Spirit of a Fighter771 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 771

7 min read November 5, 2026

टिंकू ने गर्दन खुजाई। "मतलब?"

"मतलब," मैंने कहा, धीरे से, "कि ये हिसाब ठाकुर का है। हरनाम सिर्फ़ मुहर लगाता था। असली मालिक ऊपर बैठा है।"

मीरा ने कॉपी बंद की। "अगर बाबू खान इसे देख ले, तो वो समझ जाएगा कि ठाकुर सिर्फ़ एक ठेकेदार नहीं है। वो पूरे इलाक़े के अखाड़ों का मालिक है। और जो आदमी इतना बड़ा है, उसे कोई अदालत से नहीं डराती। उसे सिर्फ़ अपने ही लोग डराते हैं।"

"तो हमें उसके अपने लोगों की ज़रूरत है," मैंने कहा।

मैंने अपनी जेब से वो पीली शीशी निकाली जो माँ ने दी थी — वो नहीं, जो मीरा ने जाँची थी और दवा निकली थी। एक और शीशी थी, छोटी, जो कालू काका ने मुझे दी थी, और जिसमें सिर्फ़ दो बूँद थीं। तहखाने की मिट्टी और उस मिट्टी में मिला हुआ वो तेल, जो सब कुछ ठीक करता था।

"ये क्या है?" टिंकू ने पूछा।

"ये वो है जो ठाकुर के पास नहीं है," मैंने कहा। "ये तहखाने की मिट्टी है। अगर बाबू खान ने एक बार इसे छुआ, तो वो समझ जाएगा कि असली ताकत कहाँ है। और जो आदमी असली ताकत जान लेता है, वो झूठे आदमी से नहीं डरता।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी — जब वो किसी बात को समझ जाती थी और उससे आगे बढ़ जाती थी।

"तो चलो," उसने कहा। "बाबू खान का अखाड़ा शहर के उस पार है। रास्ते में मैं तुम्हें बताती हूँ कि वो कैसा आदमी है।"

हम अड्डे से निकले। सुबह की धूप अब तेज़ हो रही थी, और सड़क पर धूल उड़ रही थी। मैंने पीछे मुड़कर देखा — शमशेर दूर जा रहा था, अख़बार उसकी बगल में दबा हुआ, और उसके कदमों की आवाज़ मुझे दूर तक सुनाई देती रही।

टिंकू ने चलते-चलते कहा, "एक बात बताओ, भाई। जब आप जग्गा से लड़ेंगे, तो क्या सच में उसे गिराकर उठाएँगे?"

"हाँ।"

"और अगर वो उठकर आपको ही गिरा दे?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सीधा था, मज़ाक नहीं कर रहा था।

"तो मैं उठूँगा," मैंने कहा। "और फिर से सच कहूँगा। जब तक वो सुन न ले।"

टिंकू कुछ देर चुप चला। फिर उसने कहा, "मैंने अपनी माँ से कह दिया है कि आज रात खीर बनाए। जीत की खीर।"

"और अगर हार गए?"

"तो भी खीर बनेगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो बेतुकी हिम्मत थी जो सिर्फ़ उसी के पास थी। "हारने वाले को भी खीर चाहिए।"

मीरा हँसी। पहली बार उस दिन में। और उस हँसी में कुछ ऐसा था कि मेरे सीने में जमी वो ठंडक पिघलने लगी।

हम शहर की तरफ़ बढ़े। रास्ते में एक मोड़ पर, जहाँ से अखाड़े की दीवार दिखती थी, मैंने एक पल के लिए रुककर पीछे देखा। दीवार पर कोई खड़ा था। दूर, पर पहचाना जा सकता था — बड़ी मूँछें, चौड़ा शरीर।

ठाकुर।

वो हिल नहीं रहा था। बस खड़ा था, और देख रहा था। और मुझे लगा कि वो मुस्कुरा रहा है।

मैंने मीरा का हाथ पकड़ा और आगे बढ़ा। पर मेरे अंदर एक आवाज़ थी, साफ़ और ठंडी — "आज शाम से पहले। वरना कल मैदान में जग्गा अकेला खड़ा होगा, और उसके साथ खड़ा होगा वो सच जो उसने कभी सुना ही नहीं।"

और तभी मीरा ने मेरा हाथ दबाया और धीरे से कहा, "वीर, देखो — अख़बार वाले की दुकान के बाहर जो लड़का खड़ा है। वो जग्गा का आदमी है। हबीब का भेजा हुआ।"

मैंने देखा। एक दुबला लड़का, हाथ में लिफ़ाफ़ा, आँखें चारों तरफ़ घुमाता हुआ। और जैसे ही उसकी नज़र मुझ पर पड़ी, उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ा दिया — और बिना एक शब्द बोले भाग गया।

मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें एक पर्ची थी, और पर्ची पर सिर्फ़ एक लाइन, काँपती लिखाई में:

"वो तुम्हें मुकाबले में नहीं लड़ने देगा। पर मैं चाहता हूँ कि तुम लड़ो। आज रात, अखाड़े के पीछे वाली दीवार के पास आ जाओ। अकेले। — जग्गा।"

