Spirit of a Fighter – Chapter 781
मैंने पलटकर ठाकुर को देखा।
वो अपने आदमियों के पीछे खड़े थे, और उनके चेहरे पर वो मुस्कान नहीं थी जो अब तक थी। अब वहाँ कुछ और था — जैसे कोई जुआरी अपना आख़िरी सिक्का हार चुका हो।
"ये तुमने किया," मैंने कहा। "तुमने एक औरत को तीस साल एक कमरे में बंद रखा। और उसके बेटे को यतीम बना दिया।"
"मैंने उसे खाना दिया," ठाकुर ने कहा। "मैंने उसे ज़िंदा रखा। ये मेरी रहम है।"
"रहम?" मैंने कहा। और मेरी आवाज़ इतनी ऊँची निकली कि मैं खुद चौंक गया। "तुम्हारी रहम? तुमने उस औरत को उसके नवजात बच्चे से अलग किया। तुमने उसे बताया कि उसका बेटा मर गया। तुमने बच्चे को बताया कि उसकी माँ मर गई। और तुमने उसी बच्चे को अपना हथियार बनाया — उसे अपने ही बाप के खिलाफ़ खड़ा किया।"
भीड़ में एक आवाज़ उठी। फिर दूसरी। फिर बहुत सारी।
"ये आदमी ठाकुर नहीं है," मैंने पूरे मैदान की तरफ़ मुँह करके कहा। "ये एक कैदी रखने वाला है। और हम सब उसकी गवाही दे रहे हैं। सुक्खी बुआ!"
सुक्खी बुआ आगे आईं, और उनका पल्लू अभी भी गीला था।
"अरे मैंने तो सुना है," वो बोलीं, और इस बार उनकी आवाज़ में चुगली नहीं, गुस्सा था, "कि इस बंगले के पीछे वाला कमरा बीस साल से बंद था। और जो उसमें खाना ले जाता था, वो बोलता था कि वहाँ कोई नहीं है, सिर्फ़ पुराना सामान है।"
"मैंने उसे ज़िंदा रखा!" ठाकुर चिल्लाए। "वरना वो मर गई होती!"
"तो उसके बेटे को क्यों नहीं दिया?" रणवीर सिंह की आवाज़ आई। वो व्हीलचेयर पर थे, और मीरा उनके पीछे खड़ी थी। "अगर तू रहमदिल होता, तो माँ और बेटे को मिला देता। पर तूने नहीं किया — क्योंकि तू जानता था कि जग्गा तेरे हाथ में तभी रहेगा जब उसे लगे कि उसके पास कोई नहीं है।"
ठाकुर ने कुछ कहना चाहा, पर रणवीर सिंह ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया।
"अब सुनो सब," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ मैदान के कोने-कोने तक पहुँची। "आज यहाँ जो हुआ, वो पंचायत का मामला है, और पंचायत अपना फ़ैसला सुनाएगी। पर एक बात पहले साफ़ कर दूँ — इस मुकाबले का जो नतीजा होगा, वही सच का फ़ैसला होगा। जो जीतेगा, वो सच का हक़दार होगा।"
"ये कैसा फ़ैसला है?" किसी औरत ने पीछे से पूछा। "अगर ठाकुर जीत गया तो?"
"तो उसका हर जुर्म धुल जाएगा," रणवीर सिंह ने कहा। "और अगर हार गया, तो उसकी हर बात झूठ हो जाएगी। ये अखाड़े का नियम है। मिट्टी का नियम। और मिट्टी से बड़ा कोई जज नहीं।"
मैदान में सन्नाटा छा गया। लोग एक-दूसरे को देखने लगे।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो जग्गा के पास गई थी, जो अब भी अपनी माँ के पास घुटनों के बल बैठा था।
वो जग्गा के कंधे पर हाथ रखकर झुकी।
"जग्गा," वो धीरे बोली। "तुम्हारी माँ को हम बाहर निकाल लाए। अब उसे ख़तरा नहीं है। पर तुम्हें ठाकुर की ज़ंजीर तोड़नी होगी — अपने हाथ से, अपने दम पर।"
जग्गा ने अपनी आँखों से पानी पोंछा। उसने अपनी माँ की तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़।
"मैं तीस साल से एक झूठ के पीछे दौड़ रहा था," उसकी आवाज़ रुक गई। वो एक लंबी साँस लेकर फिर बोला। "और मेरी माँ… मेरी माँ यहाँ थी। इतने साल। मुझे पता भी नहीं चला।"
"अब पता है," मीरा ने कहा। "और अब तुम्हें तय करना है — तुम उस आदमी के आदमी हो, या अपने बाप के बेटे।"
जग्गा खड़ा हो गया।
वो ठाकुर की तरफ़ मुड़ा, और उसकी आँखों में वो कुछ नहीं था जो सुबह था। अब वहाँ सिर्फ़ एक चीज़ थी — ठंडा, साफ़ गुस्सा।
"मैं तेरे लिए नहीं लड़ूँगा," जग्गा ने कहा। "मैं अपने लिए लड़ूँगा। और मैं जीतूँगा — क्योंकि अब मेरे पास खोने को कुछ नहीं बचा।"
शमशेर सिंह ने अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।
"अब तू अकेला नहीं, बेटा," वो बोले।
जग्गा ने अपने बाप की तरफ़ देखा। पहली बार, उसकी आँखों में शर्म थी — वो शर्म जो बेटे को बाप के सामने आती है जब उसे लगता है कि उसने कुछ बिगाड़ दिया।
"माफ़ कर दे," जग्गा ने कहा। "मैंने तुझे नहीं पहचाना। मैंने तेरे पैरों पर… उस आदमी के लिए…"
"चुप कर," शमशेर सिंह ने उसका सिर अपनी छाती से लगा दिया। "मैंने भी तुझे नहीं पहचाना जब तू बड़ा था। मैं तो तुझे छोड़कर भागा था। तेरा कसूर क्या, जो मैं तुझसे माफ़ी माँगूँ?"
