Spirit of a Fighter – Chapter 820
कालू काका का चेहरा पीला पड़ गया। "वो जगह माधव सिंह की थी, वीर। बीस साल पहले। उसी झोपड़ी में बोतलें भरी जाती थीं।"
मेरे पीछे गुड़िया ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "भैया, मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं।"
"भैया—"
"गुड़िया।" मैंने उसके सामने घुटने टेके। उसकी आँखों में देखा। "तू कालू काका के साथ सुक्खी बुआ के घर जाएगी। वहाँ जाकर सबको बताएगी कि ठाकुर ने माँ को उठा लिया है। और तू वहाँ से हिलेगी नहीं, चाहे कुछ भी हो जाए। समझी?"
उसके होंठ काँपे। फिर उसने सिर हिलाया। और फिर, जैसे उसे कुछ याद आया, उसने अपनी कॉपी खोली और उसमें से एक टूटा हुआ टुकड़ा निकाला — पीली मिट्टी का सूखा हुआ टुकड़ा।
"ये माँ ने मेरी जेब में रखा था," उसने कहा। "कहा — 'अगर भैया को ज़रूरत पड़े, तो ये दे देना।'"
मैंने वो टुकड़ा अपनी हथेली पर रखा। वो मिट्टी का था, पर उसमें कुछ और मिला हुआ था — कुछ जो मेरी नाक में तीखा उतरा, जैसे नींबू और हल्दी और कुछ और जो मैं पहचान नहीं पाया। माँ ने इसे जान-बूझकर मेरे लिए भेजा था। ये दवा थी, या कोई पहचान थी — मैं अभी नहीं बता सकता था। पर मैंने उसे अपनी जेब में रख लिया।
मीरा सीढ़ियों पर खड़ी थीं। मैंने उन्हें देखा। वो कुछ नहीं बोलीं, बस मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे जानती हों मैं क्या कहने वाला हूँ।
"मीरा," मैंने कहा। "गुड़िया को सुक्खी बुआ के घर छोड़ दे। और फिर मेरे पीछे आ जा। झोपड़ी के पास।"
उसने एक पल सोचा। फिर वो उतरकर गुड़िया के पास आई और उसके बाल ठीक किए।
"गुड़िया," उसने धीरे से कहा। "तेरी माँ ने कभी मुझे नहीं बताया था कि वो कितनी बहादुर हैं। आज पता चला।"
गुड़िया ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पहली बार कुछ और आया — पहचान। जैसे उसे याद आया कि ये वही लड़की है जो अखाड़े की मिट्टी में जूते पहनकर घुसी थी। और अब वो उसके भैया के साथ खड़ी है।
"तुम मेरे भैया का ख्याल रखना," गुड़िया ने कहा। उसकी आवाज़ में वो बड़प्पन था जो बारह साल की बच्ची में अजीब लगता है, पर यहाँ सही लगा।
मीरा मुस्कुराई। "रखूँगी। तू अपना ख्याल रख।"
मैं बाहर निकला। गोदाम के बाहर की हवा अचानक ठंडी लगी। सुबह की रोशनी अब तेज़ हो रही थी, और दूर नहर पर कोहरा उतर रहा था। सुक्खी बुआ पहले ही गाँव से कुछ लोगों को लेकर आ रही थीं — दूर से उनकी चमकीली साड़ी दिख रही थी, और उनके साथ तीन-चार औरतें थीं जिनके हाथों में लाठियाँ थीं।
"अरे! अरे मैंने तो कहा था न!" सुक्खी बुआ दूर से ही चिल्लाईं। "मैंने कहा था ठाकुर कुछ न कुछ करेगा! मेरे पान के बीड़े की कसम, अगर मैं ठाकुर के बंगले के सामने खड़ी हो गई, तो उसकी सारी सच्चाई बाहर आ जाएगी!"
