Spirit of a Fighter – Chapter 858
मैं उठ खड़ा हुआ। पानी से पैर निकाले, चप्पल पहनी। मीरा मेरे पीछे थी।
"काका? क्या हुआ?"
वो मेरे पास पहुँचे और पानी की तरह गिर पड़े — घुटनों पर। उनका चेहरा राख जैसा था।
"हवेली में आग लगी है," उन्होंने हाँफते हुए कहा। "धुआँ आसमान तक है, वीर। और नंदकिशोर ने… नंदकिशोर ने मुंशीजी की बेटी को बंधक बना रखा है।"
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन फिर हिली। पर इस बार मैंने उसे पकड़ लिया।
"कैसे पता चला?"
"मुंशीजी आए थे," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ फूट रही थी। "अभी। रोते हुए। बोले — 'मैंने तुम्हारे लिए ही उसे बंधक रखा था, वीर। अब वो उसे जला देगा।' वो काग़ज़ दे गए हैं — उसके हस्ताक्षर वाला वही काग़ज़। और एक बात…"
"क्या?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने तहखाने में देखा था।
"वो बोले — 'नंदकिशोर ने कहा है कि अगर वीर हवेली आया, तो पहले मुंशीजी की बेटी जाएगी, फिर माँ, फिर गुड़िया। और फिर वो खुद आग में कूद जाएगा।'"
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी। उसकी पकड़ में ज़ोर था।
"ये जाल है, वीर," वो बोली। "वो चाहता है कि तू अकेला आए।"
"मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा। मैंने कालू काका का हाथ पकड़कर उन्हें उठाया। "काका, घर जाओ। माँ और गुड़िया को लेकर पंचायत के चबूतरे पर जाओ। वहाँ सबके सामने। कोई अकेला न रहे।"
"और तू?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी आँखों में देखा और सिर हिलाया — वो पहले से तैयार थी।
"मैं हवेली जाऊँगा," मैंने कहा। "पर अकेला नहीं।"
मैंने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला — वही जिस पर लिखा था कि माँ झूठ बोल रही है। मैंने उसे मुट्ठी में कसा, फिर खोला, और पानी में फेंक दिया। वो काग़ज़ हवा में एक बार घूमा और फिर पानी पर तैरने लगा। स्याही पानी में घुल गई।
"चलो," मैंने कहा।
हवेली का रास्ता पहले कभी इतना लंबा नहीं लगा था। हम तेज़ चले। रास्ते में टिंकू मिला — वो बैलगाड़ी लेकर आ रहा था, चेहरे पर धूल, आँखों में वो मुस्कान नहीं जो हमेशा रहती थी।
"मैंने सुना," उसने कहा, और मुझे रोका नहीं। "गाड़ी में बैठो।"
हम चढ़े। बैल तेज़ चला। रास्ते में गाँव वाले खेतों से निकलकर खड़े हो गए — उन्होंने भी धुआँ देखा था। किसी ने कुछ पूछा नहीं। बस देखते रहे।
हवेली दूर से दिखी। धुआँ सच में आसमान तक जा रहा था — काला, मोटा, और उसमें लाल रंग की लपटें। आग हवेली के पिछले हिस्से में लगी थी, वहीं जहाँ पुराना कुआँ था।
गाड़ी रुकी। मैंने छलाँग लगाई।
हवेली का सामने का दरवाज़ा खुला था। आँगन में कोई नहीं। बस आग की आवाज़ — कड़कड़, कड़कड़ — और लकड़ी के गिरने की गूँज।
मैंने गंध पकड़ी। धुएँ के नीचे, जले हुए लकड़ी के नीचे, एक और गंध थी। बादाम का तेल। और उसमें कुछ जो मैंने तहखाने में सूँघा था।
"वो अंदर है," मैंने कहा।
टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी। "भाई, इतना धुआँ है कि अंदर दम घुट जाएगा। हमें पानी चाहिए, कुछ चाहिए—"
"तू बाहर रुक," मैंने कहा। "अगर हम थोड़ी देर में न निकलें, तो गाँव वालों को लेकर आ।"
"वीर—"
"टिंकू।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "मेरी बात मान।"
उसका चेहरा टूटा। पर उसने सिर हिलाया और मेरी बाँह छोड़ दी। फिर उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक छोटी मिठाई की डिब्बी। उसने मेरी मुट्ठी में दी।
"ये खीर है," उसने कहा। "मैंने सुबह बनाई थी। ताकत आएगी।"
मैंने डिब्बी कमर में खोंसी और अंदर बढ़ा। मीरा मेरे साथ थी। उसने अपनी कुर्ता की जेब से एक कपड़ा निकाला और मुँह पर बाँध लिया, फिर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"तुम भी बाँधो।"
