तू जीता, तो वो मरेगी।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने चिट्ठी पलटी। नीचे कोई नाम नहीं था, पर काग़ज़ के कोने पर गीली मिट्टी का निशान था, और वो निशान चार उँगलियों का था। मैंने अपनी उँगलियाँ उस पर रखीं। फिर मैंने उसे सूँघा।

गीली मिट्टी। पर उसमें एक अलग गंध थी — वो तेल जो ठाकुर महेंद्र सिंह के हाथों पर लगा था। वो सस्ता तेल, जिसमें कुछ मीठा-सा था, और वो गंध जो कल हवेली में मेरे हाथों पर लगी थी जब मैंने उसके आदमी को पकड़ा था।

ठाकुर। महेंद्र सिंह। जो कल पकड़ा गया था। जिसे कालू काका ने कुदाल से रोका था। जिसे मैंने बाँधकर हवेली के बाहर छोड़ा था।

मैंने चिट्ठी अपनी जेब में डाली और तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया। ऊपर पहुँचकर मैंने देखा कि माँ अभी भी रास्ते पर खड़ी थीं, और वो मेरी तरफ़ देख रही थीं। और उनके पीछे, दूर, अखाड़े के फाटक पर भीड़ जमा हो रही थी।

मैंने माँ की तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। पर मेरे चेहरे से सब पढ़ लिया गया, क्योंकि वो मेरे पास आईं और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। और ये झूठ मुझे अपने ही गले में चुभा।

पर मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा। मैंने उन्हें अपने पास खींचा और उनका हाथ कसकर पकड़ लिया, और हम दोनों मैदान की तरफ़ चल पड़े।

पीछे तहखाने के दरवाज़े पर वो गीली मिट्टी सूख रही थी, और उस पर बने चार उँगलियों के निशान धीरे-धीरे धुँधले हो रहे थे, जैसे कोई उन्हें मिटा रहा हो।

और मुझे पता था कि आज मैदान में मुझे सिर्फ़ कुश्ती नहीं लड़नी थी। आज मुझे ये भी सोचना था कि जीतूँ तो माँ कैसे बचेगी — और हारूँ तो सच कैसे जीतेगा।

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