उनकी बातें सुनकर मुझे थोड़ी हिम्मत मिली। पर मैं उन्हें रोकने के लिए नहीं रुका। मैंने गुड़िया का हाथ कालू काका के हाथ में दिया और उनकी तरफ़ देखा।
"काका, सुक्खी बुआ के साथ रहिए। और हाँ — अगर मैं सूरज निकलने तक न आऊँ, तो लुट्टन को बुला लीजिए। वो अब हमारा है।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भीगी थीं, पर उन्होंने सिर हिलाया। "जा बेटा। और मिट्टी को याद रखना।"
मैं नहर की तरफ़ भागा। मेरी चप्पलें कीचड़ में फँस रही थीं, इसलिए मैंने उन्हें उतार दिया और नंगे पैर दौड़ा। नहर का पानी आज धीमा बह रहा था, जैसे वो भी सुबह की नींद में हो। पार उतरकर मैंने झोपड़ी की तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं थी — टूटी छत, जली हुई दीवारें, और उसके आगे पुराना चमड़ा सुखाने का फ्रेम जो अब सिर्फ़ हड्डियों का ढाँचा था।
मैं झोपड़ी के पास पहुँचा तो रुक गया। अंदर से आवाज़ आ रही थी — कोई रो नहीं रहा था, कोई चिल्ला नहीं रहा था। बस एक धीमी, थकी हुई आवाज़ बार-बार कुछ दोहरा रही थी। मैंने कान लगाया।
"मैंने अपने बेटे को नहीं हराया," वो कह रही थी। "मैंने अपने आप को हराया।"
माँ।
मैंने दरवाज़े पर हाथ रखा। वो खुला था, बस एक भारी पत्थर से टिका हुआ था। मैंने उसे धकेला और अंदर घुसा।
अंदर आधा अँधेरा था, और बीच में एक लकड़ी की कुर्सी पर माँ बैठी थीं। हाथ पीछे बँधे हुए, सिर झुका हुआ, माथे पर हल्दी का टीका अब भी लगा हुआ — जैसे उन्होंने उसे खुद नहीं पोंछा हो, जैसे वो उनकी पहचान हो।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया और उनकी आँखें उठीं। उन्होंने मुझे देखा। और फिर उनके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने कभी नहीं देखा था — न डर, न शर्म, बस एक अजीब-सी शांति। जैसे वो इस पल का इंतज़ार कर रही थीं।
"तू आ गया," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, पर साफ़। "मैं जानती थी तू आएगा। पर मैं ये नहीं चाहती थी कि तू ऐसे आए।"
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"तू आ गया," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, पर साफ़। "मैं जानती थी तू आएगा। पर मैं ये नहीं चाहती थी कि तू ऐसे आए।"
मैं कुर्सी के पास गया और उनके हाथों की रस्सी खोलने लगा। गाँठ कसी हुई थी, गीली थी, और मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोलीं, "आराम से, बेटा। भागने की जल्दी में उँगली कट जाएगी।"
वो शांति मुझे डरा रही थी। एक औरत जिसे बंदी बनाकर लाया गया, जिसके हाथ पीछे बँधे हैं, वो इतनी शांत कैसे हो सकती है?
रस्सी खुली। माँ ने कलाइयाँ सहलाईं, जहाँ लाल निशान पड़ गए थे। फिर वो उठीं और मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"सुन, बेटा। मैं तुझे कुछ बताना चाहती हूँ, और तू मुझे टोकना मत।"
"माँ, पहले यहाँ से चलिए। बाकी बातें—"
"नहीं।" उनकी आवाज़ में वो चीज़ आई जो बचपन में भी थी — जब वो चक्की पर बैठकर कहती थीं कि आज दाल में नमक कम है। "वो लंगड़ा आदमी मुझे यहाँ छोड़कर गया तो बोलता गया — 'तू वहीं जाएगी जहाँ तेरा पति गया था।' अब तू बता, मेरा पति कहाँ गया था?"
मेरे पेट में एक ठंडी सी चीज़ फैल गई। मैंने झोपड़ी के बाहर की तरफ़ देखा, जहाँ सुबह की रोशनी दीवार पर पीली पड़ रही थी। "कब्रिस्तान," मैंने कहा। "पापा की कब्र।"
माँ ने सिर हिलाया। "हाँ। और वो मुझे ले गए तो तेरे पास वक़्त नहीं बचेगा। तू वहाँ दौड़ेगा, मैदान खाली रहेगा, और ठाकुर अपनी शर्तें मनवा लेगा।"
मैंने रस्सी को ज़मीन पर पटका। "तो मैं आपको यहीं छोड़कर—"
"तू मेरी बात पूरी सुन।" माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर गिरफ़्त बहुत मज़बूत थी। "मैं तुझे यहाँ से जाने दूँगी, पर तू पहले ये सुन ले कि ठाकुर ने मुझसे क्या कहा।"
उन्होंने बताया कि ठाकुर खुद उस कमरे में आया था जहाँ उन्हें रखा गया था। वो कुर्सी पर बैठा, बहुत देर तक कुछ नहीं बोला, बस अपनी अंगूठी घुमाता रहा। फिर बोला — "सरस्वती, तू बीस साल से चुप है। आज भी चुप रह। मैं तेरे बेटे को कुछ नहीं कहूँगा। बस वो कल मैदान में न आए।"
"और मैंने क्या कहा?" माँ ने मेरी आँखों में देखा। "मैंने कहा — 'महेंद्र, तू मेरे बेटे को नहीं जानता। वो मेरा दूध पीकर बड़ा हुआ है। उस दूध में आज भी मेरी चक्की की आवाज़ है। वो सुनकर आएगा।'"
मेरी आँखें भर आईं। माँ ने मेरा हाथ छोड़ा और अपनी कलाई पर पड़े निशान को सहलाने लगीं, जैसे उसे मिटाना चाहती हों।
तभी बाहर से पैरों की आवाज़ आई। मीरा दौड़ती हुई अंदर आई, और उसके पीछे टिंकू। मीरा के हाथ में एक काग़ज़ था और उसका चेहरा वैसा था जैसे उसने कुछ ऐसा देखा हो जो वो देखना नहीं चाहती थी।
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