Spirit of a Fighter – Chapter 821
"वीर," वो हाँफते हुए बोली, "गुड़िया ने बताया कि ठाकुर ने माँ से कहा कि वो वहीं जाएगी जहाँ उसका पति गया।"
"मुझे पता है। कब्रिस्तान।"
"नहीं।" मीरा ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये कालू काका के पास से आया। मैंने पुराने काग़ज़ों में शेर सिंह की मौत का रिकॉर्ड खोजा। उन्हें जलाया नहीं गया था, वीर। ठाकुर ने उन्हें नहर के किनारे के उस पुराने श्मशान में जलाया था जहाँ बीस साल से कोई नहीं जाता। वहाँ उनकी कब्र है। और वो जगह मैदान से दूर है। दूर, वीर। नहर पार करके, पुराने पुल से—"
"कितनी दूर?"
"अगर भागकर जाएँ तो आधा घंटा। पर वापस आने में भी आधा घंटा। मुकाबला सूरज निकलने के साथ शुरू होगा।"
टिंकू ने अपनी टोपी उतारी और उसे हाथ में नचाया। "भाई, मैं तेरे साथ चलूँगा। मैं दौड़ सकता हूँ, सच में। कल से कसरत भी शुरू कर दी है मैंने—"
"तू यहाँ रुकेगा।"
"भाई—"
"टिंकू।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "अगर मैं वक़्त पर न लौटूँ, तो तू मेरी जगह मैदान में उतरेगा।"
उसका मुँह खुला रह गया। "मैं? कुश्ती? भाई, मैं तो खीर—"
"तुझे जो आता है, वो करना। पर अखाड़ा खाली नहीं छोड़ना।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो उठ चुकी थीं और अपनी साड़ी का पल्ला ठीक कर रही थीं, जैसे कहीं शादी में जा रही हों।
"माँ, आप टिंकू के साथ चलिए।"
"मैं नहीं जा रही।" उन्होंने पल्ला कंधे पर डाला। "मैं तेरे साथ चलूँगी।"
"माँ, ये ख़तरा—"
"बेटा," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, "मैं बीस साल से उस आदमी की कब्र पर फूल नहीं चढ़ा पाई, क्योंकि मुझे डर था कि कहीं ठाकुर को पता न चल जाए कि मैं जानती हूँ। आज अगर मैं उस कब्र तक नहीं पहुँची, तो मैं ज़िंदा रहकर भी मरी रहूँगी।"
मैं कुछ नहीं बोला। कभी-कभी चुप रहना ही सबसे बड़ा जवाब होता है।
हम झोपड़ी से बाहर निकले। नहर का पानी अब भी धीमा बह रहा था, पर सुबह की हवा में वो ठंडक आ गई थी जो कहती है कि दिन गर्म होगा। मीरा मेरे बगल में चल रही थी और टिंकू पीछे, माँ के साथ।
हम नहर के किनारे वाले रास्ते पर मुड़े ही थे कि मुझे कुछ दिखा। सड़क के बीच, धूल में, एक व्हीलचेयर खड़ी थी। और उस पर रणवीर सिंह बैठे थे। अकेले।
उनके दोनों हाथ पहियों पर थे, और उनका सिर झुका हुआ था। उन्होंने हमें आते देखा और अपना सिर उठाया। उनका चेहरा धूल से भरा था और पसीने की धारियाँ गालों पर सूख चुकी थीं।
"रुक जा, वीर," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज नहीं थी जो मैंने पंचायत में सुनी थी। आज वो बस थकी हुई थी। "मैं तुझे रोकने आया हूँ।"
मैं रुक गया। मेरी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी। "आप मुझे रोकने आए हैं?"
"हाँ।" उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। "सुन। ये ठाकुर का जाल है। वो चाहता है कि तू कब्रिस्तान जाए। ताकि मैदान खाली रहे और वो अपनी शर्तें मनवा सके। अगर तू अभी नहर पार करके गया, तो तू वक़्त पर नहीं लौटेगा। और तेरी माँ—"
"तो मैं अपनी माँ को मरने दूँ?" मेरी आवाज़ फट गई। "आप क्या कह रहे हैं? वो मेरी माँ हैं। अगर आज मैंने उन्हें छोड़ दिया, तो मैं किस मुँह से अखाड़े में उतरूँगा? किस मुँह से मिट्टी को हाथ लगाऊँगा?"
