Spirit of a Fighter – Chapter 832
"देखा?" उसने कहा। "ये है तेरा सच। तेरी माँ जिसे तू देवी समझता था — उसने अपने पति को ज़हर दिया। और तेरे पापा — जिनके नाम पर तू लड़ रहा है — वो भी तेरे पापा नहीं हैं। तू तो रघुवीर का बेटा है, और रघुवीर मेरा भाई था। यानी बीस साल से तू एक ऐसे आदमी की मिट्टी में खड़ा था जिसने तेरे पूरे खानदान को खाया।"
उसने मेरी तरफ़ कदम बढ़ाया।
"अब बता," उसने कहा। "तेरे पास क्या बचा है?"
मैंने अपने हाथों को देखा। कुदाल। उसकी मूठ पर मेरी माँ के हाथों की गर्मी अब भी थी।
और मैंने धीरे से कुदाल नीचे रख दी।
ठाकुर मुस्कुराया।
फिर मैंने अपनी जेब से वो चीज़ निकाली जो बिसरा ने मुझे दी थी — मेरी माँ की पीली शीशी। जिसे मीरा ने जाँचा था। जिसमें ज़हर नहीं, रघुवीर की बनाई दवा थी।
"ये क्या है?" मैंने शीशी ऊपर उठाकर कहा। "जानता है?"
ठाकुर की आँखें सिकुड़ीं।
"ये तेरे भाई रघुवीर की बनाई दवा है," मैंने कहा। "जो उसने तहखाने की मिट्टी और माँ के हाथ की हल्दी से बनाई थी। और माँ ने ये शीशी मेरे दरवाज़े के बाहर जानबूझकर रखी थी। क्योंकि वो जानती थी कि एक दिन मुझे ये मिलेगी और मैं समझ जाऊँगा कि मेरे पापा ने मुझे ज़हर नहीं, दवा दी थी।"
मैंने शीशी ठाकुर की तरफ़ बढ़ाई।
"तेरे पास ऐसी कितनी शीशियाँ हैं?" मैंने पूछा। "कितनी दवाइयाँ हैं जो तूने लोगों को दीं? तूने सिर्फ़ ज़हर बाँटा है। बीस साल में एक भी दवा नहीं बनाई। और मेरे पापा ने — रघुवीर ने — अपनी आख़िरी साँस तक दवा बनाई।"
ठाकुर का चेहरा कठोर हुआ।
"बातें," उसने कहा। "बस बातें।"
"नहीं," मैंने कहा। "ये बात नहीं, गवाही है।" मैंने कमरे के कोने की तरफ़ इशारा किया, जहाँ बिसरा खड़ा था — उसकी आँखें चमक रही थीं। "बिसरा ने बीस साल तक तेरी हर हरकत देखी है। हर रात। हर बोतल। हर काग़ज़। और आज वो गवाही देगा।"
बिसरा आगे आया। उसकी कुदाल उसके हाथ में थी।
"महेंद्र," बिसरा ने कहा। "बीस साल पहले तूने मुझे कहा था — 'बिसरा, आँख बंद कर ले।' और मैंने आँखें बंद कर लीं। पर कान नहीं बंद किए। मैंने हर बात सुनी है। हर रात। और आज मैं सब बोलूँगा।"
ठाकुर ने अपनी लाठी उठाई। उसके आदमियों ने मेरी माँ को छोड़ दिया और ठाकुर के पीछे आ गए।
उसी पल दरवाज़े से एक आवाज़ आई।
"महेंद्र।"
सब पलटे।
रणवीर सिंह दरवाज़े पर खड़े थे। व्हीलचेयर पर। उनके पीछे मीरा खड़ी थी, और उसके हाथ में एक मशाल थी।
"तूने सोचा था," रणवीर सिंह ने कहा, "कि मैं तेरे सामने कभी नहीं आऊँगा। पर आज मैं आया हूँ।"
ठाकुर ने उनकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ दिखी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी — शर्म।
"रणवीर," वो बोला। "तू यहाँ क्यों आया?"
