Spirit of a Fighter818 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 818

6 min read November 5, 2026

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने कभी नहीं देखी थी — थोड़ा डर, और थोड़ा सवाल।

"तो ये किसका है?" मैंने पूछा।

"मालूम नहीं।" माँ ने कड़े को उँगली से छुआ। "पर इस पर बाईस साल की चिकनी चमक है। इस औरत ने इसे रोज़ पहना है। ऐसा कड़ा रोज़ कोई नहीं पहनता, वीर, जब तक उसके अंदर कुछ हो।"

मैंने कड़ा पलटा। अंदर की तरफ़, धूल से ढका, एक नाम खुदा था। बहुत पुराना खुदाई। मैंने धूल पोंछी और पढ़ा।

"भैरव।"

मेरे पीछे खड़े कालू काका ने एक लंबी साँस छोड़ी। जैसे बाईस साल से रुकी हुई साँस।

"ये कड़ा भैरव का है," कालू काका बोले, और उनकी आवाज़ टूटी हुई थी। "मैंने ये अपनी आँखों से देखा है। उसके हाथ में। उस रात। जब वो मेरे बेटे को…" वो रुक गए। डंडा ज़मीन पर टिका दिया।

मीरा ने आगे आकर कड़ा मेरे हाथ से लिया। उसने खुदा हुआ नाम अपनी उँगली से सहलाया, जैसे किसी पुराने ज़ख्म को छू रही हो।

"तो ये औरत भैरव की बहन है," वो बोली, "और वो भैरव का कड़ा पहनकर घूम रही थी। ऐसा क्यों?"

"क्योंकि वो भैरव को भूल नहीं पाई," माँ ने कहा। "जो इंसान दूसरे का कड़ा पहनकर बाईस साल जिए, वो बदला लेने नहीं आया था। वो किसी का इंतज़ार कर रहा था।"

मीरा ने कड़ा वापस मुझे थमाया। उसकी आँखों में वो ठंडक अब किसी और चीज़ में बदल रही थी — जैसे किसी पहेली का आख़िरी टुकड़ा हाथ आने वाला हो।

"इंतज़ार किसका?" मैंने पूछा।

कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ़ नहर की आवाज़ थी, और दूर कहीं कुत्ते का रोना।

और तभी भीड़ से एक आवाज़ आई — कालू काका की, फिर मीरा की, फिर माँ की। मैं उन्हें सुन नहीं रहा था। मेरे कान सिर्फ़ एक चीज़ पर टिके थे — अँधेरे में अब भी कुछ हिल रहा था। गोदाम की पिछली तरफ़। पेड़ों के पीछे।

मैंने मीरा का हाथ पकड़कर उसे खींचा और फुसफुसाया, "पीछे चार आदमी हैं। मैंने उनके पैरों की आहट सुनी है।"

मीरा ने पलक नहीं झपकी। "तो ये खेल अभी खत्म नहीं हुआ," वो बोली।

उसी वक़्त कालू काका साँस फूलती हुई भाग कर आए। उनका चेहरा पसीने से भीगा था और डंडा काँप रहा था।

"वीर, गोदाम के पीछे चार आदमी हैं।" उन्होंने घुटनों पर हाथ रखकर साँस ली। "एक लंगड़ा है, वो बार-बार कह रहा है — 'माँ को नहीं, बेटी को लेकर आओ।'"

मेरे खून में आग दौड़ गई। ठाकुर। वो मुझसे मुकाबले से नाम वापस लेने का सौदा करना चाहता था, और मेरे परिवार को पकड़ने आया था।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें चमक उठीं।

"मेरे पास एक तरीका है," वो बोली। "टिंकू अभी नहीं गया होगा।"

टिंकू पेड़ की जड़ के पास बैठा था, अपनी खाली टोकरी गोद में रखे। मीरा उसके पास गई और धीरे से कुछ कहा। टिंकू का चेहरा उतर गया।

"भाई, मैं तो मिठाई बेचने वाला हूँ," उसने हाथ उठाए। "जासूस नहीं।"

"तू जासूस नहीं है," मीरा ने उसका कंधा थपथपाया। "तू रसोइया है। और रसोइए का सबसे बड़ा हथियार उसका हाथ है।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। उसने गहरी साँस ली, अपनी टोपी उठाई, और उसे सिर पर ठीक से बैठाया।

"चल," वो बोला, और उसकी आवाज़ में अब धड़कन कम थी। "आज एक बार तो मेरी मिठाई काम आए।"

वो टोकरी उठाकर पीछे की तरफ़ चला। मैं, मीरा और कालू काका पेड़ों के पीछे से उसकी निगरानी करने लगे।

टिंकू पहरेदारों के सामने पहुँचा और उसने मुस्कुराकर टोकरी खोली।

"भैया, बल्कि आज तो मेरी दुकान का उद्घाटन है," उसने मिठाई आगे बढ़ाई। "मुफ़्त खाओ।"

उसके हाथ काँप रहे थे, मैं दूर से देख सकता था। पर आवाज़ में इतनी मिठास थी कि पहरेदार पहले हिचके, फिर दोनों ने मिठाई उठाई।