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ में पीली शीशी थी, और मेरे कंधे पर टिंकू का हाथ।
"भाई," टिंकू ने धीरे से कहा, "तेरी आँखें गीली हैं।"
"धुआँ," मैंने कहा।
"हाँ," टिंकू ने कहा। "धुआँ। मेरी भी।"
मैं हँसा। पहली बार उस पूरे दिन में।
पर ठाकुर ने मौका नहीं छोड़ा।
वो अपने आदमियों के बीच से निकलकर आगे आए, और उनके चेहरे पर वो पुरानी मुस्कान लौट आई थी — थोड़ी टेढ़ी, थोड़ी थकी, पर मुस्कान।
"अच्छा," उन्होंने कहा। "तो अब मुकाबला। पर एक बात पहले सुन लो, वीर सिंह।"
"क्या?" मैंने कहा।
"ये औरतें जो तूने निकालीं," उन्होंने कहा। "इनमें से एक और भी है। और वो मेरे बंगले के नीचे वाले तहखाने में है। और उस कमरे की चाबी सिर्फ़ मेरे पास है।"
मेरे पेट में एक ठंडी चीज़ उतर गई।
"कौन?" मैंने पूछा।
"तेरी माँ," ठाकुर ने कहा।
मेरी साँस रुक गई। मैंने पीछे मुड़कर देखा — और वहाँ, भीड़ के बीच, थोड़ी दूर पर, मेरी माँ खड़ी थीं। सरस्वती। अपनी पुरानी सफ़ेद साड़ी में, माथे पर हल्दी का टीका, और हाथों में पीतल का ढक्कन।
वो ठाकुर की तरफ़ देख रही थीं, और उनकी आँखों में डर नहीं था। सिर्फ़ एक चीज़ थी — बर्फ़ जैसी शांति।
"वो मेरी माँ नहीं है," मैंने कहा। "वो मेरी माँ हैं। और वो वहाँ खड़ी हैं। तेरा झूठ पुराना हो गया, ठाकुर।"
ठाकुर ने पलटकर देखा। उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
पर फिर उन्होंने हँसना शुरू किया। धीमी हँसी, जो बढ़ती गई।
"अच्छा," उन्होंने कहा। "तो तू चतुर है। पर चतुराई से मुकाबला नहीं जीता जाता। वो मिट्टी में जीता जाता है। और मिट्टी मेरी है।"
उन्होंने अपना हाथ उठाया, और उनके आदमियों ने लाठियाँ उठा दीं।
"कल सुबह," ठाकुर ने कहा। "अखाड़े में। तू और मैं। और जो हारेगा, वो अपना सब कुछ दे देगा — अपना नाम, अपनी ज़मीन, और अपना सच।"
"और मेरी माँ?" मैंने कहा। "जिसे तूने तहखाने में बंद रखा है?"
ठाकुर मुस्कुराए। "अगर तू जीतेगा, तो सब कुछ छोड़ दूँगा। पर अगर हारा… तो जो तहखाने में है, वो कभी बाहर नहीं आएगी।"
मैं आगे बढ़ा। एक कदम। दो कदम। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा, पर मैंने उसे छुड़ा लिया।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा। "मेरी माँ वहाँ नहीं है। मैंने उनकी हल्दी की गंध सुंघी है — वो तेरे बंगले में नहीं है।"
ठाकुर ने मेरी आँखों में देखा। कुछ पल। और फिर वो हँसे।
"तो फिर तू क्यों डर गया?" उन्होंने कहा।
मैं चुप हो गया।
वो सही कह रहे थे। मैं डर गया था। एक पल के लिए — बस एक पल — मुझे लगा कि मेरी माँ वहाँ हो सकती है। और उसी पल में ठाकुर ने मुझे हरा दिया था।
मैंने पीछे मुड़कर माँ को देखा। वो अब भी वहीं खड़ी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और धीरे से सिर हिलाया — जैसे कह रही हों, "शांत रह, बेटा।"
मैंने एक लंबी साँस ली।
"ठीक है," मैंने कहा। "कल सुबह। अखाड़े में। पर एक शर्त मेरी भी है।"
"बोल।"
"मुकाबले से पहले, तू अपने बंगले के तहखाने की चाबी यहीं, सबके सामने, पंचायत के हाथ में रख देगा। ताकि कल अगर तू हारे, तो कोई बहाना न बचे।"
ठाकुर ने मेरी तरफ़ देखा। सोचा। और फिर अपनी जेब से चाबियों का गुच्छा निकाला।
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