"क्योंकि मेरी बेटी ने मुझे बताया कि तूने मेरे भाई की क़ब्र खुदवाई है," रणवीर सिंह ने कहा। "और मैंने सोचा — अगर मैं अब भी चुप रहा, तो मैं अपने भाई का भाई नहीं रहूँगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर," उन्होंने कहा। "तेरी माँ ने जो किया, वो मैं जानता था। मैं उस रात वहाँ था। मैंने देखा था कि तेरी माँ ने वो बोतल शेर सिंह के हाथ में दी। और मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि मैं भी डर गया था।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तो तूने जान-बूझकर चुप रहकर मेरे पापा को मरने दिया?" मैंने कहा।
"नहीं," रणवीर सिंह ने कहा। "मैंने उस रात तेरे पापा को बचाने की कोशिश की थी। मैंने बोतल उनके हाथ से छीनने की कोशिश की थी। पर शेर सिंह ने मना कर दिया। उसने कहा — 'अगर मैं आज बच गया, तो कल ये तेरी बेटी को मारेगा। और मैं अपनी बेटी के बदले अपनी जान दे सकता हूँ।'"
उनकी आवाज़ भारी हो गई।
"तेरे पापा ने खुद उस बोतल को पिया था," रणवीर सिंह ने कहा। "मेरे सामने। मुझे देखकर। और मुस्कुराकर कहा — 'भाई, मेरी माँ को बता देना कि मैं मुस्कुराते हुए गया।'"
मेरी आँखों से पानी बहने लगा। मैंने पोंछा नहीं।
ठाकुर ने मशालों की तरफ़ देखा। उसके आदमी अब भी छत पर थे।
"अब भी वक़्त है, महेंद्र," रणवीर सिंह ने कहा। "तेरे पास मशालें हैं, आदमी हैं, ताकत है। पर तू अकेला है। क्योंकि तूने हर उस आदमी को खो दिया जो तेरे साथ था।"
ठाकुर ने अपनी लाठी नीचे की। उसने मेरी माँ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर रणवीर सिंह की तरफ़।
"मैं," उसने धीरे से कहा, "बीस साल से इस दिन का इंतज़ार कर रहा था।"
और फिर उसने कुछ किया जो मैंने उम्मीद नहीं की थी।
उसने अपनी लाठी ज़मीन पर पटक दी।
"ले जा," उसने कहा। "अपनी माँ को ले जा।"
मैं हिला नहीं।
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि," ठाकुर ने कहा, "तेरे पापा ने मेरे सामने अपनी जान दी थी। और मैंने उनकी क़ब्र खुदवाई। अब मैं उनके बेटे को मारकर उनका कर्ज़ और नहीं बढ़ाऊँगा।"
उसने अपने आदमियों को इशारा किया। वो पीछे हट गए।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो अब भी मेरी तरफ़ देख रही थीं। मैं उनके पास गया।
"माँ," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ टूट रही थी।
"बेटा," उन्होंने कहा। उनका हाथ मेरे सिर पर रखा। "मैं जानती हूँ तू मुझसे नफ़रत करेगा। पर मैं इंतज़ार करूँगी। जब तक तू मुझे माफ़ न कर दे। भले ही ज़िंदगी भर करना पड़े।"
मैं उनके सामने घुटनों पर बैठ गया।
"माँ," मैंने कहा। "मैं तुझसे नफ़रत नहीं करता। मैं उस रात से नफ़रत करता हूँ जिसने तुझे ये चुनने पर मजबूर किया।"
उनकी आँखों से पानी बहा। पहली बार।
"मुझे माफ़ कर दे," मैंने कहा। "कि मैंने तुझे इतने साल अकेले जीने दिया।"
माँ ने मेरा सिर अपनी छाती से लगा लिया। और मैं रोया। बीस साल का रोना।
उसी पल दरवाज़े से टिंकू की आवाज़ आई — "वीर! मशालें बुझ रही हैं! छत पर आदमी भाग रहे हैं!"
मैंने सिर उठाया। बाहर झाँका। छत पर मशालें अब भी जल रही थीं, पर आदमी भाग रहे थे। कुछ नीचे उतर रहे थे।
फिर एक आवाज़ आई — सुक्खी बुआ की, आँगन से, इतनी ऊँची कि पूरा बंगला गूँज उठा।
"अरे! पकड़ो उनको! ऊपर भाग रहे हैं! पंचायत के आदमी आ गए हैं! सब पकड़ो!"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मुस्कुराई।
"मैंने सोचा," उसने कहा, "कि अगर हम अंदर से निकलेंगे, तो बाहर भी कोई होना चाहिए। सुक्खी बुआ पूरे गाँव को लेकर आ गई हैं।"
मैं हँसा। पहली बार, बहुत दिनों में।
मैंने ठाकुर की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े के पास खड़ा था। उसकी आँखें मेरी माँ पर थीं।
"सरस्वती," उसने कहा। "मैं जानता हूँ तू मुझे कभी माफ़ नहीं करेगी। पर एक बात कहनी है।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा।
"मैंने तेरे बेटे को मरने की धमकी दी थी," ठाकुर ने कहा। "पर मैंने कभी उसे छूने की हिम्मत नहीं की। क्योंकि जिस दिन मैंने तेरे बेटे को छूने की सोची भी, मेरे हाथ काँप गए। मैं जानता हूँ तू क्या सोच रही है — कि मैंने तेरी ज़िंदगी बर्बाद की। पर सच ये है — तेरे बेटे ने मेरी ज़िंदगी बर्बाद की। बीस साल तक मैं उस लड़के को देखता रहा जो मेरी मिट्टी में खड़ा था, और मैं कुछ नहीं कर सका।"
वो पलटा। दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"रुक," मैंने कहा।
वो रुका। पलटा नहीं।
"तेरी क़ब्र," मैंने कहा। "रघुवीर की क़ब्र — जो तूने खुदवाई थी। उसमें से क्या निकाला?"
ठाकुर का कंधा हिला। वो धीरे से बोला, "एक पीतल की ताबीज़। जिसमें रघुवीर ने अपने सारे राज़ लिखकर रखे थे। वो ताबीज़ अब भी उसी गड्ढे में है। मैं उसे नहीं छू सका। क्योंकि जब मैंने उसे देखा — उसकी लिखाई, उसकी मुहर — मेरे हाथ काँप गए।"
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