दोनों ने खाया। और उनकी आँखें भारी होने लगीं, पैर लड़खड़ाए, और वो धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़े।

पर तीसरा — लंगड़ा — नहीं हिला। वो टिंकू की तरफ़ बढ़ा और उसका गला पकड़ लिया।

"मैं तो तेरे आने का इंतज़ार कर रहा था, रसोइए," वो फुसफुसाया।

और तभी पीछे से एक आवाज़ आई — ठंडी, साफ़, बिना किसी कँपकँपी के।

"उसे छोड़ दे, वरना अगली मिठाई तेरे मुँह में जाएगी।"

वो मैं था। और मेरे हाथ में एक ईंट थी।

॥

ईंट हवा में सीटी बजाती हुई गई और लंगड़े के कलाई पर लगी। उसका हाथ टिंकू के गले से छूट गया, और टिंकू घुटनों के बल गिरकर खाँसने लगा। लंगड़ा दो कदम पीछे हटा, अपनी कलाई पकड़कर मुझे देखने लगा। उसकी आँखों में हैरानी थी, डर नहीं। जैसे उसे उम्मीद ही नहीं थी कि कोई उस तरफ़ ईंट फेंकेगा।

"अच्छा," वो बोला, और उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी खुशी थी। "तो तू आ गया।"

मैंने टिंकू को हाथ पकड़कर उठाया। उसके गले पर लाल निशान पड़ गए थे, और वो हाँफ रहा था। पर उसने मेरी तरफ़ देखकर पहले मुस्कुराने की कोशिश की, फिर हिम्मत हारकर सीधे ज़मीन पर बैठ गया।

"भाई, अब मैं दोबारा मिठाई नहीं बेचूँगा," वो बोला। "वर्दी वाले लोग मुफ़्त की चीज़ नहीं समझते।"

लंगड़ा पीछे हटने लगा। उसकी एक टाँग छोटी थी, इसलिए वो जैसे लंगड़ाते हुए भागता, वैसे ही मीरा उसके रास्ते में आ गई। उसने अपना बैग सीने से लगाया और सीधा उसकी आँखों में देखा।

"तू उस आदमी का आदमी है जिसने मेरे पिता के पैर छीने थे?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, बस वो ठंडी सफ़ाई थी जो किसी चीज़ का हिसाब माँगते वक़्त आ जाती है।

लंगड़े ने होंठ कसकर दबाए, फिर हँस दिया। छोटी, सूखी हँसी।

"मैडम, मैं तो सिर्फ़ लालटेन ढोता हूँ," उसने कंधे उचकाए। "किसके पैर कहाँ गए, किसका पैसा कहाँ गया — ये हिसाब बड़े लोग रखते हैं। हम तो रोशनी करते हैं।"

"और माँ को गोदाम में घसीटते वक़्त भी रोशनी ही कर रहा था?" मैंने कहा।

लंगड़े का चेहरा एक पल के लिए बदला। फिर वो पलटकर भागने को हुआ। पर उसकी लंगड़ी टाँग ने उसे धोखा दे दिया। मैंने एक कदम में उसकी कमर पकड़ी और उसे घुमाकर ज़मीन पर गिरा दिया। वो छटपटाने लगा, पर मेरे घुटने उसकी छाती पर थे और मेरे हाथ उसकी बाँहों पर।

"माँ कहाँ है?" मैंने उसके कान के पास कहा। मेरी आवाज़ मेरे कानों में भी अजीब लगी — इतनी धीमी, इतनी जमी हुई।

वो हाँफते हुए मेरी तरफ़ देखने लगा। उसके दाँतों में मिट्टी लग गई थी।

"गोदाम के नीचे कोठरी है," उसने कहा। "सीढ़ियों के नीचे। पर तेरी माँ वहाँ नहीं है।"

मेरा हाथ उसकी बाँह पर और कस गया। "झूठ मत बोल।"

"मैं झूठ नहीं बोल रहा!" उसकी आवाज़ फट गई। "ठाकुर ने कहा था — अगर तू मुकाबले से नाम वापस नहीं लेता, तो तू अपनी माँ को वापस नहीं पाएगा। और ठाकुर अपनी बात का पक्का है। उसने माँ को मेरे हाथ में नहीं छोड़ा। उसने खुद ले जाकर छिपाया है।"

"तो बेटी कहाँ है?" कालू काका ने पीछे से कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी।

लंगड़े ने अपनी आँखें बंद कर लीं। "बेटी कोठरी में है। वो उसे साथ नहीं ले गया। कह गया — 'छोटी को रहने दे, वो रो-रोकर अपने भैया को बुलाएगी, और भैया आएगा।'"

मेरे पेट में कुछ जम गया। ठाकुर मुझे नहीं ढूँढ रहा था। वो मुझे बुला रहा था। मेरी बहन को चारा बनाकर।

मैंने लंगड़े को छोड़ दिया और उठ खड़ा हुआ। वो ज़मीन पर पड़ा रहा, साँस लेता हुआ, और अपनी कलाई सहलाता रहा। कालू काका ने उसकी तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़।

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