रणवीर सिंह ने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — हार। वो हार जो इंसान को तब होती है जब वो अपनी ही गलती का नतीजा सामने देखता है।
"तू मेरी बात पूरी सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "ठाकुर को तेरी ज़रूरत है, वीर। तेरी माँ को नहीं। वो उन्हें कुछ नहीं करेगा। क्योंकि ज़िंदा माँ ही तेरे हाथ बाँध सकती है। अगर उसने उन्हें मार दिया, तो तू आज़ाद हो जाएगा — और आज़ाद आदमी से ठाकुर डरता है।"
मैं चुप हो गया। मेरे हाथ मुट्ठियों में बंध गए और फिर खुल गए।
"पर वो कब्रिस्तान ले गए हैं—"
"हाँ। और वो उन्हें वहाँ इसलिए ले गए हैं कि तू भागकर जाए। भागता हुआ आदमी सोचता नहीं है। और जो सोचता नहीं, वो हार जाता है।" रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। "मैं तुझे रोकने नहीं आया कि तू अपनी माँ को भूल जा। मैं तुझे रोकने आया कि तू सोचकर जा।"
मैंने उनका हाथ नहीं पकड़ा। मैं वहीं खड़ा रहा, और मेरे अंदर कुछ टूट रहा था — वो भरोसा जो मैंने अपने गुस्से पर रखा था।
"आपको क्या पता?" मैंने कहा। "आप बीस साल से चुप बैठे रहे। आपने मुझे बताया तक नहीं कि मैं किसका बेटा हूँ। और अब आप मुझे रोकने आए हैं?"
ररणवीर सिंह का चेहरा सख़्त हुआ। उन्होंने अपने हाथ व्हीलचेयर के पहियों से हटाए और उन्हें अपनी जाँघों पर रखा। "हाँ, मैं बीस साल से चुप बैठा रहा। और उसी चुप्पी ने मुझे आज तेरे सामने हाथ फैलाने पर मजबूर किया है।"
फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी गिरफ़्त कमज़ोर थी — बीमार आदमी की गिरफ़्त — पर उसमें वो चीज़ थी जो सिर्फ़ टूटे हुए लोगों में होती है।
"मैंने बीस साल पहले अपने साथी को खोया था," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी, और वो मेरी तरफ़ नहीं, सड़क की धूल की तरफ़ देख रहे थे। "शेर सिंह मेरा दोस्त था। जब उसकी मौत हुई, मुझे पता चला कि भैरव ने कुछ किया है। मैं गुस्से में उसके पास दौड़ा। मैंने सोचा नहीं कि मेरे पीछे-पीछे कौन आ रहा है, कि मेरी बेटी उस कमरे में है, कि मेरी मिट्टी अभी भी गीली है। मैंने गुस्से में सब कुछ खो दिया — अपने पैर, अपना दोस्त, अपने बीस साल।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "आज मैं तुझे वही गलती नहीं करने दूँगा। मैं तुझे रोकने आया हूँ कि तू गुस्से में भागकर सब कुछ न खो दे।"
मेरे गले में कुछ अटक गया था। मैंने अपनी नज़र मीरा की तरफ़ की। वो चुप खड़ी थी, और उसकी आँखें भीगी थीं, पर वो कुछ नहीं बोली। उसने बस अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया — और वो छुआ छोटा था, पर वज़नदार।
"तो फिर क्या करें?" मैंने पूछा। "माँ वहाँ हैं। ठाकुर उन्हें कब्र के पास ले गया है।"
"मैंने सोचा है," रणवीर सिंह ने कहा। "ठाकुर चाहता है कि तू मैदान छोड़कर भागे। तू भागेगा नहीं। तू मैदान में जाएगा। वक़्त पर।"
"और माँ?"
"मैं जाऊँगा।" उन्होंने अपने पैरों की तरफ़ देखा। "आज मैं उस कब्रिस्तान तक पहुँचूँगा, चाहे मुझे कोई उठाकर ले जाए। मैं उन्हें वहाँ से निकालकर लाऊँगा।"
"आप?" मेरी आवाज़ में शक था, और मुझे उस पर शर्म आई। "आप व्हीलचेयर पर हैं।"
"तू सही कहता है।" रणवीर सिंह मुस्कुराए, और वो मुस्कान अजीब थी — जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर पट्टी। "पर तूने पंचायत में देखा था कि मैं खड़ा हो सकता हूँ। थोड़ी देर। बस इतनी देर कि मैं अपनी बेटी को किसी और के साथ खड़ा देख सकूँ।" उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो प्यार था जो शब्दों में नहीं आता। "आज मैं उतनी देर खड़ा रहूँगा कि अपने दोस्त की कब्र तक पहुँच सकूँ और उससे कह सकूँ — 'शेर सिंह, तेरा बेटा आज मैदान में लड़ रहा है।'"
मैंने आँखें बंद कीं। मेरी साँस अब भी तेज़ थी, पर वो तेज़ी अब भागने की नहीं थी। वो सोचने की थी।
"पर अगर ठाकुर ने माँ को कुछ कर दिया—"
"वो नहीं करेगा।" रणवीर सिंह की आवाज़ में वो यक़ीन था जो बीस साल के तजुर्बे से आता है। "मैं उसे जानता हूँ, वीर। वो डरपोक है। वो ज़िंदा औरत से नहीं, मरे हुए आदमी से डरता है — क्योंकि मरा हुआ आदमी बोल नहीं सकता, और ठाकुर चाहता है कि कोई न बोले। अगर उसने तेरी माँ को मार दिया, तो वो औरत बोल उठेगी — कब्र से भी।"
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