मैंने बाँधा। धुआँ मेरी आँखों में लगा। आग की गर्मी चेहरे पर पड़ी। मैं कुछ देख नहीं पा रहा था, बस गंध पकड़ रहा था — बादाम का तेल, और उसके नीचे, हल्का-सा, चंदन।
हवेली के पिछले हिस्से की तरफ़ बढ़ते वक़्त मुझे एक दरवाज़ा दिखा — आधा जला हुआ, और उसके पीछे से आवाज़ आई।
"वीर सिंह! अंदर आ जा। तेरा इंतज़ार ही कर रहा था।"
नंदकिशोर की आवाज़। मीठी, जैसे गुड़ की चाशनी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने आँखें बंद कीं और होंठ हिलाए — कुछ दुआ जैसा। फिर खोलीं और सिर हिलाया।
मैंने दरवाज़ा धक्का दिया। अंदर का नज़ारा मुझे रोक देता अगर मैं रुकता। छत के बीम जल रहे थे, और उनसे पिघला हुआ राल टपक रहा था। फ़र्श पर गिरकर वो फुफकारता था।
नंदकिशोर बीच में खड़ा था। उसके पीछे, एक लोहे के खंभे से बँधी, मुंशीजी की बेटी बैठी थी — छोटी, दस-ग्यारह साल की, आँखें फटी हुईं, मुँह पर कपड़ा बँधा। उसके गाल पर उँगलियों के निशान थे, लाल।
और नंदकिशोर के हाथ में मशाल थी। पर मशाल जल नहीं रही थी। बुझी हुई थी।
"देख," उसने मशाल उठाई। "आग मेरे हाथ में है। मुझे जलाने की ज़रूरत नहीं। मैं बस छोड़ता हूँ, और जल जाता है।"
मैंने एक कदम बढ़ाया। मेरी आँखें जल रही थीं।
"बच्ची को छोड़।"
"क्यों?" उसने सिर टेढ़ा किया। "ये तो मुंशी की बेटी है। मुंशी ने मेरे साथ धोखा किया। तेरे लिए। तो ये तेरी वजह से यहाँ है।"
"नंदकिशोर।" मेरी आवाज़ धुएँ में फट गई। "तेरे पास क्या बचा है? हवेली जल रही है। गाँव तेरे ख़िलाफ़ है। मुंशीजी ने काग़ज़ दे दिया।"
"काग़ज़?" वो हँसा। "काग़ज़ काग़ज़ होता है। मैं नहीं।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "मेरे पिता के बारे में।"
वो रुका। मशाल उसके हाथ में झूली।
"क्या जानता है?"
"कि मैं भवानी सिंह का बेटा हूँ। और रघुवीर मेरे पिता नहीं थे।"
उसका चेहरा बदला — वो चेहरा जो हमेशा मीठा रहता था। अब उस पर कुछ और था। हैरानी नहीं। डर नहीं। कुछ पुराना। कुछ ऐसा जो बरसों से दबा था।
"भवानी सिंह," उसने धीरे से कहा, जैसे नाम मुँह में कड़वा हो। "तो तुझे पता चल गया।"
"तुझे पहले से पता था।"
"मुझे सब पता था।" उसने मशाल को अपने सामने उठाया, और आग की लपट उसके चेहरे पर नाची। "मैं वहाँ था, वीर। जिस रात तेरे पिता मरे।"
मेरे पैर जम गए।
"मैं ही था जिसने रघुवीर को बताया कि भवानी नहर के किनारे मिलेगा। और मैं ही था जिसने तेरे पिता को पीछे से पकड़ा।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"रघुवीर ने मुझे बचाया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी।
"रघुवीर ने तुझे बचाया, हाँ।" नंदकिशोर ने मशाल नीचे की। "पर वो मेरे दोस्त थे, वीर। मेरे। भवानी के नहीं। भवानी तो मेरे रास्ते में था। और रघुवीर ने मुझे माफ़ नहीं किया। बीस साल तक मुझसे नहीं बोला। बीस साल।"
उसकी आवाज़ में कुछ फूटा — और वो फूटना सच्चा था।
"तो तूने उसे मरवा दिया?" मैंने पूछा।
"रघुवीर खुद मरा," उसने कहा। "मैंने हाथ नहीं लगाया। पर मैं रोया नहीं।" उसने मशाल फिर उठाई। "और अब — तेरी माँ ने तुझे सच बता दिया। तो आज मेरे पास कुछ नहीं बचा। बस ये।"
उसने मशाल बच्ची की तरफ़ घुमाई।
"रुक!" मेरी आवाज़ फट पड़ी। "एक बात सुन।"
"बोल।"
"तेरी मौसी ने मुझे काग़ज़ दिया। कहा — माँ झूठ बोल रही है।"
नंदकिशोर हँसा। "बेशक।"
"पर माँ ने सच बोला।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "तेरी मौसी को नहीं पता था कि मैं सच जानूँगा। उसने सोचा, मैं माँ से लड़ूँगा।" मैंने एक कदम बढ़ाया। "तेरे पास हर किसी का इस्तेमाल था। पर तेरी मौसी भी तेरे जाल में फँस गई। तू अकेला रह गया, नंदकिशोर। बिलकुल अकेला।"
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