मेरे हाथ से पर्ची फिसल गई। टिंकू ने उसे झट से पकड़ लिया और पढ़ा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर था जो मेरे अंदर भी उठ रहा था।

"अकेले?" टिंकू ने कहा। "भाई, ये जाल है।"

मीरा ने पर्ची अपने हाथ में ली। उसने उसे सूँघा — नहीं, उसने नहीं, उसने मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। "तुम सूँघो।"

मैंने पर्ची सूँघी। काग़ज़ की गंध, स्याही की गंध… और उसके नीचे, बहुत हल्की, मिट्टी की गंध। पर वो मिट्टी अखाड़े की लाल मिट्टी नहीं थी। वो किसी और जगह की मिट्टी थी — ठंडी, गीली, जैसे किसी गड्ढे की।

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

"ये जग्गा ने नहीं लिखी," मैंने कहा। "ये उस आदमी ने लिखी है जिसने मेरे पापा को मारा था।"

टिंकू का मुँह खुला रह गया। "मतलब…?"

मैंने पर्ची को अपनी जेब में रखा और शहर की तरफ़ देखा, जहाँ धूल के बीच अखाड़े की दीवार धुँधली हो रही थी।

"मतलब ये कि आज रात अखाड़े के पीछे जो खड़ा होगा," मैंने कहा, "वो जग्गा नहीं होगा।"

॥

मैंने पर्ची को जेब में रखा और वहीं खड़ा रह गया। अखाड़े की दीवार धूल में धुँधली हो रही थी, और उस पर खड़ा आदमी अब भी हिल नहीं रहा था। दूर से ऐसा लग रहा था जैसे कोई मूर्ति हो। पर मुझे पता था, मूर्ति नहीं है। वो साँस ले रहा है, और मेरी तरफ़ देख रहा है।

"चलो," मीरा ने कहा। "यहाँ खड़े रहने से कुछ नहीं होगा।"

हम शहर की तरफ़ चले। अख़बार वाले की दुकान पर भीड़ लगी थी। लोग अख़बार उठाकर पढ़ रहे थे, और पढ़कर एक-दूसरे को दिखा रहे थे। एक बूढ़ा आदमी सिर हिला रहा था, कोई औरत अपनी साड़ी के कोने से आँखें पोंछ रही थी।

टिंकू ने एक अख़बार उठाया। उसने एक नज़र डाली, फिर दूसरी, फिर उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"भाई…" उसकी आवाज़ फँस गई। "ये क्या है?"

मैंने अख़बार उसके हाथ से लिया। ऊपर बड़ी-बड़ी लाइनों में छपा था — "रणवीर अखाड़े का पहलवान वीर सिंह भारत केसरी से नाम वापस लेता है। अखाड़ा समिति का बयान — वीर ने खुद अर्ज़ी दी, मुकाबले के लिए खुद को तैयार न पाकर।"

मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने वो लाइन दोबारा पढ़ी, फिर तीसरी बार। हर बार शब्द वही थे, और हर बार सीने में एक ईंट और गिरती थी।

"मैंने ऐसा कोई काग़ज़ दिया ही नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लग रही थी। "मैंने कभी नाम वापस नहीं लिया। मैं तो…"

"मैं जानती हूँ," मीरा ने कहा। उसने अख़बार मेरे हाथ से लिया और उसे गौर से देखा। "ये ठाकुर की चाल है। उसने पंचायत में कोई झूठा काग़ज़ लगाया है। वो चाहता है कि तू मैदान में न उतरे। और अगर नाम वापस हो गया, तो उतरेगा कैसे?"

टिंकू ने अपनी टोपी उतारी और उसे हाथ में मसलने लगा। "तो अब क्या? पूरा शहर पढ़ रहा है कि वीर डर गया। कल मैदान में जो भीड़ होगी, वो क्या सोचेगी?"

"भीड़ सोचेगी वो जो काग़ज़ कहेगा," मीरा ने कहा। "पर काग़ज़ झूठा है। और झूठ को सच से हराया जाता है। चलो।"

"कहाँ?"

"पंचायत के दफ़्तर। जहाँ से ये काग़ज़ निकला है। उसकी जड़ पकड़नी है।"

पंचायत का दफ़्तर अखाड़े के पीछे वाले हिस्से में एक पुराने कमरे में था। उसकी दीवारें हरी थीं, जगह-जगह से पपड़ी छूट रही थी। दरवाज़े पर एक टूटी घंटी लटकी थी, और अंदर से काग़ज़ों की गंध आ रही थी — सीलन भरी, बंद कमरे की गंध।

हम अंदर गए। मुंशी जी अपनी मेज़ पर बैठे थे। उम्र साठ से ऊपर, चश्मा नाक पर सरक आया था, और उनके सामने काग़ज़ों का ढेर था। जैसे ही हम अंदर घुसे, उन्होंने सिर उठाया और उनके हाथ से क़लम छूट गई।

"वीर…" उन्होंने धीरे से कहा। फिर उन्होंने मीरा को देखा, और उनका चेहरा और भी उतर गया।

"मुंशी जी," मैंने कहा। "अख़बार में मेरा नाम वापस लेने की खबर है। आप बताइए, किस काग़ज़ के आधार